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रामायण में हनुमान जी ना होते तो शायद रामायण की कहानी कुछ और ही होती। रामभक्त हनुमान रामायण के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक थे। हनुमान जी की कई गाथाएं हमारे धर्मग्रंथों में पढ़ने को मिल जाती है ,किन्तु इसका विवरण कहीं भी नहीं मिलता की प्रभु श्री राम के वैकुण्ठधाम वापस जाने  के बाद पवनपुत्र हनुमान कहाँ गए ? लेकिन इस लेख में हम अआप्को प्रयास करेंगे की रामायण के बाद हनुमान जी वास्तव में कहाँ गए थे।

क्या रामायण के बाद हनुमान चीन चले गए थे ?
क्या रामायण के बाद हनुमान चीन चले गए थे ?


कई कथाओं में ऐसे किस्से पढ़ने को मिलते हैं जो इशारा करते हैं की हनुमान जी रामायण के बाद चीन चले गए थे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि चीन की दंत कथाओं में एक ऐसे दिव्य वानर का जिक्र मिलता है जो एक देवी के अंश से पैदा हुआ था। उसके पिता कोई नहीं थे और उसमें हनुमान जी जैसी ही अद्भुत शक्तियां थीं। इस दिव्य वानर को चीन के लोग भी हनुमान जी की तरह ही आज भी पूजते हैं। चीन के लोग इस दिव्य वानर को मंकी किंग के नाम से पूजते है। हनुमान जी की तरह ही मंकी किंग की शक्ल बिल्कुल वानर जैसी थी लेकिन वो दो पैरों पर चल सकता था। हनुमान जी की तरह ही उसकी अपार शक्ति का सामना करना किसी देव या दानव के वश में नहीं था। युद्धकला में उसका कोई मुकाबला ही नहीं था।

हनुमान जी तरह ही मंकी किंग भी हवा में बिना किसी मदद के उड़ सकता था। मंकी किंग के बारे में चीनी ग्रंथों में साफ लिखा है कि उनकी एक और अद्भुत शक्ति ये थी कि वो किसी का भी रूप धारण कर सकते थे। हनुमान जी की रूप बदलने वाली शक्ति का जिक्र रामायण में तो बार-बार आता है। हिंदू धर्मग्रंथों में हनुमान जी के बचपन के बारे में जो किस्से दर्ज हैं वो बताते हैं कि हनुमान जी बचपन में बेहद शरारती थे। ऐसा ही चीन के धर्मग्रंथों में मंकी किंग के बारे में लिखा है। बकायदा मंकी किंग की शरारतों का चीनी दंतकथाओं में विस्तार से वर्णन है। मंकी किंग और हनुमान जी के हथियारों मे भी समानता देखने को मिलती है। चीनी धर्मग्रंथों के मुताबिक मंकी किंग एक ही हथियार से लड़ते थे और वो धातु की बनी एक लाठी जैसा था। वो धारदार हथियार का इस्तेमाल नहीं करते थे।

हनुमान जी के द्वारा भी कभी किसी धारदार हथियार के इस्तेमाल का जिक्र रामायण में नहीं है। वो सिर्फ गदा से युद्ध करते थे।  एक जिक्र तो ये भी है कि मंकी किंग ने बाकायदा स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया था। इधर देवराज इंद्र से हनुमान के विवाद का वर्णन हमे पुराने में  भी पढ़ने को मिलता है। इस कहानी के मुताबिक इंद्र के वज्र प्रहार से हनुमान अचेत हो गए थे। इसके बाद देवताओं ने हनुमान से माफी मांगते हुए उनको अलग-अलग वरदान दिए थे। हिंदू संस्कृति और चीनी संस्कृति की इन कथाओं में भी बेहद समानता है। दोनों से कम से कम इतना तो साफ हो ही जाता है कि मंकी किंग और हनुमान दोनों का स्वर्ग से विवाद हुआ था।  तो क्या ये मुमकिन नहीं कि ये दोनों असल में एक ही थे।

इसके अलावे मंकी किंग भी हनुमान जी की तरह ही बालब्रह्मचारी थे। दोनों को ही दिव्य शिक्षा मिली थी। शस्त्र और शास्त्र ज्ञान में दोनों को ही निपुण माना गया है। इन सारी समानताओं को देखने से तो यही प्रतीत होता है की भारत में हनुमान और चीन में मंकी किंग के नाम से प्रचलित यह महायोद्धा एक ही हैं।

हिन्दू धर्म में देवताओं के साथ साथ देवियों की भी पूजा की जाती है।जैसे देवों  में त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा,विष्णु और महेश को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।उसी तरह देवियों में सरस्वती.लक्ष्मी और माँ काली को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसा माना जाता है की देवी पार्वती ने ही दुष्टों का संहार करने के लिए मां काली का रूप धारण किया था। माँ काली का रूप देखने में बड़ा ही भयावह लगता है। उनके  हाथों में कपाट,रक्त से भरी कटोरी,लटकता नरमुंड और गले में मुंडों की माला उनके रूप को और भी भयावह बना देता है। लेकिन मैं आपको बताऊंगा की आखिर माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?
माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?
माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?

रक्तबीज दैत्य की कथा

स्कन्द पुराण और दुर्गा सप्तशती की एक कथा के अनुसार पौराणिक काल में शंकुशिरा नामक एक अत्यन्त बलशाली दैत्य का पुत्र अस्थिचर्वण हुआ करता था जो मनुष्यों की अस्थियां चबाया करता था। वह मनुष्यों के साथ-साथ देवताओं पर भी अत्याचार किया करता था।  उसके अत्याचार से तंग आकर एक दिन देवताओं ने क्रोध में आकर उसका वध कर डाला। उसी काल में रक्तबीज नामका एक और दैत्य भी हुआ करता था। जब यह बात उसे पता चली तो वह देवताओं को पराजित करने के उदेश्य से ब्रह्मक्षेत्र में ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करने लगा।  

रक्तबीज की तपस्या

करीब पांच लाख वर्ष बाद रक्तबीज के घोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। भगवान ब्रह्मा को अपने सामने देखकर रक्तबीज ने सबसे पहले उन्हें प्रणाम किया और फिर बोला  हे परमपिता अगर आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये की मेरा वध देवता,दानव,गन्धर्व,यक्ष,पिशाच,पशु पक्षी,मनुष्य आदि में से कोई भी ना कर सके और  मेरे शरीर से जितनी भी रक्त की बूंदे जमीन पर गिरे उनसे मेरे ही समान बलशाली,पराक्रमी और मेरे ही रूप में उतने ही दैत्य प्रकट हो जाएँ। तब ब्रह्मा जी ने कहा हे रक्तबीज तुम्हारी मृत्यु किसी पुरुष द्वारा नहीं होगी लेकिन स्त्री तुम्हारा वध अवश्य कर सकेगी। इतना कहकर ब्रह्माजी वहां से अंतर्ध्यान हो गए।

