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 मकर संक्रांति हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है. इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है. सूर्य का उत्तरायण होना बेहद शुभ माना जाता है.

इस वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी. सूर्य इस दिन धनु राशि से मकर राशि प्रवेश करते हैं. इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान, धर्म करते हैं.

Makar Sankranti 2021: इस दिन मनाई जाएगी मकर संक्रांति, जानें क्यों है इसका महत्व
Makar Sankranti 2021: इस दिन मनाई जाएगी मकर संक्रांति, जानें क्यों है इसका महत्व

हिंदू धार्मिक मान्यतों मुताबिक भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था. यह मकर संक्रांति के दिन हुआ था. तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि, जो मनुष्य मकर संक्रांति पर देह का त्याग करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है.

मकर संक्रांति से ही ऋतु में परिवर्तन होने लगता है। शरद ऋतु क्षीण होने लगती है और बसंत का आगमन शुरू हो जाता है। इसके फलस्वरूप दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी हो जाती है.

 साल के पहले महीने जनवरी में कई व्रत और त्योहार पड़ते हैं. लोहड़ी, मकर संक्रांति, पोंगल, बिहू और गणतंत्र दिवस जैसे प्रमुख पर्व जनवरी में आते हैं. हम आपको बता रहे हैं कि ये त्योहार किस तारीख और दिन को पड़ रहे हैं.

January 2021: नए साल के पहले महीने में पड़ेंगे ये व्रत और त्योहार,यहां देखें पूरी लिस्ट
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संकष्टी चतुर्थी

साल के दूसरे ही दिन 2 जनवरी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा. संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है. इस दिन भगवान गणेश की आराधना की जाती है. शास्त्रों में संकष्टी चतुर्थी के व्रत को बहुत ही शुभ फलदायी बताया गया है.


सफला एकादशी

पौष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है. सफला एकादशी व्रत 9 जनवरी को रखा जाएगा. मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से सारे कार्य सफल हो जाते हैं. यही कारण है कि इसे सफला एकादशी कहा गया है.


प्रदोष व्रत

कृष्ण प्रदोष व्रत 10 जनवरी को रखा जाएगा. प्रदोष व्रत भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है. हर महीने में दो बार (कृष्ण और शुक्ल पक्ष में) त्रयोदशी तिथि के दिन यह व्रत रखा जाता है.


मासिक शिवरात्रि

मासिक शिवरात्रि का व्रत 11 जनवरी को रखा जाएगा. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है.


लोहड़ी

लोहड़ का पर्व हर वर्ष 13 जनवरी को मनाया जाता है. यह पंजाब का सांस्कृति पर्व है लेकिन पूरे उत्तर भारत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.


मकर संक्रांति

मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी. सूर्य देव 14 जनवरी को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इसी के साथ खरमास का अंत हो जाएगा. सूर्य के गोचर को संक्रांति कहा जाता है.


पोंगल

पोंगल का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा. मकर संक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण होने पर दक्षिण भारत में पोंगल का त्योहार मनाया जाता है. प्रमुख रूप से यह एक तमिल पर्व है.


माघ बिहू

माघ बिहू 15 जनवरी को मनाया जाएगा. यह असम का प्रमुख त्योहार है.


विनायक चतुर्थी

16 जनवरी को विनायक चतुर्थी पड़ रही है. यह दिन गणपति महाराज को समर्पित है.


गुरू गोविंद सिंह जयंती

गुरु गोविंद सिंह जयंती 20 जनवरी को मनाई जाएगी. गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को बिहार के पटना में हुआ था.


पौष पुत्रदा एकादशी

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत 24 जनवरी को रखा जाएगा. पौष मास की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहते हैं.


भौम प्रदोष व्रत

26 जनवरी को यह व्रत रखा जाएगा. यह व्रत भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है.

 मां लक्ष्मी धन, वैभव और यश की देवी हैं. मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए सभी पूजा अर्चना करते हैं. जिन लोगों पर माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है वे खुशहाल जीवन व्यतीत करते हैं. उनके जीवन में किसी भी चीज की कोई कमी नहीं रहती है. ऐसे लोगों को समाज में भी सम्मान प्राप्त होता है.

