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देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

रामायण को हिन्दू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ माना गया है। इसमें कई ऐसी कथाएं हैं जिन्हे आमतौर पर तो सब लोग जानते हैं। लेकिन कुछ ऐसी बातों का भी वर्णन इसमें मिलता है जिसे अधिकतर जनमानस नजान हैं। जैसे देवी सीता लंका में बिना अन्न-जल ग्रहण किये इतने समय  जिन्दा कैसे रही? या गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है उनसे प्रभु राम के क्या सम्बन्ध है ? इस लेख में हम आपको बताएँगे रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य के बारे में।
रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य
01. रामायण संस्कृत का एक महाकाव्य है जो कवी बालमीकि द्वारा रचित है। इस महाकाव्य में 24000 छंद है जो 7 अध्याय या खंड में विभाजित है। पाठकों अगर हम रामायण के हर हजार छंद का पहला अक्षर लें तो जो 24 अक्षर हमे मिलते हैं वो मिलकर गायत्री मन्त्र बनते हैं। 

02. श्री राम की माँ कौशल्या,कौशल देश की राजकुमारी थी। इनके पिता का नाम सकौशल व माता का नाम अमृत प्रभा था। पूर्वजन्म में भगवान विष्णु ने कौशल्या को त्रेता युग में उनके गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया था। इसी कारण वो भगवान राम के रूप में इस धरती पर अवतरित हुए।

03.रामायण के कई संस्करण हैं। इन्ही में से एक आनंद रामायण के अनुसार रावण ने न केवल देवी सीता का अपहरण किया था। बल्कि कौशल्या का भी अपहरण किया था। ब्रह्मा जी ने रावण को पहले ही बता दिया था कि दशरथ और कौशल्या का पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। अपनी मृत्यु को टालने के लिए रावण ने कौशल्या का अपहरण कर उसे एक डिब्बे में बंद करके कौशल्या को एक समुद्र से घिरे द्वीप पर छोड़ दिया था।

04.  श्री राम की एक बहन भी थी जिसका नाम शांता था। जिसको बचपन में ही कौशल्या ने अपनी बहन वर्षनी और अंगदेश के राजा गोपद को गोद दे दिया था। इसलिए रामायण में शांता का वर्णन नहीं मिलता।

05.  माना जाता है की देवी सीता भगवान शिव के धनुष को बचपन से ही खेल-खेल में उठा लेती थी । और इसलिए  उनके स्वंयवर में इस धनुष जिसका नाम पिनाका था,उस पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त रखी गयी थी ।

06. एक बार रावण जब भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत गए। उन्हें मार्ग में नंदी मिले जिनको रावण ने वानर के मुँह वाला कहकर उसका उपहास उड़ाया। नंदी ने तब रावण को श्राप दिया की वानरों के कारण ही तुम्हारी मृत्यु होगी। आगे चलकर क्या हुआ ये तो सब जानते ही हैं।

07. अपने विजय अभियान के दौरान रावण जब स्वर्ग पहुंचा तो वहां उसे रम्भा नाम की एक अप्सरा मिली। रावण उस पर मोहित हो गया। रावण ने उसे छूने का प्रयास किया तो उसने कहा की मैं आपके भाई कुबेर पुत्र नलकुबेर के लिए आरक्षित हूँ। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधु के समान हूँ। पर रावण अपनी शक्ति में इतना चूर था की उसने उसकी एक ना मानी। जब नलकुबेर को इस बात का पता चला तो उसने रावण को श्राप दिया की आज के बाद यदि रावण ने किसी पराई स्त्री को उसके इच्छा के विरुद्ध छुआ तो उसके मस्तक के 100 टुकड़े हो जायेंगे।

08.  जिस दिन रावण सीता का हरण करके अशोक वाटिका में लाया था। उसी दिन ब्रह्मा ने एक विशेष खीर इंद्र के हाथों देवी सीता तक पहुंचाई थी। इंद्र ने देवी सीता के पहरे पर लगे राक्षसों को अपने प्रभाव से सुला दिया। जिसके बाद इंद्र ने देवी को वो दिव्य खीर दी जिसे ग्रहण कर देवी सीता की भूख प्यास शांत हो गयी। और वो अशोक वाटिका में बिना कुछ भी खाये पिए रह सकी।

09. रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। भगवान शिव के भजन कीर्तन के लिए रावण ने एक बार अपनी बाजू काटकर उससे एक वाद्ययंत्र भी बनाया था। जिसे रावण हट्टा का नाम मिला।

10. शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने रावण के पुत्र मेघनाद को ही नहीं उसके दूसरे पुत्रों जैसे प्रहस्त और अतिकाय को भी मारा था।

11. जिस समय श्री राम वनवास को गए थे उस समय उनकी आयु 27 वर्ष थी। राजा दशरथ नहीं चाहते थे की राम वन जाये। इसीलिए राजा दशरथ ने उन्हें सुझाव दिया की वे उन्हें बंदी बना लें और राजगद्दी पर बैठ जाये लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ऐसा कभी नहीं करते।

12. वनवास के दौरान श्री राम ने एक कबंध नामक श्रापित राक्षस का वध किया था। उसी ने राम को सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया था।

13. रावण जब विश्व विजय पर निकला तो उसका युद्ध अयोध्या के राजा अनरण्य के साथ हुआ। जिसमे रावण विजयी रहा। राजा अनरण्य वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने मरते हुए श्राप दिया की तेरी मृत्यु मेरे कुल के एक युवक द्वारा होगी।

14. बाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से जा रहा था। उसने एक सुन्दर युवती को तप करते देखा। वह युवती वेदवती थी जो भगवान विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण उस पर मोहित हो गया और उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने का प्रयास करने लगा। तब उस युवती ने रावण को श्राप दिया की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी और उसने अपने प्राण त्याग दिए।

15. श्री राम के भाई राजकुमार भरत को अपने पिता की मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था। उसने स्वप्न में देखा की उसके पिता काले कपड़ों में लाल रंग की फूलों की माला पहने हुए  एक रथ में बैठकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं। और पिले रंग की स्त्रियां उनपर फूलों की वर्षा कर रही है।

16.पाताल का राजा अहिरावण और उसका भाई महिरावण बेहद ही शक्तिशाली असुर थे। अहिरावण ने राम और लक्षमण को बंदी बना लिया था। प्रभु राम और लक्षमण को बचाने और अहिरावण-महिरावण के वध के लिए हनुमान को पंचरूपी रूप लेना पड़ा था। 

17.   रावण महाज्ञानी विद्वान था। भगवान राम ने भी उन्हें महाब्राह्मण कहा था। इसलिए जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब प्रभु राम ने लक्षमण से रावण के पास जाकर उससे ज्ञान अर्जित करने को कहा था।

18. रावण जब अपने विश्व विजय अभियान पर था तो वह यमपुरी पहुंचा। जहाँ उसका युद्ध यमराज से हुआ। जब यमराज ने उसपर कालदंड का प्रहार करना चाहा तो ब्रह्मा जी ने उन्हें रोक दिया। क्यूंकि वरदान के कारण रावण का वध किसी देवता द्वारा संभव नहीं था।

19. माना जाता है की गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है वे भगवान राम के आशीर्वाद के कारण है। जिस समय लंका पर आक्रमण करने के लिए राम सेतु का निर्माण हो रहा था उस समय एक गिलहरी इस काम में मदद कर रही थी। उसके इस समर्पण भाव को देखकर श्री राम ने प्रेम पूर्वक अपनी अंगुलियां उसकी पीठ पर फेरी थी। ऐसी मान्यता है की  तब से उसके शरीर पर धारियां पड़ गई ।

20. राम-रावण के युद्ध के दौरान भगवान राम के लिए इंद्र ने अपना रथ भेजा था जिस पर बैठकर राम ने रावण का वध और युद्ध में विजय प्राप्त की थी।

21. पाठको आपको जानकर हैरानी होगी की श्री राम का अवतार एक पूर्ण अवतार नहीं माना जाता। श्री राम 14 कलाओं में पारंगत थे जबकि श्री कृष्ण 16 कलाओं में पारंगत थे। ऐसा इसलिए था की रावण को वरदान प्राप्त थे की उसे कोई देवता नहीं मार सकता। उसका वध कोई मनुष्य ही कर सकता है।

ऐसा माना जाता है की आज तक हनुमान से बड़ा भक्त कोई नहीं हुआ। हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु राम के हमेशा समीप ही रहा करते थे। और प्रभु राम भी अपने भक्त हनुमान जी को भाई के समान ही प्रेम करते थे। इसी स्वामिभक्ति के कारण मृत्यु के देवता कालदेव अयोध्या आने से डरते थे। तो पाठकों आइये जानते हैं की वो कौन से कारण थे जिसकी वजह से हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?