रक्तबीज का अहंकार

उसके पश्चात् रक्तबीज वरदान के अहंकार में मनुष्यों पर अत्याचार करने लगा और एक दिन उसने वर के अहंकार में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया। और देवराज इंद्र को युद्ध में हराकर स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया । उसके पश्चात्  दस हजार वर्षों तक देवतागण रक्तबीज के भय से मनुष्यों की भांति दुःखी होकर पृथ्वी पर छिपकर विचरण करने लगे। उसके बाद इंद्र सहित सभी देवतागण पहले ब्रह्मा जी के पास गये। फिर सभी ने उनको अपनी व्यथा सुनाई। तब ब्रह्मा जी ने कहा मैं इस संकट से आप सभी को नहीं उबार सकता इसलिए हम सभी को विष्णुदेव के पास चलना चाहिए। फिर ब्रह्मा जी सहित सभी देवतागण श्री विष्णु जी के पास गये,परन्तु विष्णु जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया की रक्तबीज को मारना मेरे भी वश में नहीं है। फिर सभी देवता बैकुंठ धाम से कैलाश के लिए चल दिए। लेकिन जब वो वहां पहुंचे तो उनहे पता चला की भगवान शिव उस समय कैलाश पर नहीं बल्कि केदारनाथ क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट  पर विराजमान हैं।

तत्पश्चात सभी देवतागण केदारनाथ धाम पहुंचे। वहां पहुँचकर देवताओं ने भगवान शिव को सारी बात बताई। तब ब्रह्मा जी ने शिव से कहा हे शिव मेरे ही वरदान के कारण रक्तबीज का देवता,दानव, ,यक्ष,पिशाच,पशु पक्षी,मनुष्य आदि में से कोई भी वध नहीं कर सकता परन्तु स्त्री उसका वध अवश्य कर सकती है। तब भगवान शिव ने सभी देवताओं से आदि शक्ति की स्तुति करने को कहा।

माँ शक्ति की उत्पति

फिर सभी देवताओं ने  रक्तबीज के वध की अभिलाषा से आदि शक्ति की स्तुति करना शुरू किया। कुछ समय पश्चात् देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर हिमालय से एक देवी प्रकट हुई। और देवताओं से कहा की  हे देवगन आप दैत्य राज रक्तबीज से बिल्कुल निर्भय रहें। मैं अवश्य उसका वध करूंगी।उसके बाद देवी से वर पाकर सभी देवतागण अपने अपने स्थान को लौट गए गये। फिर एक दिन देवताओं ने नारद जी से कहा कि वे रक्तबीज में ऐसी मति उत्पन्न करें जिससे वह देवी के साथ किसी भी तरह का कोई अपराध करने को विवश हो जाये। उसके बाद नारद जी ने रक्तबीज के पास जाकर उसको उकसाने के उद्देश्य से कहा की कैलाश पर्वत के ऊपर भगवान शिव का निवास स्थान है। शिव जी को छोड़कर सभी देवता-दानव तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं और तुमसे डरते हैं। परन्तु शिव के साथ एक तन्वङ्गी नाम की अबला नारी रहती है जिसे शिवजी के कारण देव दानव कोई भी उन्हें जीत नहीं सकता है।

तब रक्तबीज ने कहा-देवर्षि ऐसा क्या कारण है जो उसको कोई नहीं जीत सकता?

देवी पार्वती का अपमान

फिर नारद जी ने रक्तबीज से कहा की तीनो देवों में से शिव जी सबसे अधिक जितेन्द्रिय और धैर्यवान् हैं। इसलिए देव-दानव-नाग आदि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, अगर तुम उनपर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो किसी तरह सबसे पहले उनका धैर्य डिगाओ। नारद के वचन सुनकर शिव जी को मोहित करने के उद्देश्य से रक्त बीज पार्वती के समान अत्यधिक सुन्दर स्त्री बनकर कैलाश पर्वत पर जा पहुंचा। उसके रूप और यौवन को देखकर एक बार तो शिव जी मोहित भी हो गये। परन्तु तभी पार्वती भी  वहां आ पहुंची। यह देख शिव जी दुविधा में पड़ गये। फिर उन्होंने ध्यानयोग से उस पार्वती रुपी दैत्य रक्तबीज को पहचान लिया। तब उन्होंने क्रोध में आकर उसे शाप दिया- हे दुष्ट तू कपट से पार्वती का वेश बनाकर मुझे छलने आया है, इसलिए महेश्वरी पार्वती ही तेरा वध करेगी!

भगवान शिव का अपमान करने के बाद  रक्तबीज अपने दरवार में आ गया। फिर वह अपने राक्षस मंत्रीगण के साथ शिव जी पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाने लगा। उसने सबसे पहले अपने मंत्रीगण से कहा की यदि पार्वती मुझसे से प्रेम करने लगी तो शिव का धैर्य अपने आप ही नष्ट हो जायेगा। फिर पत्नी वियोग के कारण शिव कमजोर भी हो जायेगा उसके बाद उसे हम आसानी से जित सकेंगे। फिर उसने अपने मंत्रियों को बताया की शिव ने उसे स्त्री के हाथों मरने का श्राप दे दिया है लेकिन वो ये नहीं जानता की मेरे सामने जब इन्द्र सहित कोई भी देवता नहीं टिक सकते तो भला मेरा वध एक स्त्री कैसे कर सकती है। इतना कहकर रक्तबीज जोर-जोर से हंसने लगा। फिर थोड़ी देर बाद उसने अपनी सेना को आदेश दिया की तत्काल तुमलोग कैलाश जाओ और पारवती को प्रेमपूर्वक मेरे पास लेकर आओ और अगर वो प्रेम से नहीं आई तो उसे घसीटते हुए लाना।  

रक्तबीज का वध

इसके बाद अपने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए दैत्यगण कैलाश पर्वत पर पहुंचा और वहां से देवी पार्वती को अपने साथ चलने को कहा। दैत्यों की बातें सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई और उन्होंने अपने हुंकार से दैत्यों को जलाकर भस्म करने लगी। उसी समय कुछ दैत्य किसी तरह वहां से अपनी जान बचाकर रक्तबीज के पास पहुंचे और उसे माता पार्वती के पराक्रम के बारे में बताया। यह सुनकर रक्तबीज क्रोधित हो उठा और उसने अपने सैनिकों को  कायर कहकर कारागार में डाल दिया।

