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देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

मित्रों यूँ तो आपने महाभारत से जुडी कई कथाएं सुनी होगी परन्तु महाभारत से जुडी कई ऐसी कथाएं हैं जिससे आज भी हिन्दू जनमानस अनजान हैं। इस लेख में हम आपको महाभारत काल में दिए गए कुछ ऐसे श्राप के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में ये माना जाता है की उन श्रापों को आज भी जनमानस भुगत रहे हैं।

पहला श्राप – युधिष्ठिर द्वारा स्त्री जाति को दिया गया श्राप
महाभारत में दिए गए श्रापों में युधिष्ठिर का स्त्री जाति को दिया गया श्राप सर्वविदित है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार जब कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान अर्जुन ने महारथी कर्ण का वध कर दिया तब पांडवों की माता कुंती उसके शव के पास बैठकर विलाप करने लगी। यह देखकर पांडवों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की आखिर ऐसी क्या बात है जो हमारी माता हमारे शत्रु के शव पर अपना आंसू बहा रही है। तब ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर अपनी माता कुंती के पास गए और उन्होंने देवी कुंती से पूछा माता क्या बात है  जो आप हमारे सबसे बड़े शत्रु कर्ण के शव पर विलाप कर रही है। तब देवी कुंती ने बताया की पुत्रों जिससे तुम अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते रहे वास्तव में वो तुम सभी का बड़ा भाई था। कर्ण राधेय नहीं बल्कि कौन्तेय था। अपनी माता के मुख से ऐसी बातें सुनकर पांचों पांडव दुखी हो गए। फिर कुछ क्षण रुककर युधिष्ठिर अपनी माता कुंती से बोले हे माते ये बात तो आप सदा से जानती रही होगी की अंगराज कर्ण मेरे बड़े भाई थे तब आप ने हमलोगों को यह बात बताई क्यों नहीं। इतने दिनों तक ये बात आप छुपा कर क्यों रखी,आपके एक मौन ने हम सभी को अपने ही भाई का हत्यारा बना दिया। इसलिए मैं आज इस धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में सभी दिशाओं,आकाश और धरती को साक्षी मानकर सभी स्त्रीजाति को ये श्राप देता हूँ की आज के बाद कोई भी स्त्री अपने अंदर कोई भी रहस्य नहीं छुपा पाएगी।

महाभारत काल के पांच श्राप जिन्हें आज भी भुगत रहे हैं लोग
महाभारत काल के पांच श्राप जिन्हें आज भी भुगत रहे हैं लोग

दूसरा श्राप – श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप
कथा के अनुसार छतीस साल हस्तिनापुर पर राज करने के पश्चात् जब पांचों पांडव द्रौपदी सहित स्वर्गलोक की और प्रस्थान करने हुए तो उन्होंने अपना सारा राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के हाथो में सौंप दिया। ऐसा माना जाता है की राजा परीक्षित के शासन काल में भी हस्तिनापुर की सारी प्रजा युधिष्ठिर के शासनकाल की तरह ही सुखी थी। परन्तु कहते हैं ना की होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन राजा परीक्षित रोज की तरह ही वन में आखेट खेलने को गए तभी उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए। वे अपनी तपस्या में लीन थे तथा उन्होंने मौन व्रत धारण क़र रखा था। परन्तु ये बात राजा परिलक्षित को मालोमं नहीं था। इसलिए राजा परीक्षित ने कई बार ऋषि शमीक को आवाज लगाई लेकिन उन्होंने अपना मौन धारण रखा। यह देखकर राजा परीक्षित को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में आकर ऋषि के गले में एक मारा हुआ सांप डाल दिया।उधर जब यह बात ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया की आज से सात दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो जायेगी।और अंत में ऋषि श्रृंगी के श्राप के कारण राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने के कारण ही हुई। और ऐसा माना जाता है की उसी के बाद कलयुग की शुरुआत हुई क्यूंकि  राजा परीक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था की वह इंसानो पर हावी हो सके। और आज हम सभी इस कलयुग को उसी श्राप के कारण भोग रहे हैं।

तीसरा श्राप – श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप
महाभारत युद्ध के अंतिम दिन जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया और बात का पता जब पांडवों को चला तो तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंचे। पांडवों को अपने सामने देख अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र से वार किया। यह देख श्री कृष्ण ने अर्जुन को ब्रह्मास्त्र चलने को कहा जिसके बाद अर्जुन ने भी अश्व्थामा पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। परन्तु महर्षि व्यास ने बिच में ही दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा एवं अर्जुन से कहा क्या तुम लोग ये नहीं जानते की ब्रह्मास्त्र के आपसे में टकराने से समस्त सृष्टि का नाश हो जायेगा। इसलिए तुम दोनों  अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस ले लो। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने महर्षि से कहा महर्षि मेरे पिताजी ने इसे वापस लेने की विद्या नहीं सिखाई है इसलिए मैं इसे वापस नहीं ले सकता और इसके बाद उसने ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी. तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे।दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे।और इसी कारण आज भी ये माना जाता है की अश्व्थामा अभी भी जीवित है।

चौथा श्राप – माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप
महाभारत में मांडव्य ऋषि का वर्णन आता है। एक बार राजा ने भूलवश न्याय में चूक क़र दी और अपने सैनिकों को ऋषि मांडव्य को शूली में चढ़ाने का आदेश दे दिया।परन्तु जब बहुत लम्बे समय तक भी शूली में लटकने पर ऋषि के प्राण नहीं गए तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ तथा उन्होंने ऋषि मांडव्य को शूली से उतरवाया तथा अपनी गलती के लिए मांगी। इसके बाद ऋषि माण्डव्य यमराज से मिलने गए तथा उनसे पूछा की किस कारण मुझे झूठे आरोप में सजा मिली। तब यमराज ऋषि से बोले जब आप 12 वर्ष के थे तो आपने एक छोटे से कीड़े के पूछ में सीक चुभाई थी जिस कारण आपको यह सजा भुगतनी पड़ी।यह सुन ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने यमराज से कहा की  किसी को भी 12 वर्ष के उम्र में इस बात का ज्ञान नहीं रहता की धर्म और अधर्म क्या है। क्योकि की तुमने एक छोटे अपराध के लिए मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। अतः मैं तुम्हे श्राप देता हूँ की तुम शुद्र योनि में दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे। माण्डव्य ऋषि के इस श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पडा।

पांचवां श्राप – अप्सरा उर्वशी का अर्जुन को श्राप
ये कथा उस समय की है जब तरह साल के वनवास के दौरान एक बार अर्जुन दिव्यास्त्र की खोज में स्वर्ग लोक गया। वहां उर्वशी नाम की एक अप्सरा उनके रूप एवं सौंदर्य को देखकर उन पर मोहित हो गई। फिर एक दिन उर्वशी ने अर्जुन को विवाह करने को कहा तब अर्जुन ने उससे कहा की मैं आपको माता के समान मनाता हूँ इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकत। इस बात पर उर्वशी क्रोधित हो गई तथा उसने अर्जुन से कहा की तुम एक नपुंसक की तरह बात क़र रहे हो, इसलिए मैं तुम्हे श्राप देती हूँ की तुम आजीवन नपुंसक हो जाओ तथा स्त्रियों के बीच तुम्हे नर्तक बन क़र रहना पड़े। यह बात सुनकर अर्जुन विचलित हो गए और फिर वो देवराज इंद्र के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। उसके बाद देवराज इंद्र के कहने पर उर्वशी ने अपने श्राप की अवधि एक साल के लिए सिमित कर दी। तब इंद्र ने अर्जुन को संतावना देते हुए कहा की तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है यह श्राप तुम्हारे वनवास के समय वरदान के रूप में काम करेगा और अज्ञातवास के समय तुम नर्तिका के वेश में कौरवों के नजरो से बचे रहोगे।

जैसा की हम सभी जानते हैं की अधिकतर धर्मो में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपवित्र और अशुभ माना जाता है। आपने देखा होगा की मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने या फिर घर के पूजा घर में भी जाने की इजाजत नहीं होती। लेकिन अब ये सवाल उठता है की जब धार्मिक रूप से महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अशुभ और अपवित्र माना जाता है तो फिर वो इस दौरान कोई व्रत क्यों रखती है या फिर इस दौरान उन्हें व्रत करने का कोई फल मिलता भी है या नहीं। क्या ये शास्त्रोन्मत है अगर हाँ तो इसके पीछे क्या कारण है ?

