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देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

जैसा की हम सभी जानते हैं की त्रेता युग में भगवान विष्णु प्रभु श्री राम के रूप में जन्म लिए थे और इस जन्म में महाबली हनुमान उनके सेवक थे। ऐसा माना जाता है की राम भक्त श्री हनुमान चिरंजीवी हैं और पृथ्वी के अंत तक वह यहां मौजूद रहेंगे। परन्तु दर्शकों आज में आपको श्री राम और उनके भक्त हनुमान के कथा की जगह भगवान कृष्ण और महाबली हनुमान जी एक की एक ऐसी कथा के भारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।इस एपिसोड में मैं आपको बताऊंगा की आखिर हनुमान जी और श्री कृष्ण के अस्त्र सुदर्शन चक्र के बिच किस बात को लेकर युद्ध हुआ था और उसका परिणाम क्या हुआ।

कथा के अनुसार एक समय सुदर्शन चक्र को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा की तीनो लोकों में उससे बड़ा कोई कोई भी शक्तिशाली नहीं है। सुदर्शन चक्र  को यह अभिमान हो गया था की भगवान श्री कृष्ण भी अंत में दुष्टों का नाश करने के लिए मेरी ही सहायता लेते हैं। उधर इस बात का ज्ञान जब भगवान् श्री कृष्ण को हुआ तो उन्होंने ने निश्चय किया की किसी भी तरह सुदर्शन चक्र के अहंकार को तोड़ना ही होगा। फिर भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के अभिमान तोड़ने के लिए हनुमान जी की सहायता ली और उन्होंने हनुमान जी को याद किया। कहते हैं की दूर रहते हुए भी भक्त और भगवान दोनों एक दूसरे की बात समझ जाते हैं। इसलिए कृष्ण जी के याद्द करते ही हनुमान जी समझ गए की प्रभु उन्हें याद कर रहे हैं। चूँकि हनुमान जी यह जानते थे की उनके प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण एक ही हैं इसलिए वो बिना किसी  देरी के द्वारका के लिए निकल पड़े और द्वारका पहुंचकर वो श्री कृष्ण से मिलने दरबार में जाने की बजाय द्वारका के राज उपवन में चले गए।

आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध
आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध

उपवन पहुंचने पर उन्होंने देखा की वहां के वृक्षों पर बड़े ही मीठे और रसीले फल लगे हुए हैं। हनुमानजी को भूख भी लगी थी इसलिए उनहोंने वृक्षों से फल तोड़कर खाना शुरू कर दिया। और फिर जब उनका पेट भर गया तो वो वृक्षों और उस पर लगे फलों को तोड़कर फेकने लगे।

उधर जब इस बात का पता दरबार में बैठे श्री कृष्ण को पता चला तो वो मन ही मन मुस्कुराने लगे और फिर उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया की जाकर उस वानर को पकड़ लाये। श्री कृष्ण का आदेश पाते ही उनकी सेना हनुमानजी को पकड़ने के लिए राज उपवन के लिए निकल पड़े। वहां पहुंचकर सेना ने हनुमान जी को ललकारा और कहा हे मूर्ख वानर तुम बाग़ क्यों उजार रहे हो। और इस तरह इन फलों को क्यों तोड़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते की यहाँ का राजा कौन है ? अगर नहीं जानते तो मैं तुम्हे बता दूँ की यहाँ के राजा श्री कृष्ण हैं और वो तुम्हे दरबार में बुला रहे हैं।

सेनानायक की बातें सुनकर महाबली हनुमान ने क्रोध होने का ढोंग करते हुए कहा की कौन कृष्ण, मैं किसी कृष्ण को नहीं जनता। मैं तो प्रभु श्री राम का सेवक हूँ। इसलिए जाओ और अपने राजा कृष्ण दो की मैं नहीं आऊंगा। यह सुन सेनानायक क्रोधित हो उठा और हनुमान जी से बोला अगर तुम अपने आप मेरे साथ नहीं चलोगे तो मैं तुम्हे जबरदस्ती पकड़ कर ले जाऊंगा। फिर जैसे ही श्री कृष्ण की सेना हनुमान जी पकड़ने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही हनुमान जी सारी सेना को पूँछ में लपेटकर राजमहल में फेंक दिया।यह देख सेनापति वहां से भाग गया और श्री कृष्ण को दरबार में आकर बताया की वह कोई साधारण वानर नहीं है।