 फिर रक्तबीज चण्ड,मुण्ड आदि जैसे असंख्य दैत्यों के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचा और देवी के साथ युद्ध करने लगा।  इस युद्ध में माता पार्वती सभी देवताओं की शक्तियों के साथ लड़ने लगी और चण्ड,मुण्ड सहित सभी दैत्यों का वध कर दिया। परन्तु रक्तबीज के शरीर से जीतनी भी रक्त की बूंदे धरा पर गिरती उससे उसके समान ही एक और दैत्य उत्पन्न हो जाता।  इसलिए अभी तक उसका वध नहीं हो सका था।फिर देवी पार्वती ने माँ काली का रूप धारण किया। और अपना मुंह फैलाकर रक्त बीज का खून पिने लगी  और इसी प्रकार अपनी जीभ फैलाई जिससे कुछ रक्तबीजों को निगल गयी व कुछ को रक्तविहीन कर मार दिया। अन्त में मुख्य रक्तबीज भी शूल आदि अस्त्रों से मारे जाने व उसका खून चूसे जाने से रक्तविहीन होकर धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार देवताओं सहित तीनोलोक  रक्तबीज के नाश से प्रसन्न हो गया।

भगवान की मृत्यु के विषय में जब भी चर्चा होती है तो वस्तुतः उसका अर्थ मृत्यु नहीं होता। भगवान ना तो कभी दिखते है और न ही कभी मरते। जब धर्म विलुप्त होता है तब उसकी रक्षा करने धरती पर अवतार लेते हैं। इसी क्रम में ऐसा कहा जाता है की जब भगवान कृष्ण की मृत्यु के पश्चात उनका दाह संस्कार हुआ तब उनके शरीर का एक अंग नहीं जला था। क्या भगवान के शरीर का दाह संस्कार हुआ? उनका कौन सा अंग नहीं जला और क्यों?

भगवान कृष्ण की लीलाएं उनके बचपन से ही बहुत रोचक रहीं हैं। हर कोई उनके विषय में जानने के लिए उत्सुक रहता है। उनकी मनमोहक छवि, उनके द्वारा की गयी लीलाएं। उनके प्रति सबका प्रेम अतुलनीय है। भगवद गीता के अनुसार भगवान कृष्ण की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता अर्थात संसार में जो कुछ भी होता है वो केवल उनकी इच्छा से होता है। उनकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं. वे ही परमपिता परमात्मा हैं। महाभारत का युद्ध भी उनकी इच्छा से ही हुआ जिसके माध्यम से उन्होंने धर्म का महत्त्व बताया। और उन्होंने स्वयं भी धर्म का ही पक्ष लिया. चूंकि कौरव अधर्म के पक्षपाती थे। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाने का प्रयास किया परन्तु दुर्योधन अपने हठ पर ही अड़ा रहा। तब महाभारत युद्ध के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचा था. महाभारत युद्ध के समय जब दुर्योधन का अंत हुआ तब उसकी माँ शोकाकुल हो उठी। महाभारत की रणभूमि में जब वो पुत्रो की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने पहुंची तब उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दिया की ठीक ३६ वर्षों पश्चात उनकी मृत्यु हो जाएगी क्यूंकि उन्हें ग़लतफहमी थी कि उनके पुत्रों की मृत्यु भगवान कृष्ण के कारण ही हुई है। वास्तव में तो भगवान कृष्ण किसी श्राप के कारण नहीं अपितु अपनी इच्छा से ही इस संसार से अदृश्य हुए थे क्यूंकि जो भी इस संसार में आता है उसकी देह का विनाश निश्चित है।
अंतिम संस्कार में भगवान कृष्ण का कौन सा अंग नहीं जला
अंतिम संस्कार में भगवान कृष्ण का कौन सा अंग नहीं जला

भगवान मृत्युलोक को छोड़ कैसे अपने लोक गए इसका वर्णन भागवतपुराण के ग्यारहवें स्कंध में मिलता है। मित्रों यह तो आप जानते ही हैं कि भागवतपुराण शुकदेव गोस्वामी जी के द्वारा राजा परीक्षित को सुनाई गयी थी। ग्यारहवें स्कंध में शुकदेव जी परीक्षित महाराज से कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने विचार किया कि यदुवंश अभी भी पृथ्वी पर है और पूर्णतया मुझ पर आश्रित है। यदुवंश कि लोग धन, जनबल, घोड़े आदि के माध्यम से बलशाली हैं और पृथ्वी पर अपनी मनमानी कर रहे हैं। यहाँ तक की देवता आदि में उन्हें पराजित नहीं कर सकते. इसलिए मुझे यदुवंश के लोगों में आपस में कलह उत्पन्न करनी होगी उसके पश्चात ही मैं अपने धाम वापस जाऊंगा। ऐसा विचार करके भगवान ने एक लीला रचाई आइये इसे विस्तार में जानते हैं।

भगवान कृष्ण द्वारका नगरी के राजा थे. एक बार ऋषि विश्वामित्र, नारद मुनि, और ऋषि दुर्वासा द्वारका नगरी पधारे. द्वारका में युवाओं का स्वभाव बहुत चंचल और उद्दंड था। एक बार कृष्णपुत्र साम्ब समेत कुछ यदुवंश कुमारों को शरारत सूझी. साम्ब ने स्त्री का रूप धारण किया और वे सभी कुछ ऋषियों के पास पहुंचे और साम्ब को गर्भवती महिला बताकर ऋषियों के साथ मज़ाक करने का दुष्साहस किया। ऋषियों ने भांप लिया कि उनके साथ मज़ाक हो रहा है। तब उन्होंने साम्ब को श्राप दिया कि वो एक ऐसे मूसल को जन्म देगा जिससे उसके कुल का नाश होगा।  वास्तव में ऋषि मुनियों को भगवत्प्रेरणा के कारण क्रोध आया अतः यह भगवान की ही लीला थी। इस प्रकार के महापुरुष भगवान की लीला में सहयोग करते हैं इसलिए मृत्युलोक में निवास करके यहाँ के लोगों के समान ही व्यवहार करते हैं। उनका वास्तविक व्यवहार ऐसा नहीं होता, वे सदैव ही भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं। ऋषियों द्वारा श्राप सुनकर सभी कुमार घबरा गए। उन सबने साम्ब को स्त्री का रूप देने के लिए जो कृत्रिम पेट बनाया था उसे फाड़कर देखा तो उसमे वास्तव में मूसल था। यह देख वे सभी पछताने लगे।

उन्होंने इस पूरी घटना के विषय में उग्रसेन को बताया। उग्रसेन मथुरा के राजा और कंस के पिता थे। उग्रसेन ने उस मूसल का चूर्ण बनाकर उस चूर्ण और बचे हुए लोहे के टुकड़ों को समुद्र में फेंकने का आदेश दिया। उन्होंने ऐसा ही किया. वो चूर्ण पानी के साथ बहकर किनारे पर आ गया और जो लोहे के छोटे छोटे टुकड़े बचे थे उसे एक मछली ने निगल लिया। कुछ दिन पश्चात यह चूर्ण एरक के रूप में उगा जो बिना गाँठ की घास होती है। एक बार समुद्र में कुछ मछुआरे मछलिया पकड़ने पहुंचे और उस मछली को भी पकड़ा जिसने लोहे के टुकड़े निगल लिए थे। उस मछली के पेट से निकले लोहे के टुकड़े को एक बहेलिए ने अपने बाण की नोक पर लगा लिया।