मित्रों इन सवालों का जबाव देने से पहले आपको ये बता दूँ की भागवत पुराण के अनुसार मासिक धर्म के दौरान महिलाएं ब्रह्महत्या जैसी पाप को झेल रही होती है जी हाँ भागवत पुराण वर्णित कथा के अनुसार एक बार इंद्रदेव किसी अपमानजनक बात से गुरु बृहस्पति उनसे नाराज हो गए और वो स्वर्गलोक छोड़कर कहीं चले गए। उधर जब इस बात की सूचना असुरों को मिली तो असुरों ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। जिसमे देवराज राज को पराजय का सामना करना पड़ा और उन्हें अपनी गद्दी छोड़कर भागना पड़ा। उसके बाद इंद्रदेव ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे मदद करने को कहा। तब ब्रह्मा जी इंद्र से बोले इस समस्या से निजात पाने के लिए तुम्हे एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करनी होगी। यदि वह तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हो गए तो तुम्हे स्वर्गलोक वापस मिल जाएगी।

उसके बाद ब्रह्माजी के कहे अनुसार इंद्रदेव एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करने लगे। लेकिन इंद्रदेव इस बात से अनजान थे कि जिनकी वो सेवा कर रहे है उस ज्ञानी की माता असुर है। जिसकी वजह से उस ज्ञानी को असुरों से अधिक लगाव था। असुरों से लगाव की वजह से वो ब्रह्मज्ञानी इंद्रदेव की सारी हवन सामग्री देवताओं की बजाय असुरों को अर्पित कर देते थे।उधर कुछ दिनों बाद जब इस बात का पता इंद्रदेव को चला तो उन्होंने क्रोध में आकर उस ज्ञानी की हत्या कर दी। फिर उन्हें जब यह ज्ञात हुआ की उन्होंने ब्रह्महत्या कर बहुत बड़ा अधर्म कर दिया है तो वो एक फूल में छिपकर भगवान विष्णु की पूजा करने लगे।

क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?
क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?

कुछ दिनों बाद विष्णु जी इंद्रदेव की पूजा से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें बोले हे देवराज ब्रह्महत्या जैसे पाप से मुक्ति के लिए तुम्हे इसे पेड़, भूमि, जल और स्त्री में अपना थोड़ा-थोड़ा पाप बाँटना होगा। साथ मे सभी को एक एक वरदान भी देना होगा। उसके बाद इंद्रदेव सबसे पहले पेड़ से अपने पाप का अंश लेने का अनुरोध किया। तो पेड़ ने पाप का एक चौथाई हिस्सा ले लिया। जिसके बाद इंद्रदेव ने पेड़ को वरदान दिया की मरने के बाद तुम चाहो तो स्वयं ही अपने आप को जीवित कर सकते हो। उसके बाद इंद्रदेव के विनती करने पर जल ने पाप का कुछ हिस्सा अपने सर ले लिया। बदले में इंद्रदेव ने उसे अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति प्रदान की। इसी तरह भूमि ने भी इंद्र देव के पाप का कुछ अंश स्वीकार कर लिया।जिसके बदले इंद्रदेव ने भूमि को वरदान दिया की उस पर आई चोटें अपने आप भर जाएगी।

अंत में इंद्रदेव स्त्री के पास पहुंचे तो स्त्री ने बांकी बचा पाप का सारा अंश अपने ऊपर ले लिया। इसके बदले इंद्रदेव ने स्त्रियों को वरदान दिया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ काम का आनंद ज्यादा ले पाएँगी और ऐसा माना जाता है की तभी से महिलाएं मासिक धर्म के रूप में ब्रह्म हत्या का पाप झेल रही है।

तो मित्रों जैसा की आपने कथा में देखा की जब इंद्रदेव ब्रह्महत्या के पाप को झेल रहे तो उन्होंने फूल में छिपकर विष्णु जी आरधना की थी परन्तु उस समय ना तो उनके सामने कोई भी श्री विष्णु की प्रतिमा थी और नाही वो किसी मंदिर में थे। ठीक इसी तरह महिलाएं भी मासिक धर्म के दौरान व्रत तो कर सकती है लेकिन मंदिर नहीं जा सकती है और ना ही किसी मूर्ति की पूजा कर सकती है। परन्तु अगर इस दौरान ऐसा करती है तो भागवत पुराण के अनुसार उसे पाप माना गया है यानी मासिक धर्म के दौरान अगर कोई स्त्री मंदिर चली जाती है या फिर किसी देव की प्रतिमा को पूजती है तो वो पाप की भागिदार मानी जाती है जिसकी सजा उसे इसी जन्म में भुगतनी पड़ती है। लेकिन आपको ये भी बता दूँ की इस दौरान महिलाएं मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है इसलिए उनका तिरस्कार करने के बजाय उनके मनोबल बढ़ाने का कार्य करें। क्यूंकि कई जगह ऐसा देखा जाता है की जानकारी के आभाव में लोग मासिक धर्म के दौरान महिलाओं से बुरा बर्ताव करने से भी नहीं चूकते। 

हिन्दू धर्म में देवताओं के साथ साथ देवियों की भी पूजा की जाती है।जैसे देवों  में त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा,विष्णु और महेश को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।उसी तरह देवियों में सरस्वती.लक्ष्मी और माँ काली को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसा माना जाता है की देवी पार्वती ने ही दुष्टों का संहार करने के लिए मां काली का रूप धारण किया था। माँ काली का रूप देखने में बड़ा ही भयावह लगता है। उनके  हाथों में कपाट,रक्त से भरी कटोरी,लटकता नरमुंड और गले में मुंडों की माला उनके रूप को और भी भयावह बना देता है। लेकिन मैं आपको बताऊंगा की आखिर माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?
माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?
माँ काली को क्यों रक्त पीने की इच्छा हुई थी ?

रक्तबीज दैत्य की कथा

स्कन्द पुराण और दुर्गा सप्तशती की एक कथा के अनुसार पौराणिक काल में शंकुशिरा नामक एक अत्यन्त बलशाली दैत्य का पुत्र अस्थिचर्वण हुआ करता था जो मनुष्यों की अस्थियां चबाया करता था। वह मनुष्यों के साथ-साथ देवताओं पर भी अत्याचार किया करता था।  उसके अत्याचार से तंग आकर एक दिन देवताओं ने क्रोध में आकर उसका वध कर डाला। उसी काल में रक्तबीज नामका एक और दैत्य भी हुआ करता था। जब यह बात उसे पता चली तो वह देवताओं को पराजित करने के उदेश्य से ब्रह्मक्षेत्र में ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करने लगा।  

रक्तबीज की तपस्या

करीब पांच लाख वर्ष बाद रक्तबीज के घोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। भगवान ब्रह्मा को अपने सामने देखकर रक्तबीज ने सबसे पहले उन्हें प्रणाम किया और फिर बोला  हे परमपिता अगर आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये की मेरा वध देवता,दानव,गन्धर्व,यक्ष,पिशाच,पशु पक्षी,मनुष्य आदि में से कोई भी ना कर सके और  मेरे शरीर से जितनी भी रक्त की बूंदे जमीन पर गिरे उनसे मेरे ही समान बलशाली,पराक्रमी और मेरे ही रूप में उतने ही दैत्य प्रकट हो जाएँ। तब ब्रह्मा जी ने कहा हे रक्तबीज तुम्हारी मृत्यु किसी पुरुष द्वारा नहीं होगी लेकिन स्त्री तुम्हारा वध अवश्य कर सकेगी। इतना कहकर ब्रह्माजी वहां से अंतर्ध्यान हो गए।

रक्तबीज का अहंकार

उसके पश्चात् रक्तबीज वरदान के अहंकार में मनुष्यों पर अत्याचार करने लगा और एक दिन उसने वर के अहंकार में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया। और देवराज इंद्र को युद्ध में हराकर स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया । उसके पश्चात्  दस हजार वर्षों तक देवतागण रक्तबीज के भय से मनुष्यों की भांति दुःखी होकर पृथ्वी पर छिपकर विचरण करने लगे। उसके बाद इंद्र सहित सभी देवतागण पहले ब्रह्मा जी के पास गये। फिर सभी ने उनको अपनी व्यथा सुनाई। तब ब्रह्मा जी ने कहा मैं इस संकट से आप सभी को नहीं उबार सकता इसलिए हम सभी को विष्णुदेव के पास चलना चाहिए। फिर ब्रह्मा जी सहित सभी देवतागण श्री विष्णु जी के पास गये,परन्तु विष्णु जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया की रक्तबीज को मारना मेरे भी वश में नहीं है। फिर सभी देवता बैकुंठ धाम से कैलाश के लिए चल दिए। लेकिन जब वो वहां पहुंचे तो उनहे पता चला की भगवान शिव उस समय कैलाश पर नहीं बल्कि केदारनाथ क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट  पर विराजमान हैं।

तत्पश्चात सभी देवतागण केदारनाथ धाम पहुंचे। वहां पहुँचकर देवताओं ने भगवान शिव को सारी बात बताई। तब ब्रह्मा जी ने शिव से कहा हे शिव मेरे ही वरदान के कारण रक्तबीज का देवता,दानव, ,यक्ष,पिशाच,पशु पक्षी,मनुष्य आदि में से कोई भी वध नहीं कर सकता परन्तु स्त्री उसका वध अवश्य कर सकती है। तब भगवान शिव ने सभी देवताओं से आदि शक्ति की स्तुति करने को कहा।

माँ शक्ति की उत्पति

फिर सभी देवताओं ने  रक्तबीज के वध की अभिलाषा से आदि शक्ति की स्तुति करना शुरू किया। कुछ समय पश्चात् देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर हिमालय से एक देवी प्रकट हुई। और देवताओं से कहा की  हे देवगन आप दैत्य राज रक्तबीज से बिल्कुल निर्भय रहें। मैं अवश्य उसका वध करूंगी।उसके बाद देवी से वर पाकर सभी देवतागण अपने अपने स्थान को लौट गए गये। फिर एक दिन देवताओं ने नारद जी से कहा कि वे रक्तबीज में ऐसी मति उत्पन्न करें जिससे वह देवी के साथ किसी भी तरह का कोई अपराध करने को विवश हो जाये। उसके बाद नारद जी ने रक्तबीज के पास जाकर उसको उकसाने के उद्देश्य से कहा की कैलाश पर्वत के ऊपर भगवान शिव का निवास स्थान है। शिव जी को छोड़कर सभी देवता-दानव तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं और तुमसे डरते हैं। परन्तु शिव के साथ एक तन्वङ्गी नाम की अबला नारी रहती है जिसे शिवजी के कारण देव दानव कोई भी उन्हें जीत नहीं सकता है।

तब रक्तबीज ने कहा-देवर्षि ऐसा क्या कारण है जो उसको कोई नहीं जीत सकता?