फिर उसने श्री कृष्ण को सारि बातें बताई। उसके बाद श्री कृष्ण ने अपने सेनापति से कहा की आप उस वानर को जाकर कहिये की श्री राम आपको बुला रहे हैं। यह सुन सेनानायक वहां से हनुमान जी के पास चला गया। इधर श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया की तुम्हे द्वार की रखवाली करनी है और इस बात का भी ध्यान रखना है की कोई भी बिना अनुमति के अंदर ना आ पाए। अगर कोई बिना आज्ञा के अंदर आने का प्रयास करे तो उसका वध कर देना। यह सुन सुदर्शन चक्र द्वार की रखवाली करने लगा। चूँकि श्री कृष्ण ये समझते थे की श्री राम का सन्देश सुनकर हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते हैं।

उधर सेनानायक ने जब हनुमान जी से कहा की श्री राम तुम्हे बुला रहे हैं तो हनुमान जी बिना देर किये दरबार के लिए निकल पड़े और जब दरबार के द्वार पर पहुंचे तो सुदर्शन चक्र ने उन्हें रोकते हुए कहा की मेरी अनुमति के बगैर तुम अंदर नहीं  जा सकते। किन्तु सुदर्शन चक्र यह नहीं जनता था की जब श्री राम बुला रहे हों तब हनुमान जी को तीनो लोकों में कोई नहीं रोक सकता।सुदर्शन की बात सुनकर हनुमान जी ने सुदर्शन से अपना रास्ता छोड़ने के लिए कहा लेकिन सुदर्शन ने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा और फिर दोनों में महाभयंकर युद्ध होने लगा।किन्तु कुछ देर बाद जब हनुमान जी को यह ज्ञात हुआ की  सुदर्शन के साथ युद्ध मे उलझकर मेरा समय बर्बाद हो रहा है तो उन्होंने मन ही मन सोचा की किसी भी तरह इस युद्ध को जल्द ही समाप्त करन होगा।  उसके बाद उन्होंने सुदर्शन को पकड़ कर अपने मुंह में रख लिया।

और फिर वो अंदर दरबार में पहुँच गए। दरवार में पहुंचकर हनुमान जी सबसे पहले श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। यह देख श्री कृष्ण जी ने हनुमान को गले से लगा लिया और फिर उनसे पुछा हनुमान तुम अंदर कैसे आये क्या किसी ने तुम्हे रोका नहीं। तब हनुमान जी ने कहा भगवन सुदर्शन ने रोका था। परन्तु मैंने सोचा आपके दर्शनों में ज्यादा विलम्ब ना हो इसलिए मैं उनके साथ युद्ध में नहीं उलझा। और उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया। इतना कहकर हनुमान जी ने अपने मुँह से सुदर्शन चक्र को निकालकर श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया। यह देख सुदर्शन चक्र का सर शर्म से झुक गया और इस तरह अब उसका घमंड भी चूर हो चूका था।

जैसा की हम सभी जानते हैं की अधिकतर धर्मो में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपवित्र और अशुभ माना जाता है। आपने देखा होगा की मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने या फिर घर के पूजा घर में भी जाने की इजाजत नहीं होती। लेकिन अब ये सवाल उठता है की जब धार्मिक रूप से महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अशुभ और अपवित्र माना जाता है तो फिर वो इस दौरान कोई व्रत क्यों रखती है या फिर इस दौरान उन्हें व्रत करने का कोई फल मिलता भी है या नहीं। क्या ये शास्त्रोन्मत है अगर हाँ तो इसके पीछे क्या कारण है ?

मित्रों इन सवालों का जबाव देने से पहले आपको ये बता दूँ की भागवत पुराण के अनुसार मासिक धर्म के दौरान महिलाएं ब्रह्महत्या जैसी पाप को झेल रही होती है जी हाँ भागवत पुराण वर्णित कथा के अनुसार एक बार इंद्रदेव किसी अपमानजनक बात से गुरु बृहस्पति उनसे नाराज हो गए और वो स्वर्गलोक छोड़कर कहीं चले गए। उधर जब इस बात की सूचना असुरों को मिली तो असुरों ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। जिसमे देवराज राज को पराजय का सामना करना पड़ा और उन्हें अपनी गद्दी छोड़कर भागना पड़ा। उसके बाद इंद्रदेव ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे मदद करने को कहा। तब ब्रह्मा जी इंद्र से बोले इस समस्या से निजात पाने के लिए तुम्हे एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करनी होगी। यदि वह तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हो गए तो तुम्हे स्वर्गलोक वापस मिल जाएगी।

उसके बाद ब्रह्माजी के कहे अनुसार इंद्रदेव एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करने लगे। लेकिन इंद्रदेव इस बात से अनजान थे कि जिनकी वो सेवा कर रहे है उस ज्ञानी की माता असुर है। जिसकी वजह से उस ज्ञानी को असुरों से अधिक लगाव था। असुरों से लगाव की वजह से वो ब्रह्मज्ञानी इंद्रदेव की सारी हवन सामग्री देवताओं की बजाय असुरों को अर्पित कर देते थे।उधर कुछ दिनों बाद जब इस बात का पता इंद्रदेव को चला तो उन्होंने क्रोध में आकर उस ज्ञानी की हत्या कर दी। फिर उन्हें जब यह ज्ञात हुआ की उन्होंने ब्रह्महत्या कर बहुत बड़ा अधर्म कर दिया है तो वो एक फूल में छिपकर भगवान विष्णु की पूजा करने लगे।

क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?
क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?