हनुमान जी भक्ति

ये तो हम सभी जानते हैं की इस दुनिया में जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन मरना ही है। यही नियम प्रभु श्री राम पर भी लागू होते है। क्योंकि त्रेता युग में उन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया था। जब प्रभु राम के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य पूरा हो गया। तब उन्होंने पृथ्वीलोक छोड़ने का निश्चय किया। परन्तु कालदेव तब तक श्रीराम को मृत्युलोक से नहीं ले जा सकते थे जब तक हनुमान जी उनके साथ हो।  श्री राम जानते थे कि अगर उनके जाने की बात हनुमान जी को पता चलेगी तो वह पूरी पृथ्वी उत्तल पुथल कर देंगे।  क्योंकि उनके जैसा राम भक्त इस दुनिया में कोई और नहीं है।

अंगूठी की खोज 

जिस दिन कालदेव को अयोध्या आना था उस दिन श्री राम ने हनुमान जी को मुख्य द्वार से दूर रखने का एक तरीका निकाला। उन्होंने अपनी अंगूठी महल के फर्श में आई एक दरार में डाल दी। और हनुमान जी को उसे बाहर निकालने का आदेश दिया। उस अंगूठी को निकालने के लिए हनुमानजी ने स्वयं ही उस दरार जितना सूक्ष्म आकार ले लिया और अंगूठी खोजने लग गए। जब हनुमानजी उस दरार के अंदर घुसे तो उन्हें समझ में आया कि यह कोई दरार नहीं बल्कि सुरंग है। जो की नागलोक की ओर जाती है। वहां जाकर वे नागों के राजा वासुकी से मिले। नागों के राजा वासुकि ने हनुमान जी से नागलोक आने का कारण पुछा। हनुमान जी ने बताया की मेरे प्रभु राम की अंगूठी पृथ्वी में आई दरार से होते हुए यहाँ आ गई है उसे ही में खोजने आया हूँ।

तब वासुकी हनुमान जी को नागलोक के मध्य में ले गए और अंगूठियों का एक बड़ा सा ढेर दिखाते हुए कहा कि यहां आपको प्रभु राम की अंगूठी मिल जाएगी। पर उस अंगूठी के ढेर को देख हनुमान जी कुछ परेशान हो गए। और सोचने लगे कि इतने बड़े ढेर में से श्री राम की अंगूठी खोजना तो रुई  के ढेर से सुई निकालने के समान हैं। उसके बाद जैसे ही उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो वह श्री राम की थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की उन्हें अपने प्रभु की अंगूठी पहले ही प्रयास में मिल गयी। उन्हें और आश्चर्य  तब हुआ जब उन्होंने दूसरी अंगूठी उठाई क्योंकि उस पर भी श्री राम ही लिखा हुआ था। इस तरह उन्होंने देखा की ढेर सारी अंगूठियों पर श्री राम ही लिखा है। यह देख हनुमान जी  को एक पल के लिए यह समझ ना आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

कालदेव का अयोध्या आगमन

हनुमान जी उदास देख वासुकी मुस्कुराए और हनुमान जी से बोले  पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक हैं जहां जो भी आता है उसे एक न एक  दिन वापस लौटना ही होता है। उसके वापस जाने का साधन कुछ भी हो सकता है। और ठीक इसी तरह श्री राम भी पृथ्वी लोक को छोड़ एक दिन विष्णु लोग वापस अवश्य जाएंगे।वासुकि कि यह बात सुनकर हनुमान जी को सारी बातें समझ आ गयी। उनका अंगूठी ढूंढने के लिए आना और फिर नागलोक में पहुंचना, यह सब श्री राम की ही लीला थी। वासुकी की बातें सुनकर उन्हें यह समझ आ गया कि उनका नागलोक में आना केवल श्री राम द्वारा उन्हें उनके कर्तव्य से भटकाने  के उदेश्य था  ताकि कालदेव अयोध्या में प्रवेश कर सके और श्रीराम को उनके जीवनकाल के समाप्त होने की सूचना दे सकें। उसके बाद उन्होंने सोचा की अब जब मैं अयोध्या वापस लौटूंगा तो मेरे प्रभु राम वहां नहीं होंगे। और ज्ब श्री राम नहीं होंगे तो मैं अयोध्या में क्या करूँगा। इसके बाद हनुमान जी अयोध्या वापस नहीं गए। 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रावण में तमाम बुराईयां थीं. पर ये भी जग जानता है कि वो प्रकांड पंडित था.
रावण ने मरते हुए कही थीं ये बातें, आज भी दिला सकती हैं सफलता
रावण ने मरते हुए कही थीं ये बातें, आज भी दिला सकती हैं सफलता

