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देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

ऐसा माना जाता है की आज तक हनुमान से बड़ा भक्त कोई नहीं हुआ। हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु राम के हमेशा समीप ही रहा करते थे। और प्रभु राम भी अपने भक्त हनुमान जी को भाई के समान ही प्रेम करते थे। इसी स्वामिभक्ति के कारण मृत्यु के देवता कालदेव अयोध्या आने से डरते थे। तो पाठकों आइये जानते हैं की वो कौन से कारण थे जिसकी वजह से हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?

हनुमान जी भक्ति

ये तो हम सभी जानते हैं की इस दुनिया में जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन मरना ही है। यही नियम प्रभु श्री राम पर भी लागू होते है। क्योंकि त्रेता युग में उन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया था। जब प्रभु राम के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य पूरा हो गया। तब उन्होंने पृथ्वीलोक छोड़ने का निश्चय किया। परन्तु कालदेव तब तक श्रीराम को मृत्युलोक से नहीं ले जा सकते थे जब तक हनुमान जी उनके साथ हो।  श्री राम जानते थे कि अगर उनके जाने की बात हनुमान जी को पता चलेगी तो वह पूरी पृथ्वी उत्तल पुथल कर देंगे।  क्योंकि उनके जैसा राम भक्त इस दुनिया में कोई और नहीं है।

अंगूठी की खोज 

जिस दिन कालदेव को अयोध्या आना था उस दिन श्री राम ने हनुमान जी को मुख्य द्वार से दूर रखने का एक तरीका निकाला। उन्होंने अपनी अंगूठी महल के फर्श में आई एक दरार में डाल दी। और हनुमान जी को उसे बाहर निकालने का आदेश दिया। उस अंगूठी को निकालने के लिए हनुमानजी ने स्वयं ही उस दरार जितना सूक्ष्म आकार ले लिया और अंगूठी खोजने लग गए। जब हनुमानजी उस दरार के अंदर घुसे तो उन्हें समझ में आया कि यह कोई दरार नहीं बल्कि सुरंग है। जो की नागलोक की ओर जाती है। वहां जाकर वे नागों के राजा वासुकी से मिले। नागों के राजा वासुकि ने हनुमान जी से नागलोक आने का कारण पुछा। हनुमान जी ने बताया की मेरे प्रभु राम की अंगूठी पृथ्वी में आई दरार से होते हुए यहाँ आ गई है उसे ही में खोजने आया हूँ।

तब वासुकी हनुमान जी को नागलोक के मध्य में ले गए और अंगूठियों का एक बड़ा सा ढेर दिखाते हुए कहा कि यहां आपको प्रभु राम की अंगूठी मिल जाएगी। पर उस अंगूठी के ढेर को देख हनुमान जी कुछ परेशान हो गए। और सोचने लगे कि इतने बड़े ढेर में से श्री राम की अंगूठी खोजना तो रुई  के ढेर से सुई निकालने के समान हैं। उसके बाद जैसे ही उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो वह श्री राम की थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की उन्हें अपने प्रभु की अंगूठी पहले ही प्रयास में मिल गयी। उन्हें और आश्चर्य  तब हुआ जब उन्होंने दूसरी अंगूठी उठाई क्योंकि उस पर भी श्री राम ही लिखा हुआ था। इस तरह उन्होंने देखा की ढेर सारी अंगूठियों पर श्री राम ही लिखा है। यह देख हनुमान जी  को एक पल के लिए यह समझ ना आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

कालदेव का अयोध्या आगमन

हनुमान जी उदास देख वासुकी मुस्कुराए और हनुमान जी से बोले  पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक हैं जहां जो भी आता है उसे एक न एक  दिन वापस लौटना ही होता है। उसके वापस जाने का साधन कुछ भी हो सकता है। और ठीक इसी तरह श्री राम भी पृथ्वी लोक को छोड़ एक दिन विष्णु लोग वापस अवश्य जाएंगे।वासुकि कि यह बात सुनकर हनुमान जी को सारी बातें समझ आ गयी। उनका अंगूठी ढूंढने के लिए आना और फिर नागलोक में पहुंचना, यह सब श्री राम की ही लीला थी। वासुकी की बातें सुनकर उन्हें यह समझ आ गया कि उनका नागलोक में आना केवल श्री राम द्वारा उन्हें उनके कर्तव्य से भटकाने  के उदेश्य था  ताकि कालदेव अयोध्या में प्रवेश कर सके और श्रीराम को उनके जीवनकाल के समाप्त होने की सूचना दे सकें। उसके बाद उन्होंने सोचा की अब जब मैं अयोध्या वापस लौटूंगा तो मेरे प्रभु राम वहां नहीं होंगे। और ज्ब श्री राम नहीं होंगे तो मैं अयोध्या में क्या करूँगा। इसके बाद हनुमान जी अयोध्या वापस नहीं गए। 