एक बार ब्रह्मा जी अपने पुत्रों और देवताओं के साथ द्वारका नगरी पधारे और भगवान से प्रार्थना की कि यदि अब वे चाहें तो अपने धाम पधार सकते हैं तब श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं निश्चय कर चुका हूँ कि यदुवंशियों का नाश होते ही मैं परमधाम के लिए प्रस्थान करूँगा। तब सभी ने भगवान को प्रणाम किया और अपने धाम की ओर चले गए। उन सबके जाने के पश्चात द्वारका में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं, उत्पात और अपशगुन होने लगे। 

यह देख भगवान ने बच्चों, स्त्रियों और वृद्धों को शंखधार क्षेत्र और अन्य सभी को प्रभास क्षेत्र में जाने का आदेश दिया जहाँ से सरस्वती नदी बहकर समुद्र में मिलती है. प्रभास क्षेत्र पहुंचकर सभी ने भगवान के आदेशानुसार पूजा, अर्चना एवं भक्ति पूरी श्रद्धा से किये परन्तु वे मैरेयक नामक मदिरा का पान करने लगे. इस मद का स्वाद तो मीठा होता है परन्तु यह बुद्धि भ्रष्ट करने वाला है. इसका सेवन करते ही सभी यदुवंशियों की बुद्धि भ्रष्ट होने लगी और सभी आपस में ही झगड़ने लगे. इस लड़ाई ने इतना भयंकर रूप ले लिया कि सभी यदुवंशी मृत्यु को प्राप्त हुए.

इस प्रकार भगवान् कृष्ण का उद्देश्य पूर्ण हुआ. इस घटना के पश्चात बलरामजी नदी के तट पर चिंतन में लीन हो गए और ध्यान में रहकर ही भौतिक शरीर को त्याग दिया. कुछ समय पश्चात ही भगवान कृष्ण एक पीपल के नीचे बैठे और सभी दिशाओं से अन्धकार को नष्ट कर प्रकाशमान कर रहे थे. उस समय भगवान के बैठने की अवस्था कुछ ऐसी थी कि वे अपनी दायीं जांघ पर बांया चरण रखे हुए थे. उनके चरण कमलों की आभा रक्त के समान प्रतीत हो रही थी. एक बहेलिये ने भगवान के चरणों को दूर से देखा जो उसे हिरन के मुख के समान नज़र आये. यह वही बहेलिया था जिसने मछली के पेट से निकले लोहे को अपने बाण में लगाया था. उसने हिरन समझकर भगवान की देह को बाण से भेद दिया.

इसके पश्चात भगवान अपने शरीर समेत ही भगवद्धाम के लिए प्रस्थान कर गए. इस प्रकार ऋषियों द्वारा दिए गए श्राप के कारण यदुवंश का नाश हुआ और गांधारी के द्वारा दिया गया श्राप भी पूरा हुआ क्यूंकि महाभारत के पश्चात भगवान कृष्ण के ३६ वर्ष इस धरती पर पूर्ण हो चुके थे. कई बार ऐसा कहा जाता है कि भगवान की देह का दाहसंस्कार किया गया परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हुआ. उनकी देह दिव्य थी न कि पंचतत्वों से निर्मित.

अनेक मान्यताओं कि अनुसार पांडवों द्वारा उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया. जब उनकी पूरी देह जल गयी परन्तु दिल जलकर नष्ट नहीं हुआ और अंत तक जलता रहा तब उनके दिल को जल में प्रवाहित किया गया. उनकी देह का यह हिस्सा राजा इन्द्रियम को प्राप्त हुआ. राजा इन्द्रियम भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, उन्होंने यह ह्रदय भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा में स्थापित कर दिया.

दर्शकों आपने पौराणिक कथाओं में अप्सराओं के बारे में पढ़ा या सुना होगा। इन कथाओं में अप्सराओं को एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिलाओं के रूप में दर्शाया जाता है जो देवराज इंद्र की सभा में नृत्य और गायन का काम करती है और जरूरत पड़ने पर अप्सराएं स्वर्ग लोक में रहनी वाली आत्माओं एवं देवों का वासना की पूर्ति भी करती है। लेकिन  इन बातों में कितनी सच्चाई है ये कोई नहीं जानता क्यूंकि अप्सरों का उल्लेख सिर्फ धर्मग्रंथों में ही मिलती है। हालाकिं हिन्दू धर्मग्रंथों के अलावा चीनी और यूनानी धर्म ग्रन्थ में भी अप्सराओं का उल्लेख मिलता है परन्तु  उनमे अप्सराओं का चरित्र हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित चरित्र से काफी भिन्न हैं और उनके नाम भी अलग है। लेकिन इन अप्सराओं में कुछ अप्सराएं ऐसी भी थी जिसने मनुष्य जाति का इतिहास बदल कर रख दिया। तो दर्शकों आइये जानते हैं कुछ ऐसी अप्सराओं की प्रेम की कथा के बारे में जिसने देवराज इंद्र के कहने पर पृथ्वी लोक पर अवतरित तो हुई परन्तु  उसे किसी ना किसी से प्रेम हो गया और वो यहीं की होकर रह गयी।
पौराणिक काल की अप्सराएं
पौराणिक काल की अप्सराएं

हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वर्गलोक की अप्सराएं इतनी सुंदर होती थी की किसी भी सिद्ध पुरुष का मन बस उसे एक बार देख लेने से  ही डोल जाता था। तभी तो जब कभी कोई ऋषि-या महर्षि कठोर तप करने लगते थे और देवराज इंद्र को अपना सिंहासन खतरे में लगने लगता था तो वो इन सुंदरी का उपयोग उनकी तपस्या भांग करने के लिए किया करते थे।  और इसी कड़ी में कई अप्सराओं को इन ऋषि-महर्षियों से प्रेम हो गया और आज भी उनका वंश पृथ्वीलोक  पर मौजूद है। इस कड़ी में सबसे पहला नाम आता है :-

1) मेनका

हिंदू पौराणिक कथाओं में, मेनका को स्वर्गलोक की अप्सराओं में से सबसे सुंदर माना जाता है। मेनका का जन्म देवों और असुरों द्वारा समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। वह सुन्दर होने के साथ साथ कुशाग्र बुद्धि और सहज प्रतिभा की धनि थी। एक कथा के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र के कठोर तप के कारण इंद्र देव भयभीत हो गए और उन्होंने मेनका को स्वर्ग से धरती पर भेजा ताकि वह विश्वामित्र को अपने रूप और यौवन से लुभा सके और उनका तप भंग हो जाए। मेनका इंद्र का आदेश पाते ही पृथ्वी लोक पर आई और उसने सफलतापूर्वक विश्वामित्र को अपने सौंदर्य के जाल में फंसकर उनकी तपस्या भंग कर दी।  महर्षि विश्वामित्र मेनका के रूप को देखकर उसपर मोहित हो गए और उसे प्रेम करने लगे।उधर मेनका भी विश्वामित्र के साथ वास्तविक प्रेम में पड़ गई। फिर दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे। कुछ समय बाद दोनों के संयोग से एक पुत्री का जन्म हुआ  जो बाद में ऋषि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी और शकुंतला के नाम से प्रसिद्ध हुई।  बड़े होने पर शकुंतला का विवाह राजा दुष्यंत से हुआ। विवाह के पश्चात् शकुंतला और राजा दुष्यत के संयोग से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम भरत रखा गया और उसी भरत के नाम पर आज हमारे देश का नाम भारत है। 