आज हम आपको बता रहे हैं वे मंत्र जिनके जाप से आप मात लक्ष्मी को प्रसन्न कर सकते हैं.

इन मंत्रों के जाप से मां लक्ष्मी होती हैं प्रसन्न, दूर होती है पैसों से जुड़ी हर समस्या, होता है धनलाभ
इन मंत्रों के जाप से मां लक्ष्मी होती हैं प्रसन्न, दूर होती है पैसों से जुड़ी हर समस्या, होता है धनलाभ


1- ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:

आप अगर कर्ज में डूबे हैं और लाख कोशिशों के बावजूद आप कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं तो इस मंत्र का जाप करें-


2- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम:!

इस मंत्र के जाप से आपको कामयाबी मिलती है. इस मंत्र का जाप मां लक्ष्मी की चांदी या अष्टधातु की प्रतीमा के सामने करें.


 3- पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्

इस मंत्र के जाप से घर में अन्न और धन्न की कमी कभी न होती. इस मंत्र का जाप स्टफीक की माला से करना चाहिएय


4- ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:!

इस मंत्र का जाप कोई भी शुभ कार्य करने से पहले या किसी काम के लिए घर से बाहर निकलने से पहले करना चाहिए.


5- ओम लक्ष्मी नम:

इस मंत्र का जाप करने से मां लक्ष्मी घर में वास करती हैं. इस मंत्र का जाप कुशा के आसन पर बैठकर करना चाहिए.


6- लक्ष्मी नारायण नम:

इस मंत्र का जाप पति-पत्नि के रिश्तों को मजबूत करने के लिए करना चाहिए क्यों इसमें मां लक्ष्मी और नारायण यानि भगवान विष्णु का नाम एक साथ आता है.


7- धनाय नमो नम:

  ॐ धनाय नम:, ॐ

इन दोनों मंत्रो का जाप करने से धन संबंधित परेशानियां दूर होती हैं.

 Gita Jayanti 2020: आज 25 दिसंबर को गीता जयंती मनाई जा रही है. आज एकादशी के दिन ही भगवान श्रीकृष्‍ण के श्री मुख से पवित्र श्रीमदभगवद् गीता का जन्‍म हुआ था. इसलिए गीता जयंती मनाई जाती है. भारत की सनातन संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता न केवल पूज्य बल्कि अनुकरणीय भी है. यह दुनिया का इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाई जाती है. श्रीमद्भगवद्गीता के कई श्लोकों में जीवन का सार छिपा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब आप किसी परेशानी या समस्या में हों तो गीता का ज्ञान आपको सही मार्गदर्शन दे सकता है. आज हम आपके लिए लेकर आए हैं श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ उपदेश और उनका अर्थ...

Gita Jayanti : गीता जयंती पर पढ़ें गीता के ये श्लोक, इनमें छिपा है हर समस्या का हल
Gita Jayanti : गीता जयंती पर पढ़ें गीता के ये श्लोक, इनमें छिपा है हर समस्या का हल


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

अर्थ: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो. कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं. अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो.


हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्.

तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 37)

अर्थ: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख पा जाओगे... इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो.


ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते.

सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 62)

अर्थ: विषय-वस्तुओं के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है. इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है. इसलिए कोशिश करें कि विषयाशक्ति से दूर रहते हुए कर्म में लीन रहा जाए.


क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:.

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 63)

अर्थ: क्रोध से मनुष्य की मति-बुदि्ध मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है, कुंद हो जाती है. इससे स्मृति भ्रमित हो जाती है. स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है.

 Mokshada Ekadashi 2021 Katha: मोक्षदा एकादशी व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई व्रत नहीं है. इस कथा को पढ़ने या सुनने से वायपेय यज्ञ का फल मिलता है. यह व्रत मोक्ष देने वाला तथा चिंतामणि के समान सब कामनाएं पूर्ण करने वाला है.

Mokshada Ekadashi 2021: आज 25 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी व्रत है. मोक्षदा एकादशी पर भक्तों ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा है और पूजा अर्चना कर रहे हैं. मोक्षदा एकादशी का हिन्‍दू धर्म में एक विशेष महत्‍व है. मान्‍यता है कि मोक्षदा एकादशी का व्रत करने से मनुष्‍यों के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं. सिर्फ इतना ही नहीं इस व्रत के प्रभाव से पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है.