देवी पार्वती का अपमान

फिर नारद जी ने रक्तबीज से कहा की तीनो देवों में से शिव जी सबसे अधिक जितेन्द्रिय और धैर्यवान् हैं। इसलिए देव-दानव-नाग आदि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, अगर तुम उनपर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो किसी तरह सबसे पहले उनका धैर्य डिगाओ। नारद के वचन सुनकर शिव जी को मोहित करने के उद्देश्य से रक्त बीज पार्वती के समान अत्यधिक सुन्दर स्त्री बनकर कैलाश पर्वत पर जा पहुंचा। उसके रूप और यौवन को देखकर एक बार तो शिव जी मोहित भी हो गये। परन्तु तभी पार्वती भी  वहां आ पहुंची। यह देख शिव जी दुविधा में पड़ गये। फिर उन्होंने ध्यानयोग से उस पार्वती रुपी दैत्य रक्तबीज को पहचान लिया। तब उन्होंने क्रोध में आकर उसे शाप दिया- हे दुष्ट तू कपट से पार्वती का वेश बनाकर मुझे छलने आया है, इसलिए महेश्वरी पार्वती ही तेरा वध करेगी!

भगवान शिव का अपमान करने के बाद  रक्तबीज अपने दरवार में आ गया। फिर वह अपने राक्षस मंत्रीगण के साथ शिव जी पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाने लगा। उसने सबसे पहले अपने मंत्रीगण से कहा की यदि पार्वती मुझसे से प्रेम करने लगी तो शिव का धैर्य अपने आप ही नष्ट हो जायेगा। फिर पत्नी वियोग के कारण शिव कमजोर भी हो जायेगा उसके बाद उसे हम आसानी से जित सकेंगे। फिर उसने अपने मंत्रियों को बताया की शिव ने उसे स्त्री के हाथों मरने का श्राप दे दिया है लेकिन वो ये नहीं जानता की मेरे सामने जब इन्द्र सहित कोई भी देवता नहीं टिक सकते तो भला मेरा वध एक स्त्री कैसे कर सकती है। इतना कहकर रक्तबीज जोर-जोर से हंसने लगा। फिर थोड़ी देर बाद उसने अपनी सेना को आदेश दिया की तत्काल तुमलोग कैलाश जाओ और पारवती को प्रेमपूर्वक मेरे पास लेकर आओ और अगर वो प्रेम से नहीं आई तो उसे घसीटते हुए लाना।  

रक्तबीज का वध

इसके बाद अपने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए दैत्यगण कैलाश पर्वत पर पहुंचा और वहां से देवी पार्वती को अपने साथ चलने को कहा। दैत्यों की बातें सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई और उन्होंने अपने हुंकार से दैत्यों को जलाकर भस्म करने लगी। उसी समय कुछ दैत्य किसी तरह वहां से अपनी जान बचाकर रक्तबीज के पास पहुंचे और उसे माता पार्वती के पराक्रम के बारे में बताया। यह सुनकर रक्तबीज क्रोधित हो उठा और उसने अपने सैनिकों को  कायर कहकर कारागार में डाल दिया।

 फिर रक्तबीज चण्ड,मुण्ड आदि जैसे असंख्य दैत्यों के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचा और देवी के साथ युद्ध करने लगा।  इस युद्ध में माता पार्वती सभी देवताओं की शक्तियों के साथ लड़ने लगी और चण्ड,मुण्ड सहित सभी दैत्यों का वध कर दिया। परन्तु रक्तबीज के शरीर से जीतनी भी रक्त की बूंदे धरा पर गिरती उससे उसके समान ही एक और दैत्य उत्पन्न हो जाता।  इसलिए अभी तक उसका वध नहीं हो सका था।फिर देवी पार्वती ने माँ काली का रूप धारण किया। और अपना मुंह फैलाकर रक्त बीज का खून पिने लगी  और इसी प्रकार अपनी जीभ फैलाई जिससे कुछ रक्तबीजों को निगल गयी व कुछ को रक्तविहीन कर मार दिया। अन्त में मुख्य रक्तबीज भी शूल आदि अस्त्रों से मारे जाने व उसका खून चूसे जाने से रक्तविहीन होकर धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार देवताओं सहित तीनोलोक  रक्तबीज के नाश से प्रसन्न हो गया।

भगवान की मृत्यु के विषय में जब भी चर्चा होती है तो वस्तुतः उसका अर्थ मृत्यु नहीं होता। भगवान ना तो कभी दिखते है और न ही कभी मरते। जब धर्म विलुप्त होता है तब उसकी रक्षा करने धरती पर अवतार लेते हैं। इसी क्रम में ऐसा कहा जाता है की जब भगवान कृष्ण की मृत्यु के पश्चात उनका दाह संस्कार हुआ तब उनके शरीर का एक अंग नहीं जला था। क्या भगवान के शरीर का दाह संस्कार हुआ? उनका कौन सा अंग नहीं जला और क्यों?

भगवान कृष्ण की लीलाएं उनके बचपन से ही बहुत रोचक रहीं हैं। हर कोई उनके विषय में जानने के लिए उत्सुक रहता है। उनकी मनमोहक छवि, उनके द्वारा की गयी लीलाएं। उनके प्रति सबका प्रेम अतुलनीय है। भगवद गीता के अनुसार भगवान कृष्ण की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता अर्थात संसार में जो कुछ भी होता है वो केवल उनकी इच्छा से होता है। उनकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं. वे ही परमपिता परमात्मा हैं। महाभारत का युद्ध भी उनकी इच्छा से ही हुआ जिसके माध्यम से उन्होंने धर्म का महत्त्व बताया। और उन्होंने स्वयं भी धर्म का ही पक्ष लिया. चूंकि कौरव अधर्म के पक्षपाती थे। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाने का प्रयास किया परन्तु दुर्योधन अपने हठ पर ही अड़ा रहा। तब महाभारत युद्ध के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचा था. महाभारत युद्ध के समय जब दुर्योधन का अंत हुआ तब उसकी माँ शोकाकुल हो उठी। महाभारत की रणभूमि में जब वो पुत्रो की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने पहुंची तब उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दिया की ठीक ३६ वर्षों पश्चात उनकी मृत्यु हो जाएगी क्यूंकि उन्हें ग़लतफहमी थी कि उनके पुत्रों की मृत्यु भगवान कृष्ण के कारण ही हुई है। वास्तव में तो भगवान कृष्ण किसी श्राप के कारण नहीं अपितु अपनी इच्छा से ही इस संसार से अदृश्य हुए थे क्यूंकि जो भी इस संसार में आता है उसकी देह का विनाश निश्चित है।
अंतिम संस्कार में भगवान कृष्ण का कौन सा अंग नहीं जला
अंतिम संस्कार में भगवान कृष्ण का कौन सा अंग नहीं जला

भगवान मृत्युलोक को छोड़ कैसे अपने लोक गए इसका वर्णन भागवतपुराण के ग्यारहवें स्कंध में मिलता है। मित्रों यह तो आप जानते ही हैं कि भागवतपुराण शुकदेव गोस्वामी जी के द्वारा राजा परीक्षित को सुनाई गयी थी। ग्यारहवें स्कंध में शुकदेव जी परीक्षित महाराज से कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने विचार किया कि यदुवंश अभी भी पृथ्वी पर है और पूर्णतया मुझ पर आश्रित है। यदुवंश कि लोग धन, जनबल, घोड़े आदि के माध्यम से बलशाली हैं और पृथ्वी पर अपनी मनमानी कर रहे हैं। यहाँ तक की देवता आदि में उन्हें पराजित नहीं कर सकते. इसलिए मुझे यदुवंश के लोगों में आपस में कलह उत्पन्न करनी होगी उसके पश्चात ही मैं अपने धाम वापस जाऊंगा। ऐसा विचार करके भगवान ने एक लीला रचाई आइये इसे विस्तार में जानते हैं।