2) उर्वशी

अप्सरा उर्वशी का सौंदर्य भी बड़ा ही मनमोहक था। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी उर्वशी एक बार इन्द्र की सभा में नृत्य कर रही थी उस समय राजा पुरुरवा भी वहां उपस्थित थे और उसके सौंदर्य को देखकर वो उसके प्रति आकृष्ट हो गए। उधर उर्वशी भी राजा पुरुरवा पर मोहित हो गयी जिसकी वजह से उर्वशी की ताल बिगड़ गई थी। इस बात का पता जब देवराज इंद्र को चला तो वो क्रोधित हो उठे और उन्होंने दोनों को मृत्युलोक में रहने का शाप दे दिया। उसके बाद राजा  पुरुरवा और उर्वशी कुछ शर्तों के साथ पति-पत्नी बनकर मृत्युलोक में रहने लगे। दोनों के कई पुत्र हुए। जिनमे से आयु के पुत्र नहुष हुए। नहुष के ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख पुत्र थे। इन्हीं में से ययाति के यदु, तुर्वसु, द्रुहु, अनु और पुरु हुए। यदु से यादव और पुरु से पौरव हुए। पुरु के वंश में ही आगे चलकर कुरु हुए और कुरु से ही कौरव हुए। भीष्म पितामह कुरुवंशी ही थे।

महाभारत के अनुसार उर्वशी एक बार इन्द्र की सभा में अर्जुन को देखकर आकर्षित हो गई थी और उसने अर्जुन से निवेदन किया था की वो उसके साथ रमन करे परन्तु अर्जुन ने यह कहते हुए मना कर दिया की हे देवी ! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता समान हैं। और अर्जुन के मुख से ऐसी बातें सुनकर उर्वशी उसे  1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया था। इसी तरह अप्सरा उर्वशी से सम्बंधित सैकड़ों कथाएं पुराणों में मिलती हैं।

3) पुंजिकस्थला

एक ओर जहां उर्वशी और मेनका ने पुरुरवा के वंश को आगे बढ़ाया वहीं पुंजिकस्थला ने वानर वंश को आगे बढ़ाया था। माता अंजनी से हनुमान के जन्म की कथा तो हम सब ने सुनी है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं की माता अंजनी किसी समय इंद्र के दरबार में पुंजिकस्थला नामक एक अप्सरा हुआ करती थी। ऐसा माना जाता है की एक बार पुजिंकास्थला ने तपस्या करते एक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी। गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने दया दिखाई और कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, इस तरह अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

इस शाप के बाद पुंजिकस्थला धरती पर चली गई और वहां एक शिकारन के रूप में रहने लगी। वहीं उनकी मुलाकात केसरी से हुई और दोनों में प्रेम हो गया। केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया पर संतान सुख से वंचित थे। तब मतंग ऋषि की आज्ञा से अंजना ने तप किया। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया, कि तुम्हारे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा। पवनदेव की कृपा से पुंजिकस्थला को एक पुत्र मिला जिसका नाम आंजनेय रखा गया जो आगे चलकर बजरंग बलि और हनुमान के नाम से प्रसिद्ध हुए।

4) रम्भा

रम्भा अपने रूप और सौन्दर्य के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी । और यही कारण था कि हर कोई उसे अपना बनाना  चाहता था। रामायण में कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी के रूप में रम्भा का उल्लेख मिलता है। रामायण के अनुसार रावण ने रम्भा के साथ बलात्कार करने का प्रयास किया था जिसके चलते रम्भा ने उसे शाप दिया था कि आज के बाद जब भी तुम न चाहने वाली किसी स्त्री से संभोग करेगा, तब तुझे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। माना जाता है कि इसी शाप के भय से रावण ने सीताहरण के बाद सीता को छुआ तक नहीं था। वहीं महाभारत’ में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है।इसके आलावा एक कथा के अनुसार एक बार विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलवाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा। परन्तु जब वो पृथ्वीलोक पर आई तो ऋषि विश्वामित्र उसे देखते ही इन्द्र का षड्यंत्र समझ गए और उन्होंने रंभा को हजार वर्षों तक शिला बनकर रहने का शाप दे डाला। सवाल यह उठता है कि अपराध तो इंद्र ने किया था फिर सजा रंभा को क्यों मिली? हालांकि वाल्मीकि रामायण की एक कथा के अनुसार एक ब्राह्मण द्वारा यह ऋषि के शाप से मुक्त हुई थीं।

महाभारत की कहानी कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध पर आधारित है। महाभारत में द्रौपदी के साथ जितना अन्याय होता दिखता है, उतना अन्याय इस महाकथा में किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं हुआ। द्रौपदी संपूर्ण नारी थी।और शायद  द्रौपदी भारतीय पौराणिक इतिहास की प्रथम और अंतिम महिला थी जिसके पांच पति थे और जो पांच पुरुषों के साथ रमण करती थी? लेकिन पाठकों क्या कभी आपने सोचा है की पांच पुरुषों से विवाह करने के बाद उसने सभी पांडवों के साथ सुहागरात कैसे मनाई होगी या वह पांचों पांडव को कन्या रूप में कैसे मिली।
द्रौपदी की सुहागरात
द्रौपदी की सुहागरात

द्रोपदी महाभारत की वो पात्र है जिसके अपमान के कारण ही इतिहास का सबसे भयंकर रक्तरंजित युद्ध हुआ। महाभारत में द्रोपदी का चरित्र जितना अनोखा है उसके जन्म की कथा भी उतनी ही चमत्कारिक है। दौपदी राजा द्रुपद की पुत्री थी जिसका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था। इससे जुडी कथा भी बड़ी ही रोचक है। कथा के अनुसार राजा द्रुपद और कौरव-पांडव के गुरु द्रोणाचार्य एक समय में बहुत ही अच्छा मित्र हुआ करते थे। बचपन में द्रुपद ने द्रोणाचार्य को यह वचन दे रखा था की जब वह राजा बनेंगे तो अपना आधा राज्य अपने मित्र द्रोण को दे देंगे,परन्तु राजा बनने के बाद द्रुपद ने द्रोणाचार्य को आधा राज्य देने से मना कर दिया और अपने राजसभा से अपमानित कर निकाल दिया। द्रुपद के हाथों अपमानित होने के बाद द्रोण भटकते भटकते हस्तिनापुर पहुंचे जहाँ भीष्म पितामह ने द्रोणाचार्य को हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा देने का कार्य सौपा।