Mokshada Ekadashi 2020: मोक्षदा एकादशी पर आज पढ़ें ये व्रत कथा, कटेंगे पाप, मिलेगा मोक्ष
Mokshada Ekadashi 2021: मोक्षदा एकादशी पर आज पढ़ें ये व्रत कथा, कटेंगे पाप, मिलेगा मोक्ष

मोक्षदा एकादशी को लेकर यह भी मान्यता है कि यह व्रत मनुष्‍य के मृतक पूर्वजों के लिए स्‍वर्ग के द्वार खोलने में मदद करता है. जो भी व्‍यक्ति मोक्ष पाने की इच्‍छा रखता है उसे इस एकादशी पर व्रत रखना चाहिए. आइए जानते हैं मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा...

मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा:

पौराणिक कथा के अनुसार, महाराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से कहा- हे भगवन! आप तीनों लोकों के स्वामी, सबको सुख देने वाले और जगत के पति हैं. मैं आपको नमस्कार करता हूँ. हे देव! आप सबके हितैषी हैं अत: मेरे संशय को दूर कर मुझे बताइए कि मार्गशीर्ष एकादशी का क्या नाम है?

उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी क्या विधि है? कृपया मुझे बताएं. भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि धर्मराज, तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है. इसके सुनने से तुम्हारा यश संसार में फैलेगा. मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है. इसका नाम मोक्षदा एकादशी है.

इस दिन दामोदर भगवान की धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए. अब इस विषय में मैं एक पुराणों की कथा कहता हूँ. गोकुल नाम के नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे. वह राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था. एक बार रात्रि में राजा ने एक स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं. उसे बड़ा आश्चर्य हुआ.

प्रात: वह विद्वान ब्राह्मणों के पास गया और अपना स्वप्न सुनाया. कहा- मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट उठाते देखा है. उन्होंने मुझसे कहा कि हे पुत्र मैं नरक में पड़ा हूँ. यहाँ से तुम मुझे मुक्त कराओ. जब से मैंने ये वचन सुने हैं तब से मैं बहुत बेचैन हूँ. चित्त में बड़ी अशांति हो रही है. मुझे इस राज्य, धन, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े आदि में कुछ भी सुख प्रतीत नहीं होता. क्या करूँ?

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं! इस दु:ख के कारण मेरा सारा शरीर जल रहा है. अब आप कृपा करके कोई तप, दान, व्रत आदि ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए. उस पुत्र का जीवन व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार न कर सके. एक उत्तम पुत्र जो अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का उद्धार करता है, वह हजार मुर्ख पुत्रों से अच्छा है. जैसे एक चंद्रमा सारे जगत में प्रकाश कर देता है, परंतु हजारों तारे नहीं कर सकते. ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहाँ पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है. आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे.

ऐसा सुनकर राजा मुनि के आश्रम पर गया. उस आश्रम में अनेक शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे. उसी जगह पर्वत मुनि बैठे थे. राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत किया. मुनि ने राजा से सांगोपांग कुशल पूछी. राजा ने कहा कि महाराज आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं, लेकिन अकस्मात मेरे च्ति में अत्यंत अशांति होने लगी है. ऐसा सुनकर पर्वत मुनि ने आंखें बंद की और भूत विचारने लगे. फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया है. उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया. उसी पापकर्म के कारण तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा.

तब राजा ने कहा इसका कोई उपाय बताइए. मुनि बोले- हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प कर दें. इसके प्रभाव से आपके पिता की अवश्य नर्क से मुक्ति होगी. मुनि के ये वचन सुनकर राजा महल में आया और मुनि के कहने अनुसार कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया. इसके उपवास का पुण्य उसने पिता को अर्पण कर दिया. इसके प्रभाव से उसके पिता को मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो. यह कहकर स्वर्ग चले गए.