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷

🌷भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang🌷

भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang
भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है Bhagavaan Jo Karata Hai Achchha Hee Karata Hai - GuruSatsang
एक मछली तालाब में अपने परिवार के साथ रहती थी, तालाब में पानी कभी सूख भी जाता था तो परमेश्वर को याद करती, पूजा तप आदि करती थी। 

एक दिन तूफ़ान और बारिश आयी जिससे मछली का परिवार बहकर नदी में बहने लगा, मछली ने व् उसके परिवार ने नदी के विपरीत दिशा में बहने की काफी कोशिश् की पर उनकी एक न चली, 

थक हारकर नदी के प्रवाह में ही बहकर ईश्वर को खूब कोसा और भला बुरा कहा और कुछ दिन में ही समुन्दर में पहुच गये, 

वहाँ जाकर उनको अहसास हुआ क़ि ईश्वर ने हमको दरिया से निकाल कर विशालता में ला दिया उसने हमारे जीवन में तूफ़ान लाकर अपने विशाल स्वरुप से जोड़ दिया। 

संगत जी हर पल उसकी रजा में राजी रहो, वो पूरा समुन्दर दे रहा है और हम एक चम्मच लेकर खड़े हैं, हम उसके हर कार्य के लिए कोसते रहते हैं, वो पालनहार कैसे बुरा कर सकता है

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
🙏भगवान कृष्ण और फल वाली महिला कहानी🙏
🌷एक बार एक महिला फल बेच रही थी। जब वह श्री कृष्ण के घर के सामने से गुजर रही थी तब श्रीकृष्ण को कुछ फल खाने का मन किया। जब कृष्ण ने उस फल बेचने वाली महिला से कुछ फल मांगे तो उसने कृष्ण से उन फल के बदले कुछ मांगा।
गुरुसत्संग : Krishna bhajan देना हो तो दीजिये जन्म जन्म का साथ  sanwariya bhajan : GuruSatsang
गुरुसत्संग : Krishna bhajan देना हो तो दीजिये जन्म जन्म का साथ  sanwariya bhajan : GuruSatsang
फल के बदले अनाज देने के लिए कृष्ण घर के अंदर दौड़ते हुए गए और मुट्ठी भर अनाज लेकर वापस फल वाली के पास आये। परंतु आते आते उनके हाथ से सारा अनाज गिर जाता था।

कृष्ण बार-बार  घर के अंदर जाते और कुछ अनाज अपने हाथ में लेकर आने की कोशिश करते हैं परंतु सारा अनाज नीचे गिर जाता। यह देखकर वह फल वाली बहुत प्रसन्न हुई और उसने कृष्ण को सारे फल दे दिए।

कृष्ण अंदर-अंदर उस फल वाली से बहुत प्रसन्न हुए। जब वह फल वाली अपना खाली टोकरा लेकर वहां से चली गई और अपने घर पहुंची तो उसने देखा कि उसकी टोकरी सोने और जवाहरात से भरी हुई है।🌷
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरु सत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग :: सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय : Sona Kaee Na Lage, Loha Ghun Nahin Khaay. Bura Bhala Guru Bhakt, Kabhoo Nark Nahin Jaay :: GuruSatsang
सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय।।।। गुरु सत्संग स्वामी ।।
जीव को सन्त सतगुरु इसी प्रकार अपने जैसा बना लेता है जैसे भृंगी कीड़ा स्वयं अपने गर्भ से किसी भृंगी की उत्पत्ति नहीं करता बल्कि वह किसी भी दूसरी जाति के मृत कीट को उठा कर ले आता है। उसको वह अपने घरौंदे में रख लेता है और उसे वह अपनी शब्द ध्ुन सुना कर न केवल जीवित कर लेता है बल्कि वह उस कीट को भृंगी ही बना देता है अथवा वह अपना स्वरूप भी उसको दे देता है। अतः सन्त सतगुरु भी अपने शिष्य के जगत और अगत को उसी प्रकार से सुखी बना देता है जिस प्रकार से उसके अपने जगत-अगत सुखी होते हैं। परन्तु इस बात के लिए उनकी एक ही शर्त होती है कि जीव उनके वचनों के अनुसार बरते यानि व्यवहार करता रहे।
---परम सन्त हुजूर साहेब जी महाराज 