तत्पश्चात द्रोण कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देने लगे। यूँही  समय बीतता गया और जब कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूर्ण हो गयी तब गुरु द्रोणाचार्य ने उनसे गुरु दक्षिणा के रूप में पांचाल देश माँगा। गुरु के आदेश पाते ही पहले कौरवों  ने पांचाल देश पर आक्रमण किया लेकिन उन्हें द्रुपद के हाथों पराजित होना पड़ा। फिर पांडवों ने पांचाल देश पर आक्रमण कर राजा द्रुपद को बंदी बना अपने गुरु के समक्ष ले आये। तब गुरु द्रोणाचार्य ने जीते हुए पांचाल देश का आधा भाग राजा द्रुपद को दे दिया तथा शेष आधे राज्य का राजा अपने पुत्र अश्व्थामा को बनाया।

इधर द्रोणाचार्य से अपमानित होने के बाद राजा द्रुपद प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे और  एक ऐसा पुत्र प्राप्त करने की कामना करने लगे। जो उनके शत्रु द्रोण का वध कर सके। इसके लिए उन्होंने एक ऋषि के कहने पर पुत्र प्राप्ति यज्ञ शुरू कर दिया और इसी यज्ञ की अग्नि से पुत्र धृष्टधुम्न के साथ साथ एक पुत्री द्रौपदी भी प्रकट हुई। यही कारण था की द्रौपदी को याग्यसेनी के नाम से भी जाना जाता है।दिव्य द्रोपदी एक युवती के रूप में हवन कुंड से प्रकट हुई थी इसलिए कुछ समय पश्चात् राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री के लिए स्वंयवर का आयोजन किया।

अपनी पुत्री के स्वंयवर के लिए राजा द्रुपद ने सभी राज्यों के राजाओं को आमंत्रित किया। उधर जब द्रौपदी के स्वंयवर की घोषणा हुई तब माता कुंती सहित पांचों पांडव लाक्षागृह काण्ड के बाद ब्राह्मण के वेश में वन में रहते थे। जब इस बात की उन्हें सूचना मिली की द्रौपदी का स्वंयवर हो रहा है और वहां श्रीकृष्ण भी आएंगे तो पांचों पांडव उनकी दर्शन की अभिलाषा लिए पांचाल देश की ओर निकल पड़े और स्वंयवर के दिन पांचाल जा पहुंचे । उधर स्वंयवर शर्त के रूप में राजा द्रुपद ने एक यंत्र में बड़ी-सी मछली को रखा जो घूम रही थी। शर्त के अनुसार उस घूमती हुई मछली की आंख में निचे तैलपात्र में उसकी परछाई देखकर तीर मारना था।

स्वंयवर के दिन एक के बाद एक सभी राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने ऊपर घूमती हुई मछली की आंख पर उसके प्रतिबिम्ब को नीचे जल में देखकर निशाना साधने का प्रयास किया किंतु सफलता हाथ न लगी और वे सभी एक एक कर सभी एक एक कर rअपने स्थान पर लौट आए। इन असफल लोगों में जरासंध, शल्य, शिशुपाल तथा दुर्योधन, दुःशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे।

कौरवों के असफल होने पर ब्राह्मण के वेश में स्वयंवर सभा में उपस्थित अर्जुन ने तैलपात्र में मछली की परछाई को देखते हुए एक ही बाण से मछली की आँख भेद डाली। इसके तुरंत बाद द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी। उधर राजा द्रुपद को यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का स्वयंवर उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो पाया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह एक पराक्रमी राजकुमार के साथ हो लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ब्राह्मण वेश में यह पाण्डु पुत्र अर्जुन ही है।

स्वंयवर के बाद पांचो पांडव द्रोपदी के साथ माता कुंती के पास जाने के लिए वन की ओर निकल पड़े। कुछ समय बाद पांचों पांडव द्रोपदी सहित वन में स्थित अपने कुटिया के द्वार पर पहुंचे वहां पहुंचकर अर्जुन ने बाहर से ही माता कुंती को आवाज लगाई और कहा की माता देखो आज हमलोग भिक्षा में क्या लाये हैं।

चुकीं उस समय उनकी माता कुंती कुटिया के अंदर भोजन बना रही थी इसलिए उन्होंने बिना देखे ही यह कह दिया की भिक्षा में जो कुछ भी लाये हो उसे आपस में बराबर बाँट लो।

सभी भाई माता की हर बात को आदेश की तरह मानते थे इसलिए वे सभी उनकी बात सुनकर चुप हो गए।

बाद में जब कुंती ने बाहर आकर द्रौपदी को देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गई। फिर उसने युधिष्ठिर से बोला तुम ऐसा करो कि मेरा वचन भी रह जाए  और कुछ गलत भी ना हो। लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर भी कोई रास्ता न निकाल सके अंत में यह फैसला किया गया की पांचों भाई  द्रौपदी से शादी करेंगे।

इधर जब इस घटना का पता राजा द्रुपद को लगा तो वो भी परेशान हो गए और उन्होंने अपनी सभा में बैठे भगवान श्रीकृष्ण और महर्षिव्यास जी से कहा कि धर्म केअनुसार किसी स्त्री का पांच पति की कैसे हो सकता है? तब महर्षिव्यास ने राजा द्रुपद को बताया की द्रौपदी को उसके पूर्वजन्म में भगवान शिव ने ऐसा ही वरदान दिया था।

भगवान शिव के उसी वरदान के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है और भगवान शिव की बात अन्यथा कैसे हो सकती है। इस तरह महर्षिव्यास के समझाने पर राजा द्रुपद अपनी बेटी द्रौपदी का पांचो पांडवो के साथ विवाह करने को राजी हो गए|

इसके बाद सबसे पहले द्रौपदी का विवाह पांडवो में ज्येष्ठ युधिष्ठिर के साथ हुआ  और उस रात द्रौपदी ने युधिष्ठिर के साथ अपना पत्नी धर्म निभाया।

फिर अगले दिन द्रौपदी का विवाह भीम के साथ हुआ और उस रात द्रौपदी ने भीम के साथ अपना पत्नी धर्म निभाया।

इसी प्रकार अर्जुन नकुल और सहदेव के साथ द्रौपदी का विवाह हुआ और इन तीनों के साथ भी द्रौपदी ने अपना पत्नी धर्म निभाया।

यहाँ सोचने की बात यह है कि एक पति के साथ पत्नी धर्म निभाने के बाद द्रौपदी ने अपने दूसरे पतियों के साथ अपना पत्नी धर्म कैसे निभाया होगा।