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का जो व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं. इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई व्रत नहीं है. इस कथा को पढ़ने या सुनने से वायपेय यज्ञ का फल मिलता है. यह व्रत मोक्ष देने वाला तथा चिंतामणि के समान सब कामनाएं पूर्ण करने वाला है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

 हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार (Thursday) को भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं.

हिंदू धर्म में गुरुवार (Thursday) के दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा के लिए बेहद खास माना जाता है. कहते हैं सच्चे मन से उनकी पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं भगवान विष्णु जरूर पूरा करते हैं. हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार को भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं. कुछ दिनों पहले नेपाल में मिले एक विचित्र रंग के कछुए को जगत के पालनहार भगवान विष्णु के कूर्म अवतार से जोड़कर देखा जा रहा है. दरअसल हाल ही में नेपाल के धनुषा जिले के धनुषधाम नगर निगम में एक गोल्डन रंग का कछुआ पाया गया है.

क्यों भगवान विष्णु को लेना पड़ा था कूर्म अवतार, जानें इसके पीछे का रहस्य
क्यों भगवान विष्णु को लेना पड़ा था कूर्म अवतार, जानें इसके पीछे का रहस्य

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा जींस में परिवर्तन होने के कारण हो सकता है और इसी के कारण कछुए का रंग पीला है लेकिन लोगों द्वारा इसे आस्था से जोड़कर देखा जा रहा है. हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतार बताए गए हैं. इसलिए उन्हें दशावतार के नाम से भी जाना जाता है. उनके इन्हीं दस अवतारों में तीसरा कूर्म यानी कि कछुए का था. उन्होंने कूर्म का अवतार लेकर ही समुद्र मंथन में देवताओं की मदद की थी. इस संबंध में शास्त्रों में एक पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है-

एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप दे दिया था जिसके कारण वे श्रीहीन हो गए. श्राप से मुक्ति के लिए इंद्रदेव विष्णु जी के पास गए. तब जगत के पालन हार ने इंद्र को समुद्र मंथन करने के लिए कहा. ऐसे में इंद्रदेव भगवान विष्णु के कहे अनुसार असुरों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए. समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को नेती बनाया गया. देवताओं और असुरों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक ले नहीं जा सके.

तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया. देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकी को नेती बनाया. लेकिन मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा. यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए. भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हो सका.

 Vaikuntha Ekadashi Puja Vidhi: मान्यता है कि वैकुंठ एकादशी व्रत कथा के पढ़ने या सुनने से भगवान विष्णु व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. आइये जानें व्रतकथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Vaikuntha Ekadashi Shubh Muhurt 2020: मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को वैकुंठ एकादशी कहते हैं. इसे मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है. इस साल वैकुंठ एकादशी/ मोक्षदा एकादशी 25 दिसंबर 2020 को है. हिंदू धर्म ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रहकर और विधि विधान पूर्वक विष्णु भगवान और मां लक्ष्मी की पूजा करने और व्रतकथा को पढ़ने से व्रती की सभी मनोकामना पूरी होती है तथा भगवान विष्णु उनके लिए वैकुंठ का द्वार खोल देते हैं. व्रती को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है.

वैकुंठ एकादशी की कथा: गोकुल नाम के नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे. राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था. एकबार राजा ने स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं. प्रातः होते ही वह अपने स्वप्न के बारे में विद्वान ब्राह्मणों को बताया और राजा ने कहा- मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट उठाते देखा है. उन्होंने मुझे से कहा कि हे पुत्र मुझे नरक से मुक्त कराओ. जब से मैंने यह शब्द सुना हूं, तब से मैं बेचैन हूं.

Vaikunta Ekadasi 2020: कब है वैकुंठ एकादशी, जिसकी व्रत कथा पढ़ने या सुनने से पूरी होती है सभी मनोकामनाएं, जानें कथा, मुहूर्त & पूजा विधि
Vaikunta Ekadasi 2020: कब है वैकुंठ एकादशी, जिसकी व्रत कथा पढ़ने या सुनने से पूरी होती है सभी मनोकामनाएं, जानें कथा, मुहूर्त & पूजा विधि

ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहां पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है. वे आपकी समस्या का हल जरूर निकालेंगें. यह सुन राजा पर्वत ऋषि के आश्रम गए और साष्टांग दंडवत करते हुए मुनि को अपनी पूरी दास्तान सुनाई.