कुछ दिनों बाद विष्णु जी इंद्रदेव की पूजा से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें बोले हे देवराज ब्रह्महत्या जैसे पाप से मुक्ति के लिए तुम्हे इसे पेड़, भूमि, जल और स्त्री में अपना थोड़ा-थोड़ा पाप बाँटना होगा। साथ मे सभी को एक एक वरदान भी देना होगा। उसके बाद इंद्रदेव सबसे पहले पेड़ से अपने पाप का अंश लेने का अनुरोध किया। तो पेड़ ने पाप का एक चौथाई हिस्सा ले लिया। जिसके बाद इंद्रदेव ने पेड़ को वरदान दिया की मरने के बाद तुम चाहो तो स्वयं ही अपने आप को जीवित कर सकते हो। उसके बाद इंद्रदेव के विनती करने पर जल ने पाप का कुछ हिस्सा अपने सर ले लिया। बदले में इंद्रदेव ने उसे अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति प्रदान की। इसी तरह भूमि ने भी इंद्र देव के पाप का कुछ अंश स्वीकार कर लिया।जिसके बदले इंद्रदेव ने भूमि को वरदान दिया की उस पर आई चोटें अपने आप भर जाएगी।

अंत में इंद्रदेव स्त्री के पास पहुंचे तो स्त्री ने बांकी बचा पाप का सारा अंश अपने ऊपर ले लिया। इसके बदले इंद्रदेव ने स्त्रियों को वरदान दिया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ काम का आनंद ज्यादा ले पाएँगी और ऐसा माना जाता है की तभी से महिलाएं मासिक धर्म के रूप में ब्रह्म हत्या का पाप झेल रही है।

तो मित्रों जैसा की आपने कथा में देखा की जब इंद्रदेव ब्रह्महत्या के पाप को झेल रहे तो उन्होंने फूल में छिपकर विष्णु जी आरधना की थी परन्तु उस समय ना तो उनके सामने कोई भी श्री विष्णु की प्रतिमा थी और नाही वो किसी मंदिर में थे। ठीक इसी तरह महिलाएं भी मासिक धर्म के दौरान व्रत तो कर सकती है लेकिन मंदिर नहीं जा सकती है और ना ही किसी मूर्ति की पूजा कर सकती है। परन्तु अगर इस दौरान ऐसा करती है तो भागवत पुराण के अनुसार उसे पाप माना गया है यानी मासिक धर्म के दौरान अगर कोई स्त्री मंदिर चली जाती है या फिर किसी देव की प्रतिमा को पूजती है तो वो पाप की भागिदार मानी जाती है जिसकी सजा उसे इसी जन्म में भुगतनी पड़ती है। लेकिन आपको ये भी बता दूँ की इस दौरान महिलाएं मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है इसलिए उनका तिरस्कार करने के बजाय उनके मनोबल बढ़ाने का कार्य करें। क्यूंकि कई जगह ऐसा देखा जाता है की जानकारी के आभाव में लोग मासिक धर्म के दौरान महिलाओं से बुरा बर्ताव करने से भी नहीं चूकते। 

दर्शकों आपने पौराणिक कथाओं में अप्सराओं के बारे में पढ़ा या सुना होगा। इन कथाओं में अप्सराओं को एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिलाओं के रूप में दर्शाया जाता है जो देवराज इंद्र की सभा में नृत्य और गायन का काम करती है और जरूरत पड़ने पर अप्सराएं स्वर्ग लोक में रहनी वाली आत्माओं एवं देवों का वासना की पूर्ति भी करती है। लेकिन  इन बातों में कितनी सच्चाई है ये कोई नहीं जानता क्यूंकि अप्सरों का उल्लेख सिर्फ धर्मग्रंथों में ही मिलती है। हालाकिं हिन्दू धर्मग्रंथों के अलावा चीनी और यूनानी धर्म ग्रन्थ में भी अप्सराओं का उल्लेख मिलता है परन्तु  उनमे अप्सराओं का चरित्र हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित चरित्र से काफी भिन्न हैं और उनके नाम भी अलग है। लेकिन इन अप्सराओं में कुछ अप्सराएं ऐसी भी थी जिसने मनुष्य जाति का इतिहास बदल कर रख दिया। तो दर्शकों आइये जानते हैं कुछ ऐसी अप्सराओं की प्रेम की कथा के बारे में जिसने देवराज इंद्र के कहने पर पृथ्वी लोक पर अवतरित तो हुई परन्तु  उसे किसी ना किसी से प्रेम हो गया और वो यहीं की होकर रह गयी।
पौराणिक काल की अप्सराएं
पौराणिक काल की अप्सराएं

हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वर्गलोक की अप्सराएं इतनी सुंदर होती थी की किसी भी सिद्ध पुरुष का मन बस उसे एक बार देख लेने से  ही डोल जाता था। तभी तो जब कभी कोई ऋषि-या महर्षि कठोर तप करने लगते थे और देवराज इंद्र को अपना सिंहासन खतरे में लगने लगता था तो वो इन सुंदरी का उपयोग उनकी तपस्या भांग करने के लिए किया करते थे।  और इसी कड़ी में कई अप्सराओं को इन ऋषि-महर्षियों से प्रेम हो गया और आज भी उनका वंश पृथ्वीलोक  पर मौजूद है। इस कड़ी में सबसे पहला नाम आता है :-

1) मेनका

हिंदू पौराणिक कथाओं में, मेनका को स्वर्गलोक की अप्सराओं में से सबसे सुंदर माना जाता है। मेनका का जन्म देवों और असुरों द्वारा समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। वह सुन्दर होने के साथ साथ कुशाग्र बुद्धि और सहज प्रतिभा की धनि थी। एक कथा के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र के कठोर तप के कारण इंद्र देव भयभीत हो गए और उन्होंने मेनका को स्वर्ग से धरती पर भेजा ताकि वह विश्वामित्र को अपने रूप और यौवन से लुभा सके और उनका तप भंग हो जाए। मेनका इंद्र का आदेश पाते ही पृथ्वी लोक पर आई और उसने सफलतापूर्वक विश्वामित्र को अपने सौंदर्य के जाल में फंसकर उनकी तपस्या भंग कर दी।  महर्षि विश्वामित्र मेनका के रूप को देखकर उसपर मोहित हो गए और उसे प्रेम करने लगे।उधर मेनका भी विश्वामित्र के साथ वास्तविक प्रेम में पड़ गई। फिर दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे। कुछ समय बाद दोनों के संयोग से एक पुत्री का जन्म हुआ  जो बाद में ऋषि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी और शकुंतला के नाम से प्रसिद्ध हुई।  बड़े होने पर शकुंतला का विवाह राजा दुष्यंत से हुआ। विवाह के पश्चात् शकुंतला और राजा दुष्यत के संयोग से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम भरत रखा गया और उसी भरत के नाम पर आज हमारे देश का नाम भारत है। 

2) उर्वशी

अप्सरा उर्वशी का सौंदर्य भी बड़ा ही मनमोहक था। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी उर्वशी एक बार इन्द्र की सभा में नृत्य कर रही थी उस समय राजा पुरुरवा भी वहां उपस्थित थे और उसके सौंदर्य को देखकर वो उसके प्रति आकृष्ट हो गए। उधर उर्वशी भी राजा पुरुरवा पर मोहित हो गयी जिसकी वजह से उर्वशी की ताल बिगड़ गई थी। इस बात का पता जब देवराज इंद्र को चला तो वो क्रोधित हो उठे और उन्होंने दोनों को मृत्युलोक में रहने का शाप दे दिया। उसके बाद राजा  पुरुरवा और उर्वशी कुछ शर्तों के साथ पति-पत्नी बनकर मृत्युलोक में रहने लगे। दोनों के कई पुत्र हुए। जिनमे से आयु के पुत्र नहुष हुए। नहुष के ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख पुत्र थे। इन्हीं में से ययाति के यदु, तुर्वसु, द्रुहु, अनु और पुरु हुए। यदु से यादव और पुरु से पौरव हुए। पुरु के वंश में ही आगे चलकर कुरु हुए और कुरु से ही कौरव हुए। भीष्म पितामह कुरुवंशी ही थे।

महाभारत के अनुसार उर्वशी एक बार इन्द्र की सभा में अर्जुन को देखकर आकर्षित हो गई थी और उसने अर्जुन से निवेदन किया था की वो उसके साथ रमन करे परन्तु अर्जुन ने यह कहते हुए मना कर दिया की हे देवी ! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता समान हैं। और अर्जुन के मुख से ऐसी बातें सुनकर उर्वशी उसे  1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया था। इसी तरह अप्सरा उर्वशी से सम्बंधित सैकड़ों कथाएं पुराणों में मिलती हैं।