आज के कलिकाल में सन्तों ने जीव के उद्धार के लिए उसको सभी दुःखों से छुटवाकर उसे सदा के लिए मुक्ति प्राप्त करने का सरल व सहज मार्ग बताया। वह मार्ग है नाम का मार्ग। परन्तु यह मार्ग इतना सरल व सहज भी नहीं है। इस मार्ग पर चलने वाले जीव को तन, मन और धन की जगात अपने सतगुरु को देनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में जीव को अपना सब कुछ त्याग कर ही जगत और अगत के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
--- परम साहेब जी महाराज ॥

चार से विवाद मत करो 

1. मुर्ख से 
2. पाग़ल से 
3. गुरु से
4. माता पिता से 

चार से शर्म नही करना 

1 पुराने कपडे में
2. गरीब साथियों में
3. बूढ़े माता पिता में
4. सादे रहन सहन में
🌷 *Guru Satsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग :: जीवन का यही विधान है - ज़िंदगी ही समस्या है और ज़िंदगी ही निदान है - Jeevan ka Yahee Vidhaan Hai - Zindagee Hee Samasya Hai Aur Zindagee Hee Nidaan Hai :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: जीवन का यही विधान है - ज़िंदगी ही समस्या है और ज़िंदगी ही निदान है - Jeevan ka Yahee Vidhaan Hai - Zindagee Hee Samasya Hai Aur Zindagee Hee Nidaan Hai :: GuruSatsang
*युग-युगान्तर से*
*जीवन का यही विधान है,*
*ज़िंदगी ही समस्या है*
*और ज़िंदगी ही निदान है।*🙏

घर में रहो कमा के खाओ,
पर धन पर तिरीया से नेह ना लगाओ ।
पर नारी पैनी छुरी,तीन कोन से खा ।
धन हड़े जौवन हडें अंत पंचा में लेजा ।।
चाहना रख एक राम नाम की, सारा धोना धो देगी ।
इससे दूजी चाहना तुझे, दूनिया जहांन से खो देगी ।।
सतगुरु परम संत जी महाराज

तड़प रही है रूह मेरी 
करार पाना चाहती है
पुकार लो मुझको मेरे मुर्शिद
आपकी चौखट पर आना चाहती है
दिल नहीं लगता पल भर को भी
कैसे जिन्दगी गुजारू मैं
कर दो करम मेरे सतगुरू
जिन्दगी जिन्दगी पाना चाहती है🌹

*हर संकट व दुख को हरण करने वाली जो शक्ति है उसका नाम हनुमान है........*
*या अपने शब्दों में कहूं तो वह सतगुरु का बक्शा हुवा नाम है..........*

*ओर यह मन मनाक पर्वत है..........*
*जब तक नाम रूपी हनुमान को हम धारण नहीं करते तब तक मनाक रुपी पर्वत को पार करना मात्र कल्पना हैं।*

*आप सब को कर बन्ध्द जी।*
*मालिक सब की खुशीयों से झोली भरे।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग शब्द : स्वामी को क्यों सूरत भूली - Svaamee ko Kyon Soorat Bhoolee : GuruSatsang Shabd
गुरुसत्संग शब्द : स्वामी को क्यों सूरत भूली - Svaamee ko Kyon Soorat Bhoolee : GuruSatsang Shabd
स्वामी को क्यों सूरत भूली ।।टेर।।

नश्वर सामानों को पाकर । क्यों मन में फूली ।।
यह सब है माया की जूँठन । मिले ज्ञान धूली (1)

अनन्त काल से मर मण्डल में । भटकत तूँ डोली ।।
बाने बने और नश जावे। अब पकड़ो मूली (2)

स्वामी सब का है करतारा । केर उनसे मेली ।।
सतगुरू उनके हैं अवतारा । लाते शब्द थैली (3)

तूँ सूरत अब उन सँग लगजा । धो डाले मैली ।।
जन्म जन्म के दाग छुटेंगे । नहीं रक्खें फैली (4)

चेतनता संग्रह करवा कर । देंगे शब्द झूली ।।
राधास्वामी शब्द को पाकर । भर जावे झोली (5)
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता, उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता!

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हुँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं"।

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा। ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।

🙏🌹🙏 परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता। 🙏🌷🙏
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग शब्द*🌷
गुरुसत्संग शब्द : हाड माँस की बनी है देही - Haad Maans Kee Banee Hai Dehee : GuruSatsang Shabd
गुरुसत्संग शब्द : हाड माँस की बनी है देही - Haad Maans Kee Banee Hai Dehee : GuruSatsang Shabd
जपलो राधा स्वामी नाम ।।टेर।।

कुछ भी इसमें शुद्ध नहीं है, नवों द्वार गंदे ही रही है ।
इनमें बर्ते रहना यहीं है,
निज घर अपने कभी न जई हैं ।
मूरख मानव चेत करो, अब बनालो अपना काम (1)