राजा का दुःख सुनकर पर्वत मुनि ने आंखें बंद की और भूत विचारने लगे. फिर बोले हे राजन! मैंने तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया. उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी, किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान मांगने पर भी नहीं दिया. उसी पापकर्म के चलते उन्हें नरक जाना पड़ा.

राजा द्वारा उपाय पूंछने पर मुनि बोले- हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प कर दें. इससे तुम्हारे पिता की नरक से अवश्य मुक्ति होगी. राजा ने सपरिवार वैसा ही किया. इसके प्रभाव से  राजा के पिता को मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो. यह कहकर स्वर्ग चले गए.

वैकुंठ एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त:

एकादशी तिथि प्रारंभ- 24 दिसंबर की रात 11 बजकर 17 मिनट से

एकादशी तिथि समाप्त- 25 दिसंबर को देर रात 1 बजकर 54 मिनट तक

मोक्षदा एकादशी पूजा विधि: ब्रह्म मुहूर्त में स्नानादि करके पूजा स्थल/ मंदिर की सफाई करें. उसके बाद पूजा स्थल पर गंगाजल छिडककर पवित्र करे तथा भगवान गणेश, विष्णु और मां लक्ष्मी को गंगाजल से स्नान करवाए. अब भगवान को रोली, चंदन, अक्षत और तुलसी दल आदि अर्पित करें. भगवान को भोग लगाकर गणेश जी की आरती करें. फिर विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की आरती करके प्रसाद वितरण करें.

 Motivational Thoughts In Hindi: चाणक्य ने लक्ष्मी जी को धन की देवी माना है. मां सरस्वती ज्ञान की देवी है. ये बात सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप इस बात को जानते हैं कि ये दोनों ही देवियां किन लोगों को अपना आर्शीवाद देती हैं.

Safalta Ki Kunji: सफलता की कुंजी कहती है कि जीवन में यदि सफल होना है तो गलत आदतों को जितनी जल्दी हो सके त्याग कर देना चाहिए. नहीं तो आसानी से प्राप्त होने वाली सफलताएं भी दूर चली जाती हैं. गीता का उपदेश हो या फिर संतों की वाणी, सभी का सार यही है कि व्यक्ति को जीवन में यदि सफल होना है तो कुछ आदतों से दूर ही रहना चाहिए. सरस्वती जी को ज्ञान की देवी कहा गया है. इस बात को तो सभी जानते और मानते हैं कि ज्ञान ही सभी प्रकार के अंधकार को मिटाता है. जिसके पास ज्ञान है, उसके लिए इस पृथ्वी पर कुछ भी असंभव नहीं है. सरस्वती जिसके पास होती हैं उसके पास लक्ष्मी जी स्वत: ही आ जाती है.

सफलता की कुंजी: लक्ष्मी और मां सरस्वती इन चीजों से दूर रहने वाले व्यक्ति को देती हैं अपना आर्शीवाद, जीवन में नहीं रहती है कोई कमी

लक्ष्मी जी का उपयोग कैसा किए जाए इसके लिए मां सरस्वती का आर्शीवाद मिलना बहुत ही जरूरी है. बिना सरस्वती के लक्ष्मी जी भी अधिक देर तक नहीं टिकती हैं. मां सरस्वती और लक्ष्मी जी का आर्शीवाद हर किसी को प्राप्त नहीं होता है. इन दोनों देवियों का आर्शीवाद उसी को प्राप्त होता है जो इन आदतों से दूर रहता है.

छल-कपट से दूर रहें

जो व्यक्ति छल कपट से दूर रहता है, वह सभी का प्रिय होता है. ऐसे व्यक्ति जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करते हैं. ईश्वर भी ऐसे लोगों की पग-पग पर मदद करते हैं. ऐसे लोगों को मां सरस्वती और लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है. छल कपट और दूसरों का अहित करने वाले व्यक्ति ज्ञान और धन, दोनों से ही वंचित हो जाता है.