भगवान कृष्ण द्वारका नगरी के राजा थे. एक बार ऋषि विश्वामित्र, नारद मुनि, और ऋषि दुर्वासा द्वारका नगरी पधारे. द्वारका में युवाओं का स्वभाव बहुत चंचल और उद्दंड था। एक बार कृष्णपुत्र साम्ब समेत कुछ यदुवंश कुमारों को शरारत सूझी. साम्ब ने स्त्री का रूप धारण किया और वे सभी कुछ ऋषियों के पास पहुंचे और साम्ब को गर्भवती महिला बताकर ऋषियों के साथ मज़ाक करने का दुष्साहस किया। ऋषियों ने भांप लिया कि उनके साथ मज़ाक हो रहा है। तब उन्होंने साम्ब को श्राप दिया कि वो एक ऐसे मूसल को जन्म देगा जिससे उसके कुल का नाश होगा।  वास्तव में ऋषि मुनियों को भगवत्प्रेरणा के कारण क्रोध आया अतः यह भगवान की ही लीला थी। इस प्रकार के महापुरुष भगवान की लीला में सहयोग करते हैं इसलिए मृत्युलोक में निवास करके यहाँ के लोगों के समान ही व्यवहार करते हैं। उनका वास्तविक व्यवहार ऐसा नहीं होता, वे सदैव ही भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं। ऋषियों द्वारा श्राप सुनकर सभी कुमार घबरा गए। उन सबने साम्ब को स्त्री का रूप देने के लिए जो कृत्रिम पेट बनाया था उसे फाड़कर देखा तो उसमे वास्तव में मूसल था। यह देख वे सभी पछताने लगे।

उन्होंने इस पूरी घटना के विषय में उग्रसेन को बताया। उग्रसेन मथुरा के राजा और कंस के पिता थे। उग्रसेन ने उस मूसल का चूर्ण बनाकर उस चूर्ण और बचे हुए लोहे के टुकड़ों को समुद्र में फेंकने का आदेश दिया। उन्होंने ऐसा ही किया. वो चूर्ण पानी के साथ बहकर किनारे पर आ गया और जो लोहे के छोटे छोटे टुकड़े बचे थे उसे एक मछली ने निगल लिया। कुछ दिन पश्चात यह चूर्ण एरक के रूप में उगा जो बिना गाँठ की घास होती है। एक बार समुद्र में कुछ मछुआरे मछलिया पकड़ने पहुंचे और उस मछली को भी पकड़ा जिसने लोहे के टुकड़े निगल लिए थे। उस मछली के पेट से निकले लोहे के टुकड़े को एक बहेलिए ने अपने बाण की नोक पर लगा लिया।

एक बार ब्रह्मा जी अपने पुत्रों और देवताओं के साथ द्वारका नगरी पधारे और भगवान से प्रार्थना की कि यदि अब वे चाहें तो अपने धाम पधार सकते हैं तब श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं निश्चय कर चुका हूँ कि यदुवंशियों का नाश होते ही मैं परमधाम के लिए प्रस्थान करूँगा। तब सभी ने भगवान को प्रणाम किया और अपने धाम की ओर चले गए। उन सबके जाने के पश्चात द्वारका में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं, उत्पात और अपशगुन होने लगे। 

यह देख भगवान ने बच्चों, स्त्रियों और वृद्धों को शंखधार क्षेत्र और अन्य सभी को प्रभास क्षेत्र में जाने का आदेश दिया जहाँ से सरस्वती नदी बहकर समुद्र में मिलती है. प्रभास क्षेत्र पहुंचकर सभी ने भगवान के आदेशानुसार पूजा, अर्चना एवं भक्ति पूरी श्रद्धा से किये परन्तु वे मैरेयक नामक मदिरा का पान करने लगे. इस मद का स्वाद तो मीठा होता है परन्तु यह बुद्धि भ्रष्ट करने वाला है. इसका सेवन करते ही सभी यदुवंशियों की बुद्धि भ्रष्ट होने लगी और सभी आपस में ही झगड़ने लगे. इस लड़ाई ने इतना भयंकर रूप ले लिया कि सभी यदुवंशी मृत्यु को प्राप्त हुए.

इस प्रकार भगवान् कृष्ण का उद्देश्य पूर्ण हुआ. इस घटना के पश्चात बलरामजी नदी के तट पर चिंतन में लीन हो गए और ध्यान में रहकर ही भौतिक शरीर को त्याग दिया. कुछ समय पश्चात ही भगवान कृष्ण एक पीपल के नीचे बैठे और सभी दिशाओं से अन्धकार को नष्ट कर प्रकाशमान कर रहे थे. उस समय भगवान के बैठने की अवस्था कुछ ऐसी थी कि वे अपनी दायीं जांघ पर बांया चरण रखे हुए थे. उनके चरण कमलों की आभा रक्त के समान प्रतीत हो रही थी. एक बहेलिये ने भगवान के चरणों को दूर से देखा जो उसे हिरन के मुख के समान नज़र आये. यह वही बहेलिया था जिसने मछली के पेट से निकले लोहे को अपने बाण में लगाया था. उसने हिरन समझकर भगवान की देह को बाण से भेद दिया.

इसके पश्चात भगवान अपने शरीर समेत ही भगवद्धाम के लिए प्रस्थान कर गए. इस प्रकार ऋषियों द्वारा दिए गए श्राप के कारण यदुवंश का नाश हुआ और गांधारी के द्वारा दिया गया श्राप भी पूरा हुआ क्यूंकि महाभारत के पश्चात भगवान कृष्ण के ३६ वर्ष इस धरती पर पूर्ण हो चुके थे. कई बार ऐसा कहा जाता है कि भगवान की देह का दाहसंस्कार किया गया परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हुआ. उनकी देह दिव्य थी न कि पंचतत्वों से निर्मित.

अनेक मान्यताओं कि अनुसार पांडवों द्वारा उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया. जब उनकी पूरी देह जल गयी परन्तु दिल जलकर नष्ट नहीं हुआ और अंत तक जलता रहा तब उनके दिल को जल में प्रवाहित किया गया. उनकी देह का यह हिस्सा राजा इन्द्रियम को प्राप्त हुआ. राजा इन्द्रियम भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, उन्होंने यह ह्रदय भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा में स्थापित कर दिया.

महाभारत की कहानी कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध पर आधारित है। महाभारत में द्रौपदी के साथ जितना अन्याय होता दिखता है, उतना अन्याय इस महाकथा में किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं हुआ। द्रौपदी संपूर्ण नारी थी।और शायद  द्रौपदी भारतीय पौराणिक इतिहास की प्रथम और अंतिम महिला थी जिसके पांच पति थे और जो पांच पुरुषों के साथ रमण करती थी? लेकिन पाठकों क्या कभी आपने सोचा है की पांच पुरुषों से विवाह करने के बाद उसने सभी पांडवों के साथ सुहागरात कैसे मनाई होगी या वह पांचों पांडव को कन्या रूप में कैसे मिली।
द्रौपदी की सुहागरात
द्रौपदी की सुहागरात

द्रोपदी महाभारत की वो पात्र है जिसके अपमान के कारण ही इतिहास का सबसे भयंकर रक्तरंजित युद्ध हुआ। महाभारत में द्रोपदी का चरित्र जितना अनोखा है उसके जन्म की कथा भी उतनी ही चमत्कारिक है। दौपदी राजा द्रुपद की पुत्री थी जिसका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था। इससे जुडी कथा भी बड़ी ही रोचक है। कथा के अनुसार राजा द्रुपद और कौरव-पांडव के गुरु द्रोणाचार्य एक समय में बहुत ही अच्छा मित्र हुआ करते थे। बचपन में द्रुपद ने द्रोणाचार्य को यह वचन दे रखा था की जब वह राजा बनेंगे तो अपना आधा राज्य अपने मित्र द्रोण को दे देंगे,परन्तु राजा बनने के बाद द्रुपद ने द्रोणाचार्य को आधा राज्य देने से मना कर दिया और अपने राजसभा से अपमानित कर निकाल दिया। द्रुपद के हाथों अपमानित होने के बाद द्रोण भटकते भटकते हस्तिनापुर पहुंचे जहाँ भीष्म पितामह ने द्रोणाचार्य को हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा देने का कार्य सौपा।

तत्पश्चात द्रोण कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देने लगे। यूँही  समय बीतता गया और जब कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूर्ण हो गयी तब गुरु द्रोणाचार्य ने उनसे गुरु दक्षिणा के रूप में पांचाल देश माँगा। गुरु के आदेश पाते ही पहले कौरवों  ने पांचाल देश पर आक्रमण किया लेकिन उन्हें द्रुपद के हाथों पराजित होना पड़ा। फिर पांडवों ने पांचाल देश पर आक्रमण कर राजा द्रुपद को बंदी बना अपने गुरु के समक्ष ले आये। तब गुरु द्रोणाचार्य ने जीते हुए पांचाल देश का आधा भाग राजा द्रुपद को दे दिया तथा शेष आधे राज्य का राजा अपने पुत्र अश्व्थामा को बनाया।