काम चलाने काम है करना,
तृष्णा अग्नि में नहीं जरना ।
फूँक फूँक कर क़दम है धरना,
कर्म करोगे वो ही भरना ।
दूषित कर्मो को करके, यहाँ नहीं होना बदनाम (2)

किसके कारण पाप कमाते,
सब ही यहाँ पर आते जाते ।
कुछ भी नहीं संग में ले जाते,
कर्मो का फल सब हैं पाते ।
भजन ध्यान के कर्म करो,
घट पीवो शब्द का ज़ाम (3)
🌷 *GuruSatsang Shabd*🌷

🙏गुरुसत्संग स्वामी जी🙏
एक संत रोज अपने शिष्यों को सतसंग करते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ बताते हैं, वह समझ में नहीं आता, मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। गुरु ने कहा- कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ।
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
शिष्य चकित हुआ, आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए उसने टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर गया। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं, कोई फायदा नहीं। गुरु जी बोले- फायदा है। टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सत्संग बार बार सुनने से ही गुरु कृपा शुरू हो जाती है । भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन तुम सत्संग का लाभ अपने जीवन मे जरुर महसूस करोगे और हमेशा गुरु की रहमत तुम पर बनी रहेगी 
🙏GuruSatsang🙏

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
बहुत पुरानी बात है कि किसी गाँव में एक साधु रहते थे। दुनिया की मोह माया से दूर होकर जंगल में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुबह शाम ईश्वर के गुण गाना और लोगों को अच्छे कर्मों का महत्त्व बताना यही उनका काम था।

एक दिन उनके मन में आया कि जीवन में एकबार माता वैष्णोदेवी के दर्शन जरूर करने चाहिये। बस यही सोचकर साधु महाराज ने अगले दिन ही वैष्णो देवी जाने का विचार बना लिया।

एक पोटली में कुछ खाने का सामान और कपडे बांधे और चल दिए माँ वैष्णोदेवी के दर्शन करने।

ऊँचे पर्वत पर विराजमान माता वैष्णोदेवी के दर्शन के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।

वो साधु भी धीरे धीरे सर पे पोटली रखकर चढ़ाई चढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी, उस लड़की ने अपनी पीठ पर एक लड़के को बैठाया हुआ था। वो लड़का विकलांग था और वो लड़की उसे कमर पर बैठाकर चढ़ाई चढ़ रही थी।

साधु को ये सब देखकर उस लड़की पर बड़ी दया आयी और वो बोले – बेटी थोड़ी देर रूककर बैठ जा तू थक गयी होगी तूने इतना बोझ उठा रखा है..

वो लड़की बोली – बाबा जी बोझ तो आपने अपने सर पर उठा रखा है ये तो मेरा भाई है……

चलते चलते साधु के पाँव ठिठक गए…..

कितनी बड़ी बात कही थी उस लड़की ने,,,,

कितना गूढ़ मतलब था उस लड़की की बात का – बोझ तो आपने उठा रखा है ये तो मेरा भाई है….

कितनी जिम्मेदारी भरी थी उस मासूम सी लड़की में...

*उस दिन उन साधु को एक बात समझ में आ गयी कि अगर हर इंसान अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे तो शायद दुनिया में दुःख नाम की कोई चीज़ ही ना बचे…..*

*अपनी जिम्मेदारी से बचिए मत , जिम्मेदार बनिये , पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाइये।*

*आप जो भी हैं, चाहे डॉक्टर हैं, छात्र हैं, शिक्षक हैं…

अपने हर काम को जिम्मेदारी से कीजिये। अगर बोझ समझ कर करेंगे तो आप उस काम में कभी सफल नहीं हो पायेंगे। इसीलिए सफल होने के लिए आपका एक जिम्मेदार इंसान होना बेहद जरुरी है।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग :: गौर कर प्यारे : Gaur Kar Pyaare :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: गौर कर प्यारे : Gaur Kar Pyaare :: GuruSatsang
🙏🏽☝🏽🙏🏽
“गौर कर प्यारे”

एक फटा हुआ नोट किसी छोटे दुकानदारों के पास नहीं चलता।

लेकिन वह नोट बड़ा "व्यापारी" ले लेता हैं। और वह क्या करता है ....???