व्यसनों से दूर रहें

व्यसन व्यक्ति को कमजोर बनाते हैं और उसकी प्रतिभा को नष्ट करते हैं. इसलिए व्यसनों से दूर रहना चाहिए. व्यसन व्यक्ति को अपना आदी बना लेते हैं. व्यसन से युक्त व्यक्ति कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो उसे सफलता नहीं मिलती है. व्यसन में फंसा व्यक्ति अपनी प्रतिभाओं का भी सही प्रयोग नहीं कर पाता है. जिस कारण ऐसे लोगों को सरस्वती और लक्ष्मी जी का आर्शीवाद नहीं मिलता है. व्यसन से मुक्त रहने वाले जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं.

 Ganesh Puja: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह या फिर कोई भी राशि हो, यदि ग्रह शुभ नहीं तो जीवन भर व्यक्ति को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इन ग्रहों में दो ग्रह ऐसे हैं जो गणेश जी की पूजा से अच्छा फल प्रदान करते हैं.

Ganesh Puja: बुधवार का दिन भगवान गणेश जी को समर्पित है. पंचांग के अनुसार 23 दिसंबर को बुधवार है. इस दिन मार्गशीर्ष शुक्ल की नवमी की तिथि है. इस दिन चंद्रमा मीन राशि में गोचर कर रहा है. इस दिन भगवान गणेश जी की पूजा करने से बुध और केतु ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं.
बुधवार के दिन गणेश जी की पूजा करने से कौन-कौन से ग्रह होते हैं शांत, क्या आप जानते हैं?

बुध ग्रह

ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को शुभ ग्रह माना गया है. बुध, मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है. कन्या बुध की उच्च राशि है, जबकि मीन बुध की नीच राशि मानी गई है. अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती को बुध का नक्षत्र माना जाता है. बुध ग्रह बुद्धि, वाणी, मनोविनोद, शिक्षा, गणित, लेखन, तर्क-वितर्क, प्रकाशन, ललित कला, वनस्पति, बिजनेस, मामा, मित्र, संबंधियों, गला, नाक, कान, फेफड़े आदि का कारक है.

केतु ग्रह

केतु को ज्योतिष शास्त्र में पाप ग्रह माना गया है. इसे छाया ग्रह भी कहा जाता है. केतु का सिर नहीं है. केतु को तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना और मानसिक गुणों का कारक माना गया है. केतु प्रधान व्यक्ति लीक से हटकर कार्य करने पर विश्वास करते हैं.

बुध और केतु का अशुभ फल

बुध और केतु जब अशुभ होते हैं तो व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. व्यापार और शिक्षा में हानि होती है. वाधाएं आना आरंभ हो जाती हैं. केतु के अशुभ होने से मानसिक तनाव और भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. संघर्ष करना पड़ता है. सफलता देर से मिलती है.

गणेश पूजा का लाभ

गणेश जी को बुद्धि का दाता माना गया है. ज्योतिष शास्त्र में बुध को बुद्धि का कारक माना गया है. बुधवार को गणेश जी की पूजा करने से बुध ग्रह से जुडी दिक्कतें दूर होती हैं. केतु की भी अशुभता दूर करने में गणेश जी की पूजा बहुत ही प्रभावशाली मानी गई है.

पूजा विधि

बुधवार को गणेश जी की पूजा करने से पहले पूजा स्थान को गंगाजल से स्वच्छ करें. इसके बाद गणेश जी का ध्यान लगाएं. पूजा के दौरान गणेश जी की प्रिय चीजों का भोग लगाएं और दूर्वा घास जरूर चढ़ाएं. गणेश असरती के बाद प्रसाद का वितरण करें.

 उत्‍तराखण्‍ड के चार धामों में से एक, मंदाकिनी नदी के तट पर बसा केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple), रूद्रप्रयाग जिले में स्‍थित है। पंच केदारों में से एक, केदारनाथ मंदिर में शिव के "पृष्‍ठ भाग" (Back Portion) की पूजा की जाती है। बद्रीनाथ की यात्रा करने से पूर्व केदारनाथ की यात्रा करना अनिवार्य समझा जाता है। केदारनाथ सहित नर-नारायण मूर्ति के दर्शन करने से समस्त पापों का नाश होता है।