इधर द्रोणाचार्य से अपमानित होने के बाद राजा द्रुपद प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे और  एक ऐसा पुत्र प्राप्त करने की कामना करने लगे। जो उनके शत्रु द्रोण का वध कर सके। इसके लिए उन्होंने एक ऋषि के कहने पर पुत्र प्राप्ति यज्ञ शुरू कर दिया और इसी यज्ञ की अग्नि से पुत्र धृष्टधुम्न के साथ साथ एक पुत्री द्रौपदी भी प्रकट हुई। यही कारण था की द्रौपदी को याग्यसेनी के नाम से भी जाना जाता है।दिव्य द्रोपदी एक युवती के रूप में हवन कुंड से प्रकट हुई थी इसलिए कुछ समय पश्चात् राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री के लिए स्वंयवर का आयोजन किया।

अपनी पुत्री के स्वंयवर के लिए राजा द्रुपद ने सभी राज्यों के राजाओं को आमंत्रित किया। उधर जब द्रौपदी के स्वंयवर की घोषणा हुई तब माता कुंती सहित पांचों पांडव लाक्षागृह काण्ड के बाद ब्राह्मण के वेश में वन में रहते थे। जब इस बात की उन्हें सूचना मिली की द्रौपदी का स्वंयवर हो रहा है और वहां श्रीकृष्ण भी आएंगे तो पांचों पांडव उनकी दर्शन की अभिलाषा लिए पांचाल देश की ओर निकल पड़े और स्वंयवर के दिन पांचाल जा पहुंचे । उधर स्वंयवर शर्त के रूप में राजा द्रुपद ने एक यंत्र में बड़ी-सी मछली को रखा जो घूम रही थी। शर्त के अनुसार उस घूमती हुई मछली की आंख में निचे तैलपात्र में उसकी परछाई देखकर तीर मारना था।

स्वंयवर के दिन एक के बाद एक सभी राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने ऊपर घूमती हुई मछली की आंख पर उसके प्रतिबिम्ब को नीचे जल में देखकर निशाना साधने का प्रयास किया किंतु सफलता हाथ न लगी और वे सभी एक एक कर सभी एक एक कर rअपने स्थान पर लौट आए। इन असफल लोगों में जरासंध, शल्य, शिशुपाल तथा दुर्योधन, दुःशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे।

कौरवों के असफल होने पर ब्राह्मण के वेश में स्वयंवर सभा में उपस्थित अर्जुन ने तैलपात्र में मछली की परछाई को देखते हुए एक ही बाण से मछली की आँख भेद डाली। इसके तुरंत बाद द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी। उधर राजा द्रुपद को यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का स्वयंवर उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो पाया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह एक पराक्रमी राजकुमार के साथ हो लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ब्राह्मण वेश में यह पाण्डु पुत्र अर्जुन ही है।

स्वंयवर के बाद पांचो पांडव द्रोपदी के साथ माता कुंती के पास जाने के लिए वन की ओर निकल पड़े। कुछ समय बाद पांचों पांडव द्रोपदी सहित वन में स्थित अपने कुटिया के द्वार पर पहुंचे वहां पहुंचकर अर्जुन ने बाहर से ही माता कुंती को आवाज लगाई और कहा की माता देखो आज हमलोग भिक्षा में क्या लाये हैं।

चुकीं उस समय उनकी माता कुंती कुटिया के अंदर भोजन बना रही थी इसलिए उन्होंने बिना देखे ही यह कह दिया की भिक्षा में जो कुछ भी लाये हो उसे आपस में बराबर बाँट लो।

सभी भाई माता की हर बात को आदेश की तरह मानते थे इसलिए वे सभी उनकी बात सुनकर चुप हो गए।

बाद में जब कुंती ने बाहर आकर द्रौपदी को देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गई। फिर उसने युधिष्ठिर से बोला तुम ऐसा करो कि मेरा वचन भी रह जाए  और कुछ गलत भी ना हो। लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर भी कोई रास्ता न निकाल सके अंत में यह फैसला किया गया की पांचों भाई  द्रौपदी से शादी करेंगे।

इधर जब इस घटना का पता राजा द्रुपद को लगा तो वो भी परेशान हो गए और उन्होंने अपनी सभा में बैठे भगवान श्रीकृष्ण और महर्षिव्यास जी से कहा कि धर्म केअनुसार किसी स्त्री का पांच पति की कैसे हो सकता है? तब महर्षिव्यास ने राजा द्रुपद को बताया की द्रौपदी को उसके पूर्वजन्म में भगवान शिव ने ऐसा ही वरदान दिया था।

भगवान शिव के उसी वरदान के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है और भगवान शिव की बात अन्यथा कैसे हो सकती है। इस तरह महर्षिव्यास के समझाने पर राजा द्रुपद अपनी बेटी द्रौपदी का पांचो पांडवो के साथ विवाह करने को राजी हो गए|

इसके बाद सबसे पहले द्रौपदी का विवाह पांडवो में ज्येष्ठ युधिष्ठिर के साथ हुआ  और उस रात द्रौपदी ने युधिष्ठिर के साथ अपना पत्नी धर्म निभाया।

फिर अगले दिन द्रौपदी का विवाह भीम के साथ हुआ और उस रात द्रौपदी ने भीम के साथ अपना पत्नी धर्म निभाया।

इसी प्रकार अर्जुन नकुल और सहदेव के साथ द्रौपदी का विवाह हुआ और इन तीनों के साथ भी द्रौपदी ने अपना पत्नी धर्म निभाया।

यहाँ सोचने की बात यह है कि एक पति के साथ पत्नी धर्म निभाने के बाद द्रौपदी ने अपने दूसरे पतियों के साथ अपना पत्नी धर्म कैसे निभाया होगा।

तो आपको बता दें की इसके पीछे भी भगवान शिव का ही वरदान था क्योंकि जब भगवान शिव ने द्रौपदी को पांच पति प्राप्त होने का वरदान दिया था तब उन्होंने द्रौपदी को साथ में ये वरदान भी दिया थाकि वह प्रतिदिन कन्या भाव को प्राप्त हो जाया करेगी । इसलिए द्रौपदी अपने 5 पतियों को कन्या भाव में ही प्राप्त हुई थी।

परंतु संतान प्राप्ति हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने यह सुझाव दिया की प्रतिवर्ष द्रौपदी एक ही पांडव के साथ अपना समय व्यतीत करेगी और जिस समय द्रौपदी अपने कक्ष में किसी एक पांडव के साथ अपना समय व्यतीत कर रही होगी तब उनके कक्ष में कोई दूसरा पांडव प्रवेश नहीं करेगा।

रामायण को हिन्दू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ माना गया है। इसमें कई ऐसी कथाएं हैं जिन्हे आमतौर पर तो सब लोग जानते हैं। लेकिन कुछ ऐसी बातों का भी वर्णन इसमें मिलता है जिसे अधिकतर जनमानस नजान हैं। जैसे देवी सीता लंका में बिना अन्न-जल ग्रहण किये इतने समय  जिन्दा कैसे रही? या गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है उनसे प्रभु राम के क्या सम्बन्ध है ? इस लेख में हम आपको बताएँगे रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य के बारे में।
रामायण से जुड़े 21 रोचक तथ्य
01. रामायण संस्कृत का एक महाकाव्य है जो कवी बालमीकि द्वारा रचित है। इस महाकाव्य में 24000 छंद है जो 7 अध्याय या खंड में विभाजित है। पाठकों अगर हम रामायण के हर हजार छंद का पहला अक्षर लें तो जो 24 अक्षर हमे मिलते हैं वो मिलकर गायत्री मन्त्र बनते हैं। 

02. श्री राम की माँ कौशल्या,कौशल देश की राजकुमारी थी। इनके पिता का नाम सकौशल व माता का नाम अमृत प्रभा था। पूर्वजन्म में भगवान विष्णु ने कौशल्या को त्रेता युग में उनके गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया था। इसी कारण वो भगवान राम के रूप में इस धरती पर अवतरित हुए।

03.रामायण के कई संस्करण हैं। इन्ही में से एक आनंद रामायण के अनुसार रावण ने न केवल देवी सीता का अपहरण किया था। बल्कि कौशल्या का भी अपहरण किया था। ब्रह्मा जी ने रावण को पहले ही बता दिया था कि दशरथ और कौशल्या का पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। अपनी मृत्यु को टालने के लिए रावण ने कौशल्या का अपहरण कर उसे एक डिब्बे में बंद करके कौशल्या को एक समुद्र से घिरे द्वीप पर छोड़ दिया था।

04.  श्री राम की एक बहन भी थी जिसका नाम शांता था। जिसको बचपन में ही कौशल्या ने अपनी बहन वर्षनी और अंगदेश के राजा गोपद को गोद दे दिया था। इसलिए रामायण में शांता का वर्णन नहीं मिलता।

05.  माना जाता है की देवी सीता भगवान शिव के धनुष को बचपन से ही खेल-खेल में उठा लेती थी । और इसलिए  उनके स्वंयवर में इस धनुष जिसका नाम पिनाका था,उस पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त रखी गयी थी ।