उस नोट को गोंद या टेप से चिपकाता है और सफाई करके साफ़ नोटों की गड्डी के बीच मे मिला कर चला देता है।

इसी तरह हमारे "सतगुरु" हम जैसे पापी जीवों को... गुरमुखो के बीच मिला कर साफ करके हमे भवसागर से पार कर देते है।
🙏🏽☝🏽🙏🏽
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
*एक बार स्वामी विवेकानंद जी किसी स्थान पर प्रवचन दे रहे थे । श्रोताओ के बीच एक मंजा हुआ चित्रकार भी बैठा था । उसे व्याख्यान देते स्वामी जी अत्यंत ओजस्वी लगे । इतने कि वह अपनी डायरी के एक पृष्ठ पर उनका रेखाचित्र बनाने लगा।*

*प्रवचन समाप्त होते ही उसने वह चित्र स्वामी विवेकानंद जी को दिखाया । चित्र देखते ही, स्वामी जी हतप्रभ रह गए । पूछ बैठे - यह मंच पर ठीक मेरे सिर के पीछे तुमने जो चेहरा बनाया है , जानते हो यह किसका है ? चित्रकार बोला - नहीं तो .... पर पूरे व्याख्यान के दौरान मुझे यह चेहरा ठीक आपके पीछे झिलमिलाता दिखाई देता रहा।*

*यह सुनते ही विवेकानंद जी भावुक हो उठे । रुंधे कंठ से बोले - " धन्य है तुम्हारी आँखे ! तुमने आज साक्षात मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस जी के दर्शन किए ! यह चेहरा मेरे गुरुदेव का ही है, जो हमेशा दिव्य रूप में, हर प्रवचन में, मेरे अंग संग रहते है ।*

*मैं नहीं बोलता, ये ही बोलते है । मेरी क्या हस्ती, जो कुछ कह-सुना पाऊं ! वैसे भी देखो न, माइक आगे होता है और मुख पीछे। ठीक यही अलौकिक दृश्य इस चित्र में है। मैं आगे हूँ और वास्तविक वक्ता - मेरे गुरुदेव पीछे !"*

*"गुरु शिष्यों में युगों युगों से यही रहस्यमयी लीला होती आ रही है ।"*

*"अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखे क्योंकि वह सदैव हमारे साथ हैं.!!"*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।

राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?"

वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?"

ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"

ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः

"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"

ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?"

तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?"

"आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?"

"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥
'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"

"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" 
"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?"
ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"

"किस प्रकार?"

"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?"

आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"

कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग शब्द : तुम बिन सतगुरू हम दुखी है,कोई नही सहारा - Tum Bin Sataguroo Ham Dukhee Hai, Koee Nahee Sahaara : GuruSatsang Shabd
गुरुसत्संग शब्द : तुम बिन सतगुरू हम दुखी है,कोई नही सहारा - Tum Bin Sataguroo Ham Dukhee Hai, Koee Nahee Sahaara : GuruSatsang Shabd
तुम बिन सतगुरू हम दुखी है,कोई नही सहारा ।
देवो अपनी दात गुरू उतरै भव जल पारा ।।टेक।।

1. जैसे मीन दुखी बिन नीर रे
नीर है जीवन सारा ।
छीर बिना शिश दुखी रे,
बिन मात दुख भारा ।।

2. जैसे पपीया दुखी बिन स्वाती रे
ओर नीर नही भारा ।
बिन चाँद के चकोर दुखी रे
छाया जीवन मे अंधीयारा।।

3.जैसे निर्धन दुखी बिन धन रे
करै गरीबी मे गुजारा
बिन पुत या बांझ दुखी रे
नही दुख मिटावण हारा ।।

4. साहेब कंवर सतगुरू पूरा रे
जोङा नाम से नाता
बिन दर्शन दास लीलू
बहुत धणा दुख पा रा
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *GuruSatsang*🌷
**एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता उसकी छोटी सी दुकान थी । उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था । इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता । वह लोगों के सामने डींग हांका करता था ।**
गुरुसत्संग : हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है - Har Praanee ko Khilaane Vaala koee Aur Hai Ham Sabhee to Apane Apane kiradaar Nibha Rahe : GuruSatsang
गुरुसत्संग : हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है - Har Praanee ko Khilaane Vaala koee Aur Hai Ham Sabhee to Apane Apane kiradaar Nibha Rahe : GuruSatsang
**एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा । संत कह रहे थे, “दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता । यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा । सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है ।**

**सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, “मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है । मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे । संत बोले, “यह तुम्हारा भ्रम है हर कोई अपने भाग्य का खाता है ।**

**उस पर मुखिया ने कहा, “आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए । संत ने कहा, “ठीक है । तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ । ”उसने ऐसा ही किया । गांव मे यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है । **

**मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तकशोक संतप्त रहे गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए । एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी । गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया एक महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया ।**

*घर वालों ने भूत समझ कर दरवाजा नहीं खोला । जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया ‘हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है ,अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं । *

*उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया । संसार किसी के लिए भी नही रुकता ! यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है तथा संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा । जगत को चलाने की हामी भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है । इसलिए अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है । **