केदारनाथ मंदिर के अन्‍दर स्थित ज्‍योर्तिलिंग, जो भगवान शिव के बारह ज्‍यार्तिलिंगों में से एक है, यहां का मुख्‍य आकर्षण है। केदारनाथ के निकट दर्शनीय स्‍थल वासुकी ताल, पंच केदार, सोन प्रयाग, गौरी कुण्ड, त्रियुगी नारायण, गुप्तकाशी, ऊखीमठ और अगस्तयमुनि हैं।

केदारनाथ मंदिर का इतिहास - History of Kedarnath Temple in Hindi

केदारनाथ मंदिर के बारे में जानकारी- Kedarnath Temple in Hindi
पांडव जब भगवान शिव के दर्शन करने के लिए काशी पहुंचे तो भगवान शिव वहां से छिपकर केदारनाथ में आ बसे। पांडवों द्वारा केदारनाथ में भी भगवान शिव को ढूंढ लिए जाने पर शिव ने एक बैल का रूप ले लिया लेकिन पांडवों ने भोले शंकर को फिर ढूंढ निकाला।

पांडवों से बचने के लिए शिव पृथ्वी में समा गए लेकिन उनका पृष्‍ठ भाग धरती पर रह गया। पांडवों के दृढ़ संकल्प से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें उनके पाप के भार से मुक्त कर दिया और पांडवों से उनके पृष्ठ भाग की पूजा करने का आदेश दिया।

कहते हैं केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडव वंशी जनमेजय ने कराया था, जबकि आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया था।

केदारनाथ मंदिर मे क्या देखे -

यमुनोत्री के पवित्र जल से केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग का अभिषेक करना शुभ माना जाता है। वायुपुराण के अनुसार, मानव जाति के कल्याण के लिए भगवान नारायण (विष्णु) बद्रीनाथ में अवतरित हुए। बद्रीनाथ में पहले भगवान शिव का वास था, किन्तु जगतपालक नारायण के लिए शिव बद्रीनाथ छोड़ कर केदारनाथ चले गए। भगवान शिव द्वारा किए त्याग के कारण केदारनाथ को अहम प्राथमिकता दी जाती है।

केदारनाथ मंदिर सलाह -

प्रतिकूल जलवायु के कारण केदारनाथ मंदिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है।

अपने साथ जरूरी दवाईयां रखें।

तीर्थयात्रियों के लिए यहां पोनी घोड़े की भी सुविधा उपलब्ध है।

अपने साथ गर्म कपड़े अवश्य रखें।

मांस-मच्छी व शराब का सेवन न करें।

देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
🙏भगवान कृष्ण और फल वाली महिला कहानी🙏
🌷एक बार एक महिला फल बेच रही थी। जब वह श्री कृष्ण के घर के सामने से गुजर रही थी तब श्रीकृष्ण को कुछ फल खाने का मन किया। जब कृष्ण ने उस फल बेचने वाली महिला से कुछ फल मांगे तो उसने कृष्ण से उन फल के बदले कुछ मांगा।
गुरुसत्संग : Krishna bhajan देना हो तो दीजिये जन्म जन्म का साथ  sanwariya bhajan : GuruSatsang
गुरुसत्संग : Krishna bhajan देना हो तो दीजिये जन्म जन्म का साथ  sanwariya bhajan : GuruSatsang
फल के बदले अनाज देने के लिए कृष्ण घर के अंदर दौड़ते हुए गए और मुट्ठी भर अनाज लेकर वापस फल वाली के पास आये। परंतु आते आते उनके हाथ से सारा अनाज गिर जाता था।

कृष्ण बार-बार  घर के अंदर जाते और कुछ अनाज अपने हाथ में लेकर आने की कोशिश करते हैं परंतु सारा अनाज नीचे गिर जाता। यह देखकर वह फल वाली बहुत प्रसन्न हुई और उसने कृष्ण को सारे फल दे दिए।

कृष्ण अंदर-अंदर उस फल वाली से बहुत प्रसन्न हुए। जब वह फल वाली अपना खाली टोकरा लेकर वहां से चली गई और अपने घर पहुंची तो उसने देखा कि उसकी टोकरी सोने और जवाहरात से भरी हुई है।🌷
🌷 *GuruSatsang*🌷
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