जब भगवान राम ने उसका वध किया तो मरने से पहले उसने लक्ष्‍मण को कुछ बातें सिखाई थीं. ये ऐसी बाते हैं, जो आपके-हमारे लिए आज के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक हैं जितनी कि उस समय के लिए थीं-

1. अपने सारथी, दरबान, खानसामे और भाई से दुश्मनी मोल मत लीजिए. वे कभी भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

2. खुद को हमेशा विजेता मानने की गलती मत कीजिए, भले ही हर बार तुम्हारी जीत हो.

3. हमेशा उस मंत्री या साथी पर भरोसा कीजिए जो तुम्हारी आलोचना करती हो.

4. अपने दुश्मन को कभी कमजोर या छोटा म त समझिए, जैसा कि हनुमान के मामले में भूल हूई.

5. यह गुमान कभी मत पालिए कि आप किस्मत को हरा सकते हैं. भाग्य में जो लिखा होगा उसे तो भोगना ही पड़ेगा.

6. ईश्वर से प्रेम कीजिए या नफरत, लेकिन जो भी कीजिए , पूरी मजबूती और समर्पण के साथ.

7. जो राजा जीतना चाहता है, उसे लालच से दूर रहना सीखना होगा, वर्ना जीत मुमकिन नहीं.

8. राजा को बिना टाल-मटोल किए दूसरों की भलाई करने के लिए मिलने वाले छोटे से छोटे मौके को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.

हनुमान जी : संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमरे हनुमत वीरा दोस्तों पवनपुत्र बजरंगबली हनुमान जी माता अंजनी और वानर नरेश केशरी की संतान को तो आप सभी जानते ही है | हनुमान जी को संकट यानी की कष्टों को दूर करने बाला माना जाता है कहा जाता है जो हनुमान जी की आराधना और स्मरण करता है उसके सारे संकट दूर हो जाते है | हनुमान जी से जुड़े कई ऐसे किस्से रामायण में लिखे हुए है जिनसे ये साबित होता है की हनुमान जी बहुत ही शक्तिशाली और पराक्रमी थे | मगर अब यह बात सामने आती है की हनुमान जी के पास इतनी शक्ति कंहा से आई ? तो आइये आज हम आपको बताते है की हनुमान जी इतने वीर और पराक्रमी और शक्तियों के स्वामी कैसे बने |
जानिये किस के वरदान से हनुमान बने परम शक्तिशाली और महाबली
जानिये किस के वरदान से हनुमान बने परम शक्तिशाली और महाबली

आप सबने हनुमान जी के बचपन से जुड़ा यह किस्सा ( जो वाल्मीकि जी द्वारा वर्णित रामायण में भी मिलता है ) तो सुना ही होगा की एक बार हनुमान जी सूर्य को फल समझकर उसे खाने के लिए चले जाते है | इस सब को देखकर सभी देवता और पृथ्वी बासी घबरा जाते है की अगर हनुमान जी ने सूर्य को खा लिया तो क्या होगा | इसी वजह से हनुमान जी को रोकने के लिए देवताओं के राजा इन्द्रदेव ने हनुमान जी पर अपने वज्र से बार कर दिया जिसके प्रहार से हनुमान निश्चेत होकर पृथ्वी पर गिर जाते है | 

चूँकि हनुमान जी वायु पुत्र थे जिसकी वजह से वायु देव क्रोधित हो जाते है और समस्त संसार में बहने बाली वायु को बंद कर देते है जिसकी वजह से समस्त संसार में हाहाकार मच जाता है जानबर प्राणी सभी एक एक करके मरने लगते है | परेशान होकर समस्त देव संसार के निर्माणकर्ता ब्रह्मा जी पास जाते है और पूरी बात बताते है तब ब्रह्मा जी आके हनुमान जी को स्पर्श करके उन्हें पुनः ठीक कर देते है |

किस देवता ने हनुमान जी को कौन सा वरदान दिया

अब जब समस्त देवताओं को पता चल जाता है तो देवतागण हनुमान जी को वरदान देना प्रारम्भ कर देते है जिन वरदानो को प्राप्त करके उनको महाबलशाली, पराक्रमी और महान शक्तियों के स्वामी बन जाते है तो आइये जानते है किस देवता ने हनुमान जी को कौन कौन से वरदान दिए –