तो आपको बता दें की इसके पीछे भी भगवान शिव का ही वरदान था क्योंकि जब भगवान शिव ने द्रौपदी को पांच पति प्राप्त होने का वरदान दिया था तब उन्होंने द्रौपदी को साथ में ये वरदान भी दिया थाकि वह प्रतिदिन कन्या भाव को प्राप्त हो जाया करेगी । इसलिए द्रौपदी अपने 5 पतियों को कन्या भाव में ही प्राप्त हुई थी।

परंतु संतान प्राप्ति हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने यह सुझाव दिया की प्रतिवर्ष द्रौपदी एक ही पांडव के साथ अपना समय व्यतीत करेगी और जिस समय द्रौपदी अपने कक्ष में किसी एक पांडव के साथ अपना समय व्यतीत कर रही होगी तब उनके कक्ष में कोई दूसरा पांडव प्रवेश नहीं करेगा।

रामायण को हिन्दू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ माना गया है। इसमें कई ऐसी कथाएं हैं जिन्हे आमतौर पर तो सब लोग जानते हैं। लेकिन कुछ ऐसी बातों का भी वर्णन इसमें मिलता है जिसे अधिकतर जनमानस नजान हैं। जैसे देवी सीता लंका में बिना अन्न-जल ग्रहण किये इतने समय  जिन्दा कैसे रही? या गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है उनसे प्रभु राम के क्या सम्बन्ध है ? इस लेख में हम आपको बताएँगे रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य के बारे में।
रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य
01. रामायण संस्कृत का एक महाकाव्य है जो कवी बालमीकि द्वारा रचित है। इस महाकाव्य में 24000 छंद है जो 7 अध्याय या खंड में विभाजित है। पाठकों अगर हम रामायण के हर हजार छंद का पहला अक्षर लें तो जो 24 अक्षर हमे मिलते हैं वो मिलकर गायत्री मन्त्र बनते हैं। 

02. श्री राम की माँ कौशल्या,कौशल देश की राजकुमारी थी। इनके पिता का नाम सकौशल व माता का नाम अमृत प्रभा था। पूर्वजन्म में भगवान विष्णु ने कौशल्या को त्रेता युग में उनके गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया था। इसी कारण वो भगवान राम के रूप में इस धरती पर अवतरित हुए।

03.रामायण के कई संस्करण हैं। इन्ही में से एक आनंद रामायण के अनुसार रावण ने न केवल देवी सीता का अपहरण किया था। बल्कि कौशल्या का भी अपहरण किया था। ब्रह्मा जी ने रावण को पहले ही बता दिया था कि दशरथ और कौशल्या का पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। अपनी मृत्यु को टालने के लिए रावण ने कौशल्या का अपहरण कर उसे एक डिब्बे में बंद करके कौशल्या को एक समुद्र से घिरे द्वीप पर छोड़ दिया था।

04.  श्री राम की एक बहन भी थी जिसका नाम शांता था। जिसको बचपन में ही कौशल्या ने अपनी बहन वर्षनी और अंगदेश के राजा गोपद को गोद दे दिया था। इसलिए रामायण में शांता का वर्णन नहीं मिलता।

05.  माना जाता है की देवी सीता भगवान शिव के धनुष को बचपन से ही खेल-खेल में उठा लेती थी । और इसलिए  उनके स्वंयवर में इस धनुष जिसका नाम पिनाका था,उस पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त रखी गयी थी ।

06. एक बार रावण जब भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत गए। उन्हें मार्ग में नंदी मिले जिनको रावण ने वानर के मुँह वाला कहकर उसका उपहास उड़ाया। नंदी ने तब रावण को श्राप दिया की वानरों के कारण ही तुम्हारी मृत्यु होगी। आगे चलकर क्या हुआ ये तो सब जानते ही हैं।

07. अपने विजय अभियान के दौरान रावण जब स्वर्ग पहुंचा तो वहां उसे रम्भा नाम की एक अप्सरा मिली। रावण उस पर मोहित हो गया। रावण ने उसे छूने का प्रयास किया तो उसने कहा की मैं आपके भाई कुबेर पुत्र नलकुबेर के लिए आरक्षित हूँ। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधु के समान हूँ। पर रावण अपनी शक्ति में इतना चूर था की उसने उसकी एक ना मानी। जब नलकुबेर को इस बात का पता चला तो उसने रावण को श्राप दिया की आज के बाद यदि रावण ने किसी पराई स्त्री को उसके इच्छा के विरुद्ध छुआ तो उसके मस्तक के 100 टुकड़े हो जायेंगे।

08.  जिस दिन रावण सीता का हरण करके अशोक वाटिका में लाया था। उसी दिन ब्रह्मा ने एक विशेष खीर इंद्र के हाथों देवी सीता तक पहुंचाई थी। इंद्र ने देवी सीता के पहरे पर लगे राक्षसों को अपने प्रभाव से सुला दिया। जिसके बाद इंद्र ने देवी को वो दिव्य खीर दी जिसे ग्रहण कर देवी सीता की भूख प्यास शांत हो गयी। और वो अशोक वाटिका में बिना कुछ भी खाये पिए रह सकी।

09. रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। भगवान शिव के भजन कीर्तन के लिए रावण ने एक बार अपनी बाजू काटकर उससे एक वाद्ययंत्र भी बनाया था। जिसे रावण हट्टा का नाम मिला।

10. शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने रावण के पुत्र मेघनाद को ही नहीं उसके दूसरे पुत्रों जैसे प्रहस्त और अतिकाय को भी मारा था।

11. जिस समय श्री राम वनवास को गए थे उस समय उनकी आयु 27 वर्ष थी। राजा दशरथ नहीं चाहते थे की राम वन जाये। इसीलिए राजा दशरथ ने उन्हें सुझाव दिया की वे उन्हें बंदी बना लें और राजगद्दी पर बैठ जाये लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ऐसा कभी नहीं करते।

12. वनवास के दौरान श्री राम ने एक कबंध नामक श्रापित राक्षस का वध किया था। उसी ने राम को सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया था।

13. रावण जब विश्व विजय पर निकला तो उसका युद्ध अयोध्या के राजा अनरण्य के साथ हुआ। जिसमे रावण विजयी रहा। राजा अनरण्य वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने मरते हुए श्राप दिया की तेरी मृत्यु मेरे कुल के एक युवक द्वारा होगी।

14. बाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से जा रहा था। उसने एक सुन्दर युवती को तप करते देखा। वह युवती वेदवती थी जो भगवान विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण उस पर मोहित हो गया और उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने का प्रयास करने लगा। तब उस युवती ने रावण को श्राप दिया की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी और उसने अपने प्राण त्याग दिए।

15. श्री राम के भाई राजकुमार भरत को अपने पिता की मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था। उसने स्वप्न में देखा की उसके पिता काले कपड़ों में लाल रंग की फूलों की माला पहने हुए  एक रथ में बैठकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं। और पिले रंग की स्त्रियां उनपर फूलों की वर्षा कर रही है।