**कहने का तातपर्य यह है कि हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है ,हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है फिर अभिमान किस बात का ? **

**अत: सन्त महात्माओं का कथन सत्य है उनके कहने
पर चलो और झूठे अभिमान से बचो ।**

🙏🌹🙏 सतसंग में बहुत बैठते हैं पर सतसंग किसी भागी में बैठता है 🙏🌷🙏
🌷 *गुरुसत्संग*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग : हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये : Hamen jo Yah Janam Maalik Ne Diya Hai Ise Vyarth Na Gavaaye :: GuruSatsang
गुरुसत्संग : हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये : Hamen jo Yah Janam Maalik Ne Diya Hai Ise Vyarth Na Gavaaye :: GuruSatsang
*सतगुरु जी कहते है हमें जो यह जनम मालिक ने दिया है इसे व्यर्थ न गवाये।*

*हमारा हर दिन नया जन्म है हमारी हर साँस उस मालिक की दी हुई है। हमें नहीं मालूम कब यह डोर टूट जायेगी।*

*हमें चहिये की हर समय मालिक को पाने के लिए भजन सिमरन करते रहे मालिक अपने तरफ कदम बढ़ाने वाले को आगे हो कर गले लगते है।जो मालिक का प्यारा बन जाता है उसे हमेशा के लिए अपने चरणो में जगह देते है।।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

। गुरुसत्संग
गुरुसत्संग : कहानी प्रतापगढ़ के राजा की (मेहनत और समय) Special Story Pratapgarh Raja :: GuruSatsang
गुरुसत्संग : कहानी प्रतापगढ़ के राजा की (मेहनत और समय) Special Story Pratapgarh Raja :: GuruSatsang
एक समय की बात है, प्रतापगढ़ के राजा की कोई संतान नहीं थी. लेकिन राज्य को आंगे बढ़ाने के लिए एक उतराधिकारी की जरुरत थी. इसलिए राजा ने एक फैसला किया कि वह अपने ही राज्य से किसी एक बच्चे को चुनेगा जो उसका उत्तराधिकारी बनेगा….
इस इरादे से राजा ने अपने राज्य के सभी बच्चों को बुलाकर यह घोषणा की कि वह इन बच्चों में से किसी एक को अपना उत्तराधिकारी चुनेगा…