सूर्य देव से प्राप्त वरदान

सूर्य देव ने हनुमान जी को आशीर्वाद के साथ वरदान में अपने तेज का सौवा हिस्सा देते हुए कहा की जब हनुमान के अंदर शास्त्र अध्ययन को ग्रहण करने की शक्ति आ जायेगी तब स्वयम सूर्यदेव हनुमान को शास्त्रों का अध्ययन करवाएगें जिससे वो पूरे संसार के सबसे श्रेष्ठ वक्ता और शास्त्र ग्यानी बनेगे |

यक्ष राज कुबेर से मिला वरदान

यक्ष राज ने हनुमान जी को वरदान देते हुए कहा की किसी भी युद्ध में हनुमान के ऊपर किसी भी अस्त्र से प्रहार किया जाए उसका हनुमान जी के ऊपर कोई भी असर नहीं पड़ेगा यहाँ तक की किसी समय मेरा और हनुमान का भी युद्ध हो गया तो मेरा गदा भी हनुमान का बुरा नहीं कर पायेगा |

यमराज से मिला वरदान

हनुमान जी को वरदान देते समय यमराज ने कहा की यह बालक हमेशा ही मेरे दण्ड ( जिससे बांधकर यमराज आत्मा को यमलोक लेकर जाते है ) की पहुच से दूर रहेगा यानी की अमर रहेगा और कभी किसी भी बिमारी का प्रभाव नहीं पड़ेगा | उनकी आराधना और स्मरण मात्र से दुसरो के कष्ट और संकटो का नाश हो जायेगा |

भगवान् शंकर से मिला वरदान

भगवान् शंकर ने उनको वरदान देते हुए कहा की इस बालक पर मेरे अश्त्रो का कोई असर नहीं होगा | इसी के साथ कोई भी मुझसे वरदान में प्राप्त किये हुए अश्त्रो से हनुमान को नुकसान पहुंचा पायेगा अर्थात कोई भी अश्त्र उनको नहीं मार सकता है |

देवशिल्पी विश्वकर्मा से मिला वरदान

हनुमान जी को वरदान देते हुए देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने कहा की मेरे बनाये हुए किसी भी शस्त्र से आपका कोई नुकसान नहीं होगा अर्थात हनुमान को कोई अशस्त्र नुकसान नहीं पहुंचा सकता है | वह निरोगी और चिरंजीवी रहेंगे उनका वध कभी नहीं किया जा सकता है |

देवताओं के राजा इंद्र से मिला वरदान

देवताओं के राजा भगवान् इंद्र ने उनको वरदान देते समय कहा की आज के बाद इस बालक पर मेरे वज्र का का कोई असर नहीं होगा अर्थात मेरे वज्र से भी आपका वध नहीं किया जा सकता है |

जलदेव वरुणदेव से मिला वरदान

जल के देवता वरुण देव ने उनको वरदान देते समय कहा की उनकी आयु जब दस लाख वर्ष की हो जाएगी तो भी उनकी मेरे पाश और जल के बंधन से मुक्त रहेंगे इससे भी उनकी की मृत्यु नहीं होगी |

ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदान

संसार के निर्माणकर्ता परमपिता ब्रह्मदेव ने उनको दीर्घायु का आशीर्वाद के साथ वरदान देते समय कहा की किसी भी युद्ध में इस बालक को कोई भी हरा नहीं पायेगा | किसी भी प्रकार के ब्रह्मदंड का उन पर कोई भी असर नहीं होगा और ना ही उनसे हनुमान का वध किया जा सकेगा | वह अपनी इच्छा से किसी का भी रूप धारण कर पायेगा और पल भर में जंहा भी जाना चाहेगा वंहा जा सकेगा | इस सब के साथ यह वरदान भी दिया की उनकी गति उनकी इच्छा के अनुसार तेज़ या धीमी हो सकती और वह अपने कद को कितना भी बड़ा और कितना भी छोटा कर पायेंगे |

माता सीता से मिला वरदान

रावण जब सीता माता को हरण करके लंका ले गाया तब वह सीता माता की खोज में लंका गए और वंहा माता को खोजते खोजते अशोक वाटिका में पहुंचे तब सीता माता ने उनको अमर होने का वरदान दिया था |

भगवान् राम से मिला वरदान

भगवान् राम ने उनको उनकी इच्छानुसार सबसे बड़ा राम भक्त कहलाने का वरदान दिया था | रामायण में इस बात का उल्लेख भी मिलता है की राम भगवान् ने भी उनको अमर होने का वरदान दिया था |
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