3) पुंजिकस्थला

एक ओर जहां उर्वशी और मेनका ने पुरुरवा के वंश को आगे बढ़ाया वहीं पुंजिकस्थला ने वानर वंश को आगे बढ़ाया था। माता अंजनी से हनुमान के जन्म की कथा तो हम सब ने सुनी है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं की माता अंजनी किसी समय इंद्र के दरबार में पुंजिकस्थला नामक एक अप्सरा हुआ करती थी। ऐसा माना जाता है की एक बार पुजिंकास्थला ने तपस्या करते एक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी। गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने दया दिखाई और कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, इस तरह अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

इस शाप के बाद पुंजिकस्थला धरती पर चली गई और वहां एक शिकारन के रूप में रहने लगी। वहीं उनकी मुलाकात केसरी से हुई और दोनों में प्रेम हो गया। केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया पर संतान सुख से वंचित थे। तब मतंग ऋषि की आज्ञा से अंजना ने तप किया। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया, कि तुम्हारे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा। पवनदेव की कृपा से पुंजिकस्थला को एक पुत्र मिला जिसका नाम आंजनेय रखा गया जो आगे चलकर बजरंग बलि और हनुमान के नाम से प्रसिद्ध हुए।

4) रम्भा

रम्भा अपने रूप और सौन्दर्य के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी । और यही कारण था कि हर कोई उसे अपना बनाना  चाहता था। रामायण में कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी के रूप में रम्भा का उल्लेख मिलता है। रामायण के अनुसार रावण ने रम्भा के साथ बलात्कार करने का प्रयास किया था जिसके चलते रम्भा ने उसे शाप दिया था कि आज के बाद जब भी तुम न चाहने वाली किसी स्त्री से संभोग करेगा, तब तुझे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। माना जाता है कि इसी शाप के भय से रावण ने सीताहरण के बाद सीता को छुआ तक नहीं था। वहीं महाभारत’ में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है।इसके आलावा एक कथा के अनुसार एक बार विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलवाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा। परन्तु जब वो पृथ्वीलोक पर आई तो ऋषि विश्वामित्र उसे देखते ही इन्द्र का षड्यंत्र समझ गए और उन्होंने रंभा को हजार वर्षों तक शिला बनकर रहने का शाप दे डाला। सवाल यह उठता है कि अपराध तो इंद्र ने किया था फिर सजा रंभा को क्यों मिली? हालांकि वाल्मीकि रामायण की एक कथा के अनुसार एक ब्राह्मण द्वारा यह ऋषि के शाप से मुक्त हुई थीं।

प्रभु श्री राम। इन्हे कौन नहीं जानता। हिन्दू धर्म के सबसे बड़े राजा जिन्होंने करीब 10,000 से  तक शासन किया। लेकिन बहुत से लोग ये नहीं जानते जी उनकी मृत्यु कैसे हुई ?

सबसे पहले में आपको बताना चाहता हु की प्रभु श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे। भगवान विष्णु के अवतारों की मृत्यु नहीं होती वे अपने अवतार वाले शरीर को त्याग के अपने लोक में वापस चले जाते है। 

इस भौतिक जगत में जो आता है वो पहले ही अपनी मृत्यु का समय निश्चित करवा के आता है। जो यहाँ सांसारिक सुख भोगने के लिए जन्मा है वह वापस अवश्य जायेगा। परन्तु मृत्यु की बात भगवान पर लागू नहीं होती। भगवान अदृश्य या अंतर्लीन होते हैं,उनकी मृत्यु नहीं होती। तो आइये जानते हैं की प्रभु श्री राम कैसे इस भौतिक जगत से अदृश्य हुए थे ?

प्रभु राम की कथा

भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाने वाले राम धर्म का सन्देश देने के लिए अवतरित हुए थे। महर्षि बाल्मीकि ने प्रभु श्री राम से सम्बंधित अनेक कथाएं लिखी है। जिनके द्वारा कलयुग में भगवान को जानने का अवसर मिलता है। प्रभु श्री राम ने पृथ्वी पर दस हजार वर्षों तक शासन किया। अपने पूरे जीवन कल में प्रभु श्री राम अनगिनत महान कार्य किये। जिनके द्वारा उन्होंने लोगों को एक आदर्श जीवन जीने का सन्देश दिया। प्रभु श्री राम के राज्य में प्रजा अत्यधिक प्रसन्न एवं संतुष्ट थी। वह माता-पिता दशरथ और कौशल्या के आदर्श पुत्र तथा धर्मपत्नी सीता के लिए आदर्श पति थे। तो आखिर क्या कारण था की भगवान को सब कुछ त्यागकर लोप होना पड़ा।