उसके बाद राजा ने उन बच्चो को एक एक थैली बंटवा दी और कहा….. 
कि आप सब लोगो को जो थैली दी गई है उसमे अलग-अलग फूलों का बीज हैं.. हर बच्चे को सिर्फ एक एक बीज ही दिया गया है… 
आपको इसे अपने घर ले जाकर एक गमले में लगाना है… 
और 6 महीने बाद हम फिर इस आप सब के इस गमले के साथ यहीं इकठ्ठा होंगे और उस समय मैं फैसला करूँगा की कौन इस राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा…
उन लडकों में एक ध्रुव नाम का लड़का था, बाकी बच्चो की तरह वो भी बीज लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस आ गया… 
उसी दिन घर जाकर उसने एक गमले में उस बीज को लगा दिया और उसकी अच्छे से देखभाल की… 
दिन बीतने लगे, लेकिन कई हफ्ते बाद भी ध्रुव के गमले में पौधे का कोई नामोनिशान नही आया…. 
वहीं आस पास के कुछ बच्चों के गमलों में पौधे दिखने लगे… 
लेकिन ध्रुव ने सोचा की हो सकता है की उसका बीज अलग हो… 
यह सोचकर वह पौधे की देखभाल पूरी लगन के साथ करता रहा… 
लेकिन लगभग तीन महीने बीत जाने के बाद भी उसका गमला खली था…. 
जबकि दुसरे बच्चों के गमले में फूल भी खिलने लगे थे….
ध्रुव का खाली गमला देखकर सभी उसका मजाक उड़ाने लगे….. 
पर इसके बावजूद भी ध्रुव ने हार नही मानी और लगातार गमले की देखभाल करता रहा… 
देखते-देखते 5 महीने बीत गये , अब ध्रुव चिंतित था क्योंकि उसके गमले में कुछ नही निकला था । और अब उस गमले की देखभाल में उसकी रूचि कम हो गयी थी । लेकिन उसकी माँ ने समझाया कि - बेटा नतीजा कुछ भी हो लेकिन तुम्हे इस गमले पर अब भी उतनी ही मेहनत और उतना ही समय देना है जितना तुम पहले देते थे ,फिर भले ही गमले के प्रति तुम्हारी ये मेहनत बेरुखी से भरी हो । क्योंकि ऐसा करने से तुम्हे भी एक तसल्ली होगी कि बे चाह और बेरुचि ही सही लेकिन तूने उस गमले के लिये आखरी तक अपनी ड्यूटी और मेहनत दी। बाकी राजा जाने। और फिर अंत में उसकी माँ ने उसे ये भी समझाया कि सोचो अगर राजा को ये पता चलेगा कि आखरी में तुमने गमले के प्रति मेहनत और समय देना बन्द कर लिया था। तो हो सकता है राज तुमसे गुस्सा करें । और ध्रुव माँ की ये सब बातें सुनकर , तो कभी राजा के डर को याद कर , बेरुखी और बेरुचि ही सही लेकिन पूरा समय और मेहनत देता रहा ।
*और 6 महीने पूरे हो गए उस तय हुए दिन सभी बच्चों को महल में इकठ्ठा किया गया सभी के गमलों में पौधे थे…
बस ध्रुव का गमला खाली था… 
राजा बच्चों के बीच से होकर आंगे बढ़ने लगे … 
और गमले में लगे सबके पौधों का निरिक्षण करते… 
सबके पौधे देखते-देखते राजा की नजर ध्रुव के गमले पर पड़ी… 
राजा ने ध्रुव से पूछा… 
क्या हुआ तुम्हारा गमला खली क्यों है?*
*ध्रुव ने हिचकिचाहट के साथ जबाव दिया- जी मैंने तो इस गमले पर पूरे 6 महीने तक अपनी तरफ से पूरी मेहनत की और पूरा पूरा समय भी देता रहा लेकिन इसमें से कुछ भी नही निकला….*
*राजा आंगे बढ़े और सभी के गमले देखने के बाद सभी बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि – आप लोगों ने पौधा लाने में बहुत मेहनत की ।ज्यादातर लोग किसी भी कीमत में राजा बनना चाहते हैं लेकिन एक लड़का यहाँ खाली हाथ आया… 
जिसका नाम है ध्रुव… 
राजा ने ध्रुव को अपने पास बुलाया । “राजा के इस तरह बुलाने पर ध्रुव को कुछ अजीब लगा..” ध्रुव धीर-धीरे राजा के पास पहुँचता है… 
जैसे ही राजा ध्रुव के उस खाली गमले को उठाकर सभी बच्चों को दिखता है…. सभी हंसने लगे….*
*राजा ने ऊँची आवाज में कहा- शांत हो जाओ । 6 महीने पहले मैंने आप सब को जो एक एक बीज दिये थे , वे सब बंजर थे जो कभी उग नही सकते थे…. 
आप चाहे उसकी कितनी भी देख रेख कर ले उसमे से कुछ भी नही उग सकता था , लेकिन आप सब ने बीज बदल कर आसानी से उगने वाले दूसरे बीज़ ख़रीदे ताकि आप राजा बन सकें। लेकिन आप सब में सिर्फ ध्रुव ही है जो खाली हाँथ आया है । ध्रुव ने मेरे दिये उस बीज़ पर खूब मेहनत की और जब अंत में उसे लगा कि शायद बीज उगने का कोई चारा नही तो भी बेरुखी से ही सही लेकिन उसने पूरे 6 महीनो तक उस गमले में हर रोज अपनी मेहनत और समय दिया । इसलिये मैं ध्रुव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता हूँ ।*
सो भजन बन्दगी में भी अगर कोई रस नही आता, कोई आनंद या मज़ा नही आता , तो भी बैठो ।
बेरुखी , बेरुचि या डर से ही सही, लेकिन पूरा समय दो
पता नही कब वो मालिक हमारी इस बेरुखी , बेरुचि और डर को प्रेम में बदल कर हमें जीत का सरताज पहना दे ।
। GuruSatsang