06. एक बार रावण जब भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत गए। उन्हें मार्ग में नंदी मिले जिनको रावण ने वानर के मुँह वाला कहकर उसका उपहास उड़ाया। नंदी ने तब रावण को श्राप दिया की वानरों के कारण ही तुम्हारी मृत्यु होगी। आगे चलकर क्या हुआ ये तो सब जानते ही हैं।

07. अपने विजय अभियान के दौरान रावण जब स्वर्ग पहुंचा तो वहां उसे रम्भा नाम की एक अप्सरा मिली। रावण उस पर मोहित हो गया। रावण ने उसे छूने का प्रयास किया तो उसने कहा की मैं आपके भाई कुबेर पुत्र नलकुबेर के लिए आरक्षित हूँ। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधु के समान हूँ। पर रावण अपनी शक्ति में इतना चूर था की उसने उसकी एक ना मानी। जब नलकुबेर को इस बात का पता चला तो उसने रावण को श्राप दिया की आज के बाद यदि रावण ने किसी पराई स्त्री को उसके इच्छा के विरुद्ध छुआ तो उसके मस्तक के 100 टुकड़े हो जायेंगे।

08.  जिस दिन रावण सीता का हरण करके अशोक वाटिका में लाया था। उसी दिन ब्रह्मा ने एक विशेष खीर इंद्र के हाथों देवी सीता तक पहुंचाई थी। इंद्र ने देवी सीता के पहरे पर लगे राक्षसों को अपने प्रभाव से सुला दिया। जिसके बाद इंद्र ने देवी को वो दिव्य खीर दी जिसे ग्रहण कर देवी सीता की भूख प्यास शांत हो गयी। और वो अशोक वाटिका में बिना कुछ भी खाये पिए रह सकी।

09. रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। भगवान शिव के भजन कीर्तन के लिए रावण ने एक बार अपनी बाजू काटकर उससे एक वाद्ययंत्र भी बनाया था। जिसे रावण हट्टा का नाम मिला।

10. शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने रावण के पुत्र मेघनाद को ही नहीं उसके दूसरे पुत्रों जैसे प्रहस्त और अतिकाय को भी मारा था।

11. जिस समय श्री राम वनवास को गए थे उस समय उनकी आयु 27 वर्ष थी। राजा दशरथ नहीं चाहते थे की राम वन जाये। इसीलिए राजा दशरथ ने उन्हें सुझाव दिया की वे उन्हें बंदी बना लें और राजगद्दी पर बैठ जाये लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ऐसा कभी नहीं करते।

12. वनवास के दौरान श्री राम ने एक कबंध नामक श्रापित राक्षस का वध किया था। उसी ने राम को सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया था।

13. रावण जब विश्व विजय पर निकला तो उसका युद्ध अयोध्या के राजा अनरण्य के साथ हुआ। जिसमे रावण विजयी रहा। राजा अनरण्य वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने मरते हुए श्राप दिया की तेरी मृत्यु मेरे कुल के एक युवक द्वारा होगी।

14. बाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से जा रहा था। उसने एक सुन्दर युवती को तप करते देखा। वह युवती वेदवती थी जो भगवान विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण उस पर मोहित हो गया और उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने का प्रयास करने लगा। तब उस युवती ने रावण को श्राप दिया की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी और उसने अपने प्राण त्याग दिए।

15. श्री राम के भाई राजकुमार भरत को अपने पिता की मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था। उसने स्वप्न में देखा की उसके पिता काले कपड़ों में लाल रंग की फूलों की माला पहने हुए  एक रथ में बैठकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं। और पिले रंग की स्त्रियां उनपर फूलों की वर्षा कर रही है।

16.पाताल का राजा अहिरावण और उसका भाई महिरावण बेहद ही शक्तिशाली असुर थे। अहिरावण ने राम और लक्षमण को बंदी बना लिया था। प्रभु राम और लक्षमण को बचाने और अहिरावण-महिरावण के वध के लिए हनुमान को पंचरूपी रूप लेना पड़ा था। 

17.   रावण महाज्ञानी विद्वान था। भगवान राम ने भी उन्हें महाब्राह्मण कहा था। इसलिए जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब प्रभु राम ने लक्षमण से रावण के पास जाकर उससे ज्ञान अर्जित करने को कहा था।

18. रावण जब अपने विश्व विजय अभियान पर था तो वह यमपुरी पहुंचा। जहाँ उसका युद्ध यमराज से हुआ। जब यमराज ने उसपर कालदंड का प्रहार करना चाहा तो ब्रह्मा जी ने उन्हें रोक दिया। क्यूंकि वरदान के कारण रावण का वध किसी देवता द्वारा संभव नहीं था।

19. माना जाता है की गिलहरी के शरीर पर जो धारियां है वे भगवान राम के आशीर्वाद के कारण है। जिस समय लंका पर आक्रमण करने के लिए राम सेतु का निर्माण हो रहा था उस समय एक गिलहरी इस काम में मदद कर रही थी। उसके इस समर्पण भाव को देखकर श्री राम ने प्रेम पूर्वक अपनी अंगुलियां उसकी पीठ पर फेरी थी। ऐसी मान्यता है की  तब से उसके शरीर पर धारियां पड़ गई ।

20. राम-रावण के युद्ध के दौरान भगवान राम के लिए इंद्र ने अपना रथ भेजा था जिस पर बैठकर राम ने रावण का वध और युद्ध में विजय प्राप्त की थी।

21. पाठको आपको जानकर हैरानी होगी की श्री राम का अवतार एक पूर्ण अवतार नहीं माना जाता। श्री राम 14 कलाओं में पारंगत थे जबकि श्री कृष्ण 16 कलाओं में पारंगत थे। ऐसा इसलिए था की रावण को वरदान प्राप्त थे की उसे कोई देवता नहीं मार सकता। उसका वध कोई मनुष्य ही कर सकता है।

ऐसा माना जाता है की आज तक हनुमान से बड़ा भक्त कोई नहीं हुआ। हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु राम के हमेशा समीप ही रहा करते थे। और प्रभु राम भी अपने भक्त हनुमान जी को भाई के समान ही प्रेम करते थे। इसी स्वामिभक्ति के कारण मृत्यु के देवता कालदेव अयोध्या आने से डरते थे। तो पाठकों आइये जानते हैं की वो कौन से कारण थे जिसकी वजह से हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?
हनुमान जी के रहते कालदेव अयोध्या क्यों नहीं आ पाते थे ?

हनुमान जी भक्ति

ये तो हम सभी जानते हैं की इस दुनिया में जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन मरना ही है। यही नियम प्रभु श्री राम पर भी लागू होते है। क्योंकि त्रेता युग में उन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया था। जब प्रभु राम के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य पूरा हो गया। तब उन्होंने पृथ्वीलोक छोड़ने का निश्चय किया। परन्तु कालदेव तब तक श्रीराम को मृत्युलोक से नहीं ले जा सकते थे जब तक हनुमान जी उनके साथ हो।  श्री राम जानते थे कि अगर उनके जाने की बात हनुमान जी को पता चलेगी तो वह पूरी पृथ्वी उत्तल पुथल कर देंगे।  क्योंकि उनके जैसा राम भक्त इस दुनिया में कोई और नहीं है।

अंगूठी की खोज 

जिस दिन कालदेव को अयोध्या आना था उस दिन श्री राम ने हनुमान जी को मुख्य द्वार से दूर रखने का एक तरीका निकाला। उन्होंने अपनी अंगूठी महल के फर्श में आई एक दरार में डाल दी। और हनुमान जी को उसे बाहर निकालने का आदेश दिया। उस अंगूठी को निकालने के लिए हनुमानजी ने स्वयं ही उस दरार जितना सूक्ष्म आकार ले लिया और अंगूठी खोजने लग गए। जब हनुमानजी उस दरार के अंदर घुसे तो उन्हें समझ में आया कि यह कोई दरार नहीं बल्कि सुरंग है। जो की नागलोक की ओर जाती है। वहां जाकर वे नागों के राजा वासुकी से मिले। नागों के राजा वासुकि ने हनुमान जी से नागलोक आने का कारण पुछा। हनुमान जी ने बताया की मेरे प्रभु राम की अंगूठी पृथ्वी में आई दरार से होते हुए यहाँ आ गई है उसे ही में खोजने आया हूँ।

तब वासुकी हनुमान जी को नागलोक के मध्य में ले गए और अंगूठियों का एक बड़ा सा ढेर दिखाते हुए कहा कि यहां आपको प्रभु राम की अंगूठी मिल जाएगी। पर उस अंगूठी के ढेर को देख हनुमान जी कुछ परेशान हो गए। और सोचने लगे कि इतने बड़े ढेर में से श्री राम की अंगूठी खोजना तो रुई  के ढेर से सुई निकालने के समान हैं। उसके बाद जैसे ही उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो वह श्री राम की थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की उन्हें अपने प्रभु की अंगूठी पहले ही प्रयास में मिल गयी। उन्हें और आश्चर्य  तब हुआ जब उन्होंने दूसरी अंगूठी उठाई क्योंकि उस पर भी श्री राम ही लिखा हुआ था। इस तरह उन्होंने देखा की ढेर सारी अंगूठियों पर श्री राम ही लिखा है। यह देख हनुमान जी  को एक पल के लिए यह समझ ना आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