कालदेव का आगमन

पदम् पुराण में उल्लेखनीय एक कथा के अनुसार एक दिन भगवान राम के दरबार में एक वृद्ध संत का आगमन हुआ। जो भगवान से कुछ व्यक्तिगत रूप से अकेले में बात करना चाहते थे। राम ने उस संत का निवेदन स्वीकार किया तथा एक कक्ष में चर्चा करने के लिए गए। उस कक्ष के द्वार पर अपने सहोदर लक्षमण को खड़ा किया। और कहा की चर्चा में व्यघ्न डालने वाले को मृत्यु दंड प्राप्त होगा। लक्षमण ने बड़े भाई की आज्ञा का पालन किया। उल्लेखनीय है की वह वृद्ध संत कालदेव थे। जिन्हे विष्णु लोक यह बताने के लिए भेजा गया था की धरतीलोक पर उनकी समय अवधि समाप्त हो चूकि है। और उन्हें अब वैकुण्ठ धाम वापस लौटना होगा।

ऋषि दुर्वाशा का क्रोध

जब चर्चा चल रही थी उसी समय ऋषि दुर्वाशा का आगमन हुआ। उन्होंने लक्षमण से अंदर जाने को कहा,परन्तु भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए लक्षमण ने उन्हें प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। यह सुन ऋषि दुर्वाशा क्रोधित हो गए और लक्षमण को चेतावनी देते हुए कहा की यदि उन्हें अंदर नहीं जाने दिया तो वह राम को श्राप दे देंगे। यह सुन लक्षमण चिंतित हो गए की भाई की आज्ञा का पालन करें या उन्हें श्राप बचाये।

लक्षमण की मृत्यु  

संकट  में पड़े लक्षमण ने सोचा यदि वह स्वंय अंदर चले गए तो मृत्युदंड भुगतना पड़ेगा। और राम श्राप से बच जायेंगे,उन्होंने ऐसा ही किया। पर अपने भाई को चर्चा में बाधा डालते देख भगवान राम धर्म संकट में पड़ गए। फिर राम ने लक्षमण को राज्य तथा देश छोड़कर जाने को कहा जो उस समय मृत्युदंड के समान ही माना जाता था। लेकिन लक्षमण के लिए अपने भाई से दूर रहना संभव नहीं था। तो उन्होंने स्वंय ही ओस संसार को छोड़ने का निर्णय ले लिया। वे सरयू नदी में समां गए और नदी के अंदर अनंत शेष का अवतार लिया। और विष्णु लोक की ओर प्रस्थान कर गए।

भगवान श्री राम की अंगूठी लेने गए हनुमान

भगवान श्री राम यह भली-भांति जानते थे कि, पृथ्वी पर जिस किसी की निर्मिती हुई है उसका अंत निश्चित है, यह विधि का विधान है। इसीलिए एक दिन जब वह शरयू नदी के किनारे विहार कर रहे थे तब जानबूझकर अपनी अंगूठी को नीचे गिरा दिया और हनुमान को उस अंगूठी को खोजने के लिए भेज दिया। अगर भगवान राम जानबूझकर हनुमान के साथ यह खेल खेलते तो, हनुमान कभी भी भगवान श्रीराम को मरने नहीं देते।

वहीं जब हनुमान अंगूठी खोजने के लिए गए तो बहुत सीधे पाताल पहुंच गए वहां उपस्थित नागराज वासुकी ने हनुमान से आने का कारण पूछा तो हनुमान ने बताया कि, मैं प्रभु श्री राम की अंगूठी खोजने के लिए आया हूं। तब वासुकी ने अपने सामने एक अंगूठी के ढेर पर उंगली का इशारा किया। यह आश्चर्य की बात यह है कि, हनुमान जिस किसी अंगूठी को उठाते वह राम की ही होती यानी वहां उपस्थित सभी अंगूठियां एक जैसी थी।

आखिर कैसे हुई भगवान श्री राम की मृत्यु ? How Lord Rama left the World
आखिर कैसे हुई भगवान श्री राम की मृत्यु ? How Lord Rama left the World











श्री राम का देहत्याग

भातृ प्रेम में डूबे भगवान राम को लक्षमण के बिना एक क्षण भी व्यतीत करना अच्छा ना लगा। तब श्री राम ने शासन छोड़कर इस लोक से चले जाने का निर्णय लिया। और सरयू नदी की ओर चले गए। श्री राम सरयू नदी के तल तक जाकर अदृश्य हो गए और कुछ देर बाद भगवान विष्णु प्रकट हुए। इस प्रकार भगवान राम लोप हो गए।

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷

🌷भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang🌷

भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang
भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang
एक मछली तालाब में अपने परिवार के साथ रहती थी, तालाब में पानी कभी सूख भी जाता था तो परमेश्वर को याद करती, पूजा तप आदि करती थी। 