16.पाताल का राजा अहिरावण और उसका भाई महिरावण बेहद ही शक्तिशाली असुर थे। अहिरावण ने राम और लक्षमण को बंदी बना लिया था। प्रभु राम और लक्षमण को बचाने और अहिरावण-महिरावण के वध के लिए हनुमान को पंचरूपी रूप लेना पड़ा था। 

17.   रावण महाज्ञानी विद्वान था। भगवान राम ने भी उन्हें महाब्राह्मण कहा था। इसलिए जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब प्रभु राम ने लक्षमण से रावण के पास जाकर उससे ज्ञान अर्जित करने को कहा था।

18. रावण जब अपने विश्व विजय अभियान पर था तो वह यमपुरी पहुंचा। जहाँ उसका युद्ध यमराज से हुआ। जब यमराज ने उसपर कालदंड का प्रहार करना चाहा तो ब्रह्मा जी ने उन्हें रोक दिया। क्यूंकि वरदान के कारण रावण का वध किसी देवता द्वारा संभव नहीं था।

19. माना जाता है की गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है वे भगवान राम के आशीर्वाद के कारण है। जिस समय लंका पर आक्रमण करने के लिए राम सेतु का निर्माण हो रहा था उस समय एक गिलहरी इस काम में मदद कर रही थी। उसके इस समर्पण भाव को देखकर श्री राम ने प्रेम पूर्वक अपनी अंगुलियां उसकी पीठ पर फेरी थी। ऐसी मान्यता है की  तब से उसके शरीर पर धारियां पड़ गई ।

20. राम-रावण के युद्ध के दौरान भगवान राम के लिए इंद्र ने अपना रथ भेजा था जिस पर बैठकर राम ने रावण का वध और युद्ध में विजय प्राप्त की थी।

21. पाठको आपको जानकर हैरानी होगी की श्री राम का अवतार एक पूर्ण अवतार नहीं माना जाता। श्री राम 14 कलाओं में पारंगत थे जबकि श्री कृष्ण 16 कलाओं में पारंगत थे। ऐसा इसलिए था की रावण को वरदान प्राप्त थे की उसे कोई देवता नहीं मार सकता। उसका वध कोई मनुष्य ही कर सकता है।

ऐसा माना जाता है की आज तक हनुमान से बड़ा भक्त कोई नहीं हुआ। हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु राम के हमेशा समीप ही रहा करते थे। और प्रभु राम भी अपने भक्त हनुमान जी को भाई के समान ही प्रेम करते थे। इसी स्वामिभक्ति के कारण मृत्यु के देवता कालदेव अयोध्या आने से डरते थे। तो पाठकों आइये जानते हैं की वो कौन से कारण थे जिसकी वजह से हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?

हनुमान जी भक्ति

ये तो हम सभी जानते हैं की इस दुनिया में जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन मरना ही है। यही नियम प्रभु श्री राम पर भी लागू होते है। क्योंकि त्रेता युग में उन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया था। जब प्रभु राम के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य पूरा हो गया। तब उन्होंने पृथ्वीलोक छोड़ने का निश्चय किया। परन्तु कालदेव तब तक श्रीराम को मृत्युलोक से नहीं ले जा सकते थे जब तक हनुमान जी उनके साथ हो।  श्री राम जानते थे कि अगर उनके जाने की बात हनुमान जी को पता चलेगी तो वह पूरी पृथ्वी उत्तल पुथल कर देंगे।  क्योंकि उनके जैसा राम भक्त इस दुनिया में कोई और नहीं है।

अंगूठी की खोज 

जिस दिन कालदेव को अयोध्या आना था उस दिन श्री राम ने हनुमान जी को मुख्य द्वार से दूर रखने का एक तरीका निकाला। उन्होंने अपनी अंगूठी महल के फर्श में आई एक दरार में डाल दी। और हनुमान जी को उसे बाहर निकालने का आदेश दिया। उस अंगूठी को निकालने के लिए हनुमानजी ने स्वयं ही उस दरार जितना सूक्ष्म आकार ले लिया और अंगूठी खोजने लग गए। जब हनुमानजी उस दरार के अंदर घुसे तो उन्हें समझ में आया कि यह कोई दरार नहीं बल्कि सुरंग है। जो की नागलोक की ओर जाती है। वहां जाकर वे नागों के राजा वासुकी से मिले। नागों के राजा वासुकि ने हनुमान जी से नागलोक आने का कारण पुछा। हनुमान जी ने बताया की मेरे प्रभु राम की अंगूठी पृथ्वी में आई दरार से होते हुए यहाँ आ गई है उसे ही में खोजने आया हूँ।

तब वासुकी हनुमान जी को नागलोक के मध्य में ले गए और अंगूठियों का एक बड़ा सा ढेर दिखाते हुए कहा कि यहां आपको प्रभु राम की अंगूठी मिल जाएगी। पर उस अंगूठी के ढेर को देख हनुमान जी कुछ परेशान हो गए। और सोचने लगे कि इतने बड़े ढेर में से श्री राम की अंगूठी खोजना तो रुई  के ढेर से सुई निकालने के समान हैं। उसके बाद जैसे ही उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो वह श्री राम की थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की उन्हें अपने प्रभु की अंगूठी पहले ही प्रयास में मिल गयी। उन्हें और आश्चर्य  तब हुआ जब उन्होंने दूसरी अंगूठी उठाई क्योंकि उस पर भी श्री राम ही लिखा हुआ था। इस तरह उन्होंने देखा की ढेर सारी अंगूठियों पर श्री राम ही लिखा है। यह देख हनुमान जी  को एक पल के लिए यह समझ ना आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

कालदेव का अयोध्या आगमन

हनुमान जी उदास देख वासुकी मुस्कुराए और हनुमान जी से बोले  पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक हैं जहां जो भी आता है उसे एक न एक  दिन वापस लौटना ही होता है। उसके वापस जाने का साधन कुछ भी हो सकता है। और ठीक इसी तरह श्री राम भी पृथ्वी लोक को छोड़ एक दिन विष्णु लोग वापस अवश्य जाएंगे।वासुकि कि यह बात सुनकर हनुमान जी को सारी बातें समझ आ गयी। उनका अंगूठी ढूंढने के लिए आना और फिर नागलोक में पहुंचना, यह सब श्री राम की ही लीला थी। वासुकी की बातें सुनकर उन्हें यह समझ आ गया कि उनका नागलोक में आना केवल श्री राम द्वारा उन्हें उनके कर्तव्य से भटकाने  के उदेश्य था  ताकि कालदेव अयोध्या में प्रवेश कर सके और श्रीराम को उनके जीवनकाल के समाप्त होने की सूचना दे सकें। उसके बाद उन्होंने सोचा की अब जब मैं अयोध्या वापस लौटूंगा तो मेरे प्रभु राम वहां नहीं होंगे। और ज्ब श्री राम नहीं होंगे तो मैं अयोध्या में क्या करूँगा। इसके बाद हनुमान जी अयोध्या वापस नहीं गए। 
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