कालदेव का अयोध्या आगमन

हनुमान जी उदास देख वासुकी मुस्कुराए और हनुमान जी से बोले  पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक हैं जहां जो भी आता है उसे एक न एक  दिन वापस लौटना ही होता है। उसके वापस जाने का साधन कुछ भी हो सकता है। और ठीक इसी तरह श्री राम भी पृथ्वी लोक को छोड़ एक दिन विष्णु लोग वापस अवश्य जाएंगे।वासुकि कि यह बात सुनकर हनुमान जी को सारी बातें समझ आ गयी। उनका अंगूठी ढूंढने के लिए आना और फिर नागलोक में पहुंचना, यह सब श्री राम की ही लीला थी। वासुकी की बातें सुनकर उन्हें यह समझ आ गया कि उनका नागलोक में आना केवल श्री राम द्वारा उन्हें उनके कर्तव्य से भटकाने  के उदेश्य था  ताकि कालदेव अयोध्या में प्रवेश कर सके और श्रीराम को उनके जीवनकाल के समाप्त होने की सूचना दे सकें। उसके बाद उन्होंने सोचा की अब जब मैं अयोध्या वापस लौटूंगा तो मेरे प्रभु राम वहां नहीं होंगे। और ज्ब श्री राम नहीं होंगे तो मैं अयोध्या में क्या करूँगा। इसके बाद हनुमान जी अयोध्या वापस नहीं गए। 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रावण में तमाम बुराईयां थीं. पर ये भी जग जानता है कि वो प्रकांड पंडित था.
रावण ने मरते हुए कही थीं ये बातें, आज भी दिला सकती हैं सफलता
रावण ने मरते हुए कही थीं ये बातें, आज भी दिला सकती हैं सफलता

जब भगवान राम ने उसका वध किया तो मरने से पहले उसने लक्ष्‍मण को कुछ बातें सिखाई थीं. ये ऐसी बाते हैं, जो आपके-हमारे लिए आज के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक हैं जितनी कि उस समय के लिए थीं-

1. अपने सारथी, दरबान, खानसामे और भाई से दुश्मनी मोल मत लीजिए. वे कभी भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

2. खुद को हमेशा विजेता मानने की गलती मत कीजिए, भले ही हर बार तुम्हारी जीत हो.

3. हमेशा उस मंत्री या साथी पर भरोसा कीजिए जो तुम्हारी आलोचना करती हो.

4. अपने दुश्मन को कभी कमजोर या छोटा म त समझिए, जैसा कि हनुमान के मामले में भूल हूई.

5. यह गुमान कभी मत पालिए कि आप किस्मत को हरा सकते हैं. भाग्य में जो लिखा होगा उसे तो भोगना ही पड़ेगा.

6. ईश्वर से प्रेम कीजिए या नफरत, लेकिन जो भी कीजिए , पूरी मजबूती और समर्पण के साथ.

7. जो राजा जीतना चाहता है, उसे लालच से दूर रहना सीखना होगा, वर्ना जीत मुमकिन नहीं.

8. राजा को बिना टाल-मटोल किए दूसरों की भलाई करने के लिए मिलने वाले छोटे से छोटे मौके को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.

हनुमान जी : संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमरे हनुमत वीरा दोस्तों पवनपुत्र बजरंगबली हनुमान जी माता अंजनी और वानर नरेश केशरी की संतान को तो आप सभी जानते ही है | हनुमान जी को संकट यानी की कष्टों को दूर करने बाला माना जाता है कहा जाता है जो हनुमान जी की आराधना और स्मरण करता है उसके सारे संकट दूर हो जाते है | हनुमान जी से जुड़े कई ऐसे किस्से रामायण में लिखे हुए है जिनसे ये साबित होता है की हनुमान जी बहुत ही शक्तिशाली और पराक्रमी थे | मगर अब यह बात सामने आती है की हनुमान जी के पास इतनी शक्ति कंहा से आई ? तो आइये आज हम आपको बताते है की हनुमान जी इतने वीर और पराक्रमी और शक्तियों के स्वामी कैसे बने |
जानिये किस के वरदान से हनुमान बने परम शक्तिशाली और महाबली
जानिये किस के वरदान से हनुमान बने परम शक्तिशाली और महाबली

आप सबने हनुमान जी के बचपन से जुड़ा यह किस्सा ( जो वाल्मीकि जी द्वारा वर्णित रामायण में भी मिलता है ) तो सुना ही होगा की एक बार हनुमान जी सूर्य को फल समझकर उसे खाने के लिए चले जाते है | इस सब को देखकर सभी देवता और पृथ्वी बासी घबरा जाते है की अगर हनुमान जी ने सूर्य को खा लिया तो क्या होगा | इसी वजह से हनुमान जी को रोकने के लिए देवताओं के राजा इन्द्रदेव ने हनुमान जी पर अपने वज्र से बार कर दिया जिसके प्रहार से हनुमान निश्चेत होकर पृथ्वी पर गिर जाते है | 

चूँकि हनुमान जी वायु पुत्र थे जिसकी वजह से वायु देव क्रोधित हो जाते है और समस्त संसार में बहने बाली वायु को बंद कर देते है जिसकी वजह से समस्त संसार में हाहाकार मच जाता है जानबर प्राणी सभी एक एक करके मरने लगते है | परेशान होकर समस्त देव संसार के निर्माणकर्ता ब्रह्मा जी पास जाते है और पूरी बात बताते है तब ब्रह्मा जी आके हनुमान जी को स्पर्श करके उन्हें पुनः ठीक कर देते है |

किस देवता ने हनुमान जी को कौन सा वरदान दिया

अब जब समस्त देवताओं को पता चल जाता है तो देवतागण हनुमान जी को वरदान देना प्रारम्भ कर देते है जिन वरदानो को प्राप्त करके उनको महाबलशाली, पराक्रमी और महान शक्तियों के स्वामी बन जाते है तो आइये जानते है किस देवता ने हनुमान जी को कौन कौन से वरदान दिए –

सूर्य देव से प्राप्त वरदान

सूर्य देव ने हनुमान जी को आशीर्वाद के साथ वरदान में अपने तेज का सौवा हिस्सा देते हुए कहा की जब हनुमान के अंदर शास्त्र अध्ययन को ग्रहण करने की शक्ति आ जायेगी तब स्वयम सूर्यदेव हनुमान को शास्त्रों का अध्ययन करवाएगें जिससे वो पूरे संसार के सबसे श्रेष्ठ वक्ता और शास्त्र ग्यानी बनेगे |

यक्ष राज कुबेर से मिला वरदान

यक्ष राज ने हनुमान जी को वरदान देते हुए कहा की किसी भी युद्ध में हनुमान के ऊपर किसी भी अस्त्र से प्रहार किया जाए उसका हनुमान जी के ऊपर कोई भी असर नहीं पड़ेगा यहाँ तक की किसी समय मेरा और हनुमान का भी युद्ध हो गया तो मेरा गदा भी हनुमान का बुरा नहीं कर पायेगा |

यमराज से मिला वरदान

हनुमान जी को वरदान देते समय यमराज ने कहा की यह बालक हमेशा ही मेरे दण्ड ( जिससे बांधकर यमराज आत्मा को यमलोक लेकर जाते है ) की पहुच से दूर रहेगा यानी की अमर रहेगा और कभी किसी भी बिमारी का प्रभाव नहीं पड़ेगा | उनकी आराधना और स्मरण मात्र से दुसरो के कष्ट और संकटो का नाश हो जायेगा |

भगवान् शंकर से मिला वरदान

भगवान् शंकर ने उनको वरदान देते हुए कहा की इस बालक पर मेरे अश्त्रो का कोई असर नहीं होगा | इसी के साथ कोई भी मुझसे वरदान में प्राप्त किये हुए अश्त्रो से हनुमान को नुकसान पहुंचा पायेगा अर्थात कोई भी अश्त्र उनको नहीं मार सकता है |

देवशिल्पी विश्वकर्मा से मिला वरदान

हनुमान जी को वरदान देते हुए देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने कहा की मेरे बनाये हुए किसी भी शस्त्र से आपका कोई नुकसान नहीं होगा अर्थात हनुमान को कोई अशस्त्र नुकसान नहीं पहुंचा सकता है | वह निरोगी और चिरंजीवी रहेंगे उनका वध कभी नहीं किया जा सकता है |

देवताओं के राजा इंद्र से मिला वरदान

देवताओं के राजा भगवान् इंद्र ने उनको वरदान देते समय कहा की आज के बाद इस बालक पर मेरे वज्र का का कोई असर नहीं होगा अर्थात मेरे वज्र से भी आपका वध नहीं किया जा सकता है |