एक दिन तूफ़ान और बारिश आयी जिससे मछली का परिवार बहकर नदी में बहने लगा, मछली ने व् उसके परिवार ने नदी के विपरीत दिशा में बहने की काफी कोशिश् की पर उनकी एक न चली, 

थक हारकर नदी के प्रवाह में ही बहकर ईश्वर को खूब कोसा और भला बुरा कहा और कुछ दिन में ही समुन्दर में पहुच गये, 

वहाँ जाकर उनको अहसास हुआ क़ि ईश्वर ने हमको दरिया से निकाल कर विशालता में ला दिया उसने हमारे जीवन में तूफ़ान लाकर अपने विशाल स्वरुप से जोड़ दिया। 

संगत जी हर पल उसकी रजा में राजी रहो, वो पूरा समुन्दर दे रहा है और हम एक चम्मच लेकर खड़े हैं, हम उसके हर कार्य के लिए कोसते रहते हैं, वो पालनहार कैसे बुरा कर सकता है

🌷 *गुरु सत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग :: सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय : Sona Kaee Na Lage, Loha Ghun Nahin Khaay. Bura Bhala Guru Bhakt, Kabhoo Nark Nahin Jaay :: GuruSatsang
सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय।।।। गुरु सत्संग स्वामी ।।
जीव को सन्त सतगुरु इसी प्रकार अपने जैसा बना लेता है जैसे भृंगी कीड़ा स्वयं अपने गर्भ से किसी भृंगी की उत्पत्ति नहीं करता बल्कि वह किसी भी दूसरी जाति के मृत कीट को उठा कर ले आता है। उसको वह अपने घरौंदे में रख लेता है और उसे वह अपनी शब्द ध्ुन सुना कर न केवल जीवित कर लेता है बल्कि वह उस कीट को भृंगी ही बना देता है अथवा वह अपना स्वरूप भी उसको दे देता है। अतः सन्त सतगुरु भी अपने शिष्य के जगत और अगत को उसी प्रकार से सुखी बना देता है जिस प्रकार से उसके अपने जगत-अगत सुखी होते हैं। परन्तु इस बात के लिए उनकी एक ही शर्त होती है कि जीव उनके वचनों के अनुसार बरते यानि व्यवहार करता रहे।
---परम सन्त हुजूर साहेब जी महाराज 

आज के कलिकाल में सन्तों ने जीव के उद्धार के लिए उसको सभी दुःखों से छुटवाकर उसे सदा के लिए मुक्ति प्राप्त करने का सरल व सहज मार्ग बताया। वह मार्ग है नाम का मार्ग। परन्तु यह मार्ग इतना सरल व सहज भी नहीं है। इस मार्ग पर चलने वाले जीव को तन, मन और धन की जगात अपने सतगुरु को देनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में जीव को अपना सब कुछ त्याग कर ही जगत और अगत के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
--- परम साहेब जी महाराज ॥

चार से विवाद मत करो 

1. मुर्ख से 
2. पाग़ल से 
3. गुरु से
4. माता पिता से 

चार से शर्म नही करना 

1 पुराने कपडे में
2. गरीब साथियों में
3. बूढ़े माता पिता में
4. सादे रहन सहन में
🌷 *Guru Satsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग :: जीवन का यही विधान है - ज़िंदगी ही समस्या है और ज़िंदगी ही निदान है - Jeevan ka Yahee Vidhaan Hai - Zindagee Hee Samasya Hai Aur Zindagee Hee Nidaan Hai :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: जीवन का यही विधान है - ज़िंदगी ही समस्या है और ज़िंदगी ही निदान है - Jeevan ka Yahee Vidhaan Hai - Zindagee Hee Samasya Hai Aur Zindagee Hee Nidaan Hai :: GuruSatsang
*युग-युगान्तर से*
*जीवन का यही विधान है,*
*ज़िंदगी ही समस्या है*
*और ज़िंदगी ही निदान है।*🙏

घर में रहो कमा के खाओ,
पर धन पर तिरीया से नेह ना लगाओ ।
पर नारी पैनी छुरी,तीन कोन से खा ।
धन हड़े जौवन हडें अंत पंचा में लेजा ।।
चाहना रख एक राम नाम की, सारा धोना धो देगी ।
इससे दूजी चाहना तुझे, दूनिया जहांन से खो देगी ।।
सतगुरु परम संत जी महाराज

तड़प रही है रूह मेरी 
करार पाना चाहती है
पुकार लो मुझको मेरे मुर्शिद
आपकी चौखट पर आना चाहती है
दिल नहीं लगता पल भर को भी
कैसे जिन्दगी गुजारू मैं
कर दो करम मेरे सतगुरू
जिन्दगी जिन्दगी पाना चाहती है🌹