🌷 *गुरुसत्संग शब्द*🌷
गुरुसत्संग शब्द : करूँ भेद निज घर का पूरा बयान - Karoon Bhed Nij Ghar ka Poora Bayaan : GuruSatsang Shabd
गुरुसत्संग शब्द : करूँ भेद निज घर का पूरा बयान - Karoon Bhed Nij Ghar ka Poora Bayaan : GuruSatsang Shabd
करूँ भेद निज घर का पूरा बयान ।
यही राधास्वामी मत है अन्दर जहान (1)
सुरत शब्द जुगति से जाना है पार ।
तभी होगा सबका ही उद्धार (2)
मगर संग सतगुरू का करना जरूर ।
बिना संग कारज न होवेगा पूर (3)
भरम और संशय है मन में भरे ।
बिना सतगुरू के यह नाहिं टरे (4)
कर्म और धर्म के लगे हैं भर्म ।
सही राह को गहने में करते शर्म (5)
पुरानी राहों में रहे सब अटक ।
तीर्थ और ब्रत में रहे हैं भटक (6)
समाध और गर्न्थो में हो रहे बेहाल ।
सही रास्ता रोक बैठा है काल (7)
बिना वक़्त सतगुरू चले नहीं चाल ।
इसी से हो रहे हैं सभी बेहाल (8)
सुरत अंश है तीसरे तिल में सार ।
सभी घट में चोटी पर स्वामी भण्डार (9)
नौ द्वारों का औघट है माया का कार ।
दसम दर से राह गई ब्रह्मण्ड के पार (10)
सत्तदेश बना स्वामी का दरबार ।
ब्रह्मण्ड में है काल की सरकार (11)
निरंजन ओम और ररंकार है नाम ।
सहँस दल त्रिकुटी और सुन्न है मुकाम (12)
बायें रचे काल ने है मुकाम ।
दहने रचाये हँ माया ने धाम (13)
चेतन धारा है मध्य की स्वामी नाम ।
उलट के लगे राधास्वामी है नाम (14)
जपना है सब को राधास्वामी नाम ।
नहीं और नामों के जापों का काम (15)
सतगुरू की सेवा उन्हीं का है ध्यान ।
नहीं चित में रखना है कोई आन (16)
सुरत चार जन्मों में सत्तलोक जाय ।
संग सतगुरू का भी मिलता भी जाय (17)
न छोड़े राधास्वामी गहलें जिन्हें ।
वे ले जाते सत्तलोक निश्चित उन्हें (18)
वे कर्मो को सबके हैं बदलाते जाय ।
नहीं पाप कर्मों की देते हैं राह (19)
बने तो कराते हैं सबका भला ।
भजन ध्यान से घट में देते चला (20)
घटाते हैं मन के सभी ही विकार ।
हटाते हैं जगत के मिथ्या विचार (21)
जब सतसंग त्राटक गूरू का करे ।
तभी चेतन औघट से घट में भरे (22)
जब सतगुरू की सेवा तन मन धन से करे ।
तभी जग के बन्धन से अन्तर टरे (23)
प्रीत और परतीत दिन दिन बढ़े ।
तभी रंग सतगुरू का इस पे चढ़े (24)
बिना उनके दिखे न कोई जहान ।
तभी उनका अन्तर में बन पाये ध्यान (25)
राधास्वामी नाम मन से सुमिरन करे ।
संसारी रागों को तभी परिहरे (26)
कोई दिन में ब्रह्मण्ड परवेश पाय ।
सुरत और मन अन्तर शब्दों समाय (27)
ब्रह्म पद में मन जावे समाय ।
सुरत चले सत्तदेश की ऒर धाय (28)
सत्तलोक सत्तपुरुष का दर्शन करे ।
सुरत अपने प्रीतम को जाके वरे (29)
सत्तपुरुष इजाजत ले ऊपर को जाय ।
अलख और अगम लोक पार कराय (30)
राधास्वामी धाम में जाकर समाय ।
राधास्वामी माता पिता मिल जाय (31)
आदि में थी सुरतें स्वामी में ।
अन्त में भी रहना स्वामी में (32)
सुरत धारा जब लग भटकेगी वार ।
कभी नहीं होना है सच्चा उद्धार (33)
जपो प्रीत से नित्त राधास्वामी नाम ।
तभी पावोगे एक दिन राधास्वामी धाम (34)
🌷 *GuruSatsang Shabd*🌷

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग :: सब सिमरण पे तो बैठते है - Sab Simaran Pe to Baithate Hai :: GuruSatsang
गुरुसत्संग :: सब सिमरण पे तो बैठते है - Sab Simaran Pe to Baithate Hai :: GuruSatsang
कोई दस मिनट कोई बीस मिनट और कोई घंटा दौ घण्टा पर शब्द धुन को हम समय देना जरुरी नही समझते पर पार लगाने वाली शक्ति शब्द धुन ही है मन को काबू करने वाली ताकत शब्द में ही है संतो की वाणी में शब्द धुन की महिमा कुछ इस तरह मिलती है-

" धुन सुन कर मन समझाई ।
कोटि यत्न से ये नही माने।।"

तू बैठ अकेला ध्यान धर 
तो मिले निशानी शब्द की।

बिन शब्द उपाय न दूजा
काया का छुट्टे न कुजा।।

हम वासी उस देश के,
जहां ज़ात वर्ण कुल नाही।।
शब्द मिलावा होये रहे।
देह मिलावा नाही।।

आँख कान मुख बंद कराओ
अनहद झींगा शब्द सुनाओ

सुनता नही धुन की खबर 
अनहद का बाजा बाजता।

शब्द शब्द की रेख कटाई।
शब्द शब्द में जाये मिलाई।।

सिमरण से भी जरुरी शब्द धुन का अभ्यास है.
🌷 *GuruSatsang*🌷
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