*हर संकट व दुख को हरण करने वाली जो शक्ति है उसका नाम हनुमान है........*
*या अपने शब्दों में कहूं तो वह सतगुरु का बक्शा हुवा नाम है..........*

*ओर यह मन मनाक पर्वत है..........*
*जब तक नाम रूपी हनुमान को हम धारण नहीं करते तब तक मनाक रुपी पर्वत को पार करना मात्र कल्पना हैं।*

*आप सब को कर बन्ध्द जी।*
*मालिक सब की खुशीयों से झोली भरे।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग :: गौर कर प्यारे : Gaur Kar Pyaare :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: गौर कर प्यारे : Gaur Kar Pyaare :: GuruSatsang
🙏🏽☝🏽🙏🏽
“गौर कर प्यारे”

एक फटा हुआ नोट किसी छोटे दुकानदारों के पास नहीं चलता।

लेकिन वह नोट बड़ा "व्यापारी" ले लेता हैं। और वह क्या करता है ....???

उस नोट को गोंद या टेप से चिपकाता है और सफाई करके साफ़ नोटों की गड्डी के बीच मे मिला कर चला देता है।

इसी तरह हमारे "सतगुरु" हम जैसे पापी जीवों को... गुरमुखो के बीच मिला कर साफ करके हमे भवसागर से पार कर देते है।
🙏🏽☝🏽🙏🏽
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग : हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये : Hamen jo Yah Janam Maalik Ne Diya Hai Ise Vyarth Na Gavaaye :: GuruSatsang
गुरुसत्संग : हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये : Hamen jo Yah Janam Maalik Ne Diya Hai Ise Vyarth Na Gavaaye :: GuruSatsang
*सतगुरु जी कहते है हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये।*

*हमारा हर दिन नया जन्म है हमारी हर साँस उस मालिक की दी हुई है। हमें नहीं मालूम कब यह डोर टूट जायेगी।*

*हमें चहिये की हर समय मालिक को पाने के लिए भजन सिमरन करते रहे मालिक अपने तरफ कदम बढ़ाने वाले को आगे हो कर गले लगते है।जो मालिक का प्यारा बन जाता है उसे हमेशा के लिए अपने चरणो में जगह देते है।।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग :: सब सिमरण पे तो बैठते है - Sab Simaran Pe to Baithate Hai :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: सब सिमरण पे तो बैठते है - Sab Simaran Pe to Baithate Hai :: GuruSatsang
कोई दस मिनट कोई बीस मिनट और कोई घंटा दौ घण्टा पर शब्द धुन को हम समय देना जरुरी नही समझते पर पार लगाने वाली शक्ति शब्द धुन ही है मन को काबू करने वाली ताकत शब्द में ही है संतो की वाणी में शब्द धुन की महिमा कुछ इस तरह मिलती है-

" धुन सुन कर मन समझाई ।
कोटि यत्न से ये नही माने।।"

तू बैठ अकेला ध्यान धर 
तो मिले निशानी शब्द की।

बिन शब्द उपाय न दूजा
काया का छुट्टे न कुजा।।

हम वासी उस देश के,
जहां ज़ात वर्ण कुल नाही।।
शब्द मिलावा होये रहे।
देह मिलावा नाही।।

आँख कान मुख बंद कराओ
अनहद झींगा शब्द सुनाओ

सुनता नही धुन की खबर 
अनहद का बाजा बाजता।

शब्द शब्द की रेख कटाई।
शब्द शब्द में जाये मिलाई।।

सिमरण से भी जरुरी शब्द धुन का अभ्यास है.
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *GuruSatsang*🌷
सत्संग से क्या खोया - क्या पाया : What did you Lose from Satsang - What did you Find :: GuruSatsang
सत्संग से क्या खोया - क्या पाया : What did you Lose from Satsang - What did you Find :: GuruSatsang
एक बार एक सज्जन ने किसी सत्संगी से पूछा ,"तुमने पूरी जिंदगी सत्संग में गुजार दी , तुमने ऐसा क्या पाया"
सत्संगी ने मुस्कराते हुए कहा , "मैंने क्या पाया है ये तो पता नहीं , लेकिन मैंने कुछ खोया जरूर है" 

सज्जन बोले क्या ? 

सतसंगी ने कहा, वो है मेरा क्रोध , वो है मेरा तनाव , वो है मेरा घमण्ड , वो है मेरा लालच , वो है मेरा स्वार्थ , वो है मेरी ईर्ष्या , वो है मेरी भटकती सांसारिक इच्छाएँ और मौत का डर...!!

🌷 *GuruSatsang*🌷
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