जलदेव वरुणदेव से मिला वरदान

जल के देवता वरुण देव ने उनको वरदान देते समय कहा की उनकी आयु जब दस लाख वर्ष की हो जाएगी तो भी उनकी मेरे पाश और जल के बंधन से मुक्त रहेंगे इससे भी उनकी की मृत्यु नहीं होगी |

ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदान

संसार के निर्माणकर्ता परमपिता ब्रह्मदेव ने उनको दीर्घायु का आशीर्वाद के साथ वरदान देते समय कहा की किसी भी युद्ध में इस बालक को कोई भी हरा नहीं पायेगा | किसी भी प्रकार के ब्रह्मदंड का उन पर कोई भी असर नहीं होगा और ना ही उनसे हनुमान का वध किया जा सकेगा | वह अपनी इच्छा से किसी का भी रूप धारण कर पायेगा और पल भर में जंहा भी जाना चाहेगा वंहा जा सकेगा | इस सब के साथ यह वरदान भी दिया की उनकी गति उनकी इच्छा के अनुसार तेज़ या धीमी हो सकती और वह अपने कद को कितना भी बड़ा और कितना भी छोटा कर पायेंगे |

माता सीता से मिला वरदान

रावण जब सीता माता को हरण करके लंका ले गाया तब वह सीता माता की खोज में लंका गए और वंहा माता को खोजते खोजते अशोक वाटिका में पहुंचे तब सीता माता ने उनको अमर होने का वरदान दिया था |

भगवान् राम से मिला वरदान

भगवान् राम ने उनको उनकी इच्छानुसार सबसे बड़ा राम भक्त कहलाने का वरदान दिया था | रामायण में इस बात का उल्लेख भी मिलता है की राम भगवान् ने भी उनको अमर होने का वरदान दिया था |

प्रभु श्री राम। इन्हे कौन नहीं जानता। हिन्दू धर्म के सबसे बड़े राजा जिन्होंने करीब 10,000 से  तक शासन किया। लेकिन बहुत से लोग ये नहीं जानते जी उनकी मृत्यु कैसे हुई ?

सबसे पहले में आपको बताना चाहता हु की प्रभु श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे। भगवान विष्णु के अवतारों की मृत्यु नहीं होती वे अपने अवतार वाले शरीर को त्याग के अपने लोक में वापस चले जाते है। 

इस भौतिक जगत में जो आता है वो पहले ही अपनी मृत्यु का समय निश्चित करवा के आता है। जो यहाँ सांसारिक सुख भोगने के लिए जन्मा है वह वापस अवश्य जायेगा। परन्तु मृत्यु की बात भगवान पर लागू नहीं होती। भगवान अदृश्य या अंतर्लीन होते हैं,उनकी मृत्यु नहीं होती। तो आइये जानते हैं की प्रभु श्री राम कैसे इस भौतिक जगत से अदृश्य हुए थे ?

प्रभु राम की कथा

भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाने वाले राम धर्म का सन्देश देने के लिए अवतरित हुए थे। महर्षि बाल्मीकि ने प्रभु श्री राम से सम्बंधित अनेक कथाएं लिखी है। जिनके द्वारा कलयुग में भगवान को जानने का अवसर मिलता है। प्रभु श्री राम ने पृथ्वी पर दस हजार वर्षों तक शासन किया। अपने पूरे जीवन कल में प्रभु श्री राम अनगिनत महान कार्य किये। जिनके द्वारा उन्होंने लोगों को एक आदर्श जीवन जीने का सन्देश दिया। प्रभु श्री राम के राज्य में प्रजा अत्यधिक प्रसन्न एवं संतुष्ट थी। वह माता-पिता दशरथ और कौशल्या के आदर्श पुत्र तथा धर्मपत्नी सीता के लिए आदर्श पति थे। तो आखिर क्या कारण था की भगवान को सब कुछ त्यागकर लोप होना पड़ा।

कालदेव का आगमन

पदम् पुराण में उल्लेखनीय एक कथा के अनुसार एक दिन भगवान राम के दरबार में एक वृद्ध संत का आगमन हुआ। जो भगवान से कुछ व्यक्तिगत रूप से अकेले में बात करना चाहते थे। राम ने उस संत का निवेदन स्वीकार किया तथा एक कक्ष में चर्चा करने के लिए गए। उस कक्ष के द्वार पर अपने सहोदर लक्षमण को खड़ा किया। और कहा की चर्चा में व्यघ्न डालने वाले को मृत्यु दंड प्राप्त होगा। लक्षमण ने बड़े भाई की आज्ञा का पालन किया। उल्लेखनीय है की वह वृद्ध संत कालदेव थे। जिन्हे विष्णु लोक यह बताने के लिए भेजा गया था की धरतीलोक पर उनकी समय अवधि समाप्त हो चूकि है। और उन्हें अब वैकुण्ठ धाम वापस लौटना होगा।

ऋषि दुर्वाशा का क्रोध

जब चर्चा चल रही थी उसी समय ऋषि दुर्वाशा का आगमन हुआ। उन्होंने लक्षमण से अंदर जाने को कहा,परन्तु भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए लक्षमण ने उन्हें प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। यह सुन ऋषि दुर्वाशा क्रोधित हो गए और लक्षमण को चेतावनी देते हुए कहा की यदि उन्हें अंदर नहीं जाने दिया तो वह राम को श्राप दे देंगे। यह सुन लक्षमण चिंतित हो गए की भाई की आज्ञा का पालन करें या उन्हें श्राप बचाये।

लक्षमण की मृत्यु  

संकट  में पड़े लक्षमण ने सोचा यदि वह स्वंय अंदर चले गए तो मृत्युदंड भुगतना पड़ेगा। और राम श्राप से बच जायेंगे,उन्होंने ऐसा ही किया। पर अपने भाई को चर्चा में बाधा डालते देख भगवान राम धर्म संकट में पड़ गए। फिर राम ने लक्षमण को राज्य तथा देश छोड़कर जाने को कहा जो उस समय मृत्युदंड के समान ही माना जाता था। लेकिन लक्षमण के लिए अपने भाई से दूर रहना संभव नहीं था। तो उन्होंने स्वंय ही ओस संसार को छोड़ने का निर्णय ले लिया। वे सरयू नदी में समां गए और नदी के अंदर अनंत शेष का अवतार लिया। और विष्णु लोक की ओर प्रस्थान कर गए।

भगवान श्री राम की अंगूठी लेने गए हनुमान

भगवान श्री राम यह भली-भांति जानते थे कि, पृथ्वी पर जिस किसी की निर्मिती हुई है उसका अंत निश्चित है, यह विधि का विधान है। इसीलिए एक दिन जब वह शरयू नदी के किनारे विहार कर रहे थे तब जानबूझकर अपनी अंगूठी को नीचे गिरा दिया और हनुमान को उस अंगूठी को खोजने के लिए भेज दिया। अगर भगवान राम जानबूझकर हनुमान के साथ यह खेल खेलते तो, हनुमान कभी भी भगवान श्रीराम को मरने नहीं देते।

वहीं जब हनुमान अंगूठी खोजने के लिए गए तो बहुत सीधे पाताल पहुंच गए वहां उपस्थित नागराज वासुकी ने हनुमान से आने का कारण पूछा तो हनुमान ने बताया कि, मैं प्रभु श्री राम की अंगूठी खोजने के लिए आया हूं। तब वासुकी ने अपने सामने एक अंगूठी के ढेर पर उंगली का इशारा किया। यह आश्चर्य की बात यह है कि, हनुमान जिस किसी अंगूठी को उठाते वह राम की ही होती यानी वहां उपस्थित सभी अंगूठियां एक जैसी थी।

आखिर कैसे हुई भगवान श्री राम की मृत्यु ? How Lord Rama left the World
आखिर कैसे हुई भगवान श्री राम की मृत्यु ? How Lord Rama left the World











श्री राम का देहत्याग

भातृ प्रेम में डूबे भगवान राम को लक्षमण के बिना एक क्षण भी व्यतीत करना अच्छा ना लगा। तब श्री राम ने शासन छोड़कर इस लोक से चले जाने का निर्णय लिया। और सरयू नदी की ओर चले गए। श्री राम सरयू नदी के तल तक जाकर अदृश्य हो गए और कुछ देर बाद भगवान विष्णु प्रकट हुए। इस प्रकार भगवान राम लोप हो गए।

Ram Navmi 2020: महाबली हनुमान मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के अनन्य भक्त थे। अपने प्रभु के लिए हनुमान अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे। भगवान श्रीराम भी अपने भक्त का उतना ही ख्याल रखते थे। माता सीता का पता लगाने से लेकर लंका विजय तक में बजरंगबली का अहम योगदान रहा है। इसलिए दोनों देवताओं की पूजा भी एक दूसरे के बगैर अधूरी मानी जाती है। महाबली हनुमान को चिरंजीवी माना जाता है।
Ram Navmi 2020: बगैर शस्त्र उठाए ऐसे किया था हनुमानजी ने श्रीराम से युद्ध
Ram Navmi 2020: बगैर शस्त्र उठाए ऐसे किया था हनुमानजी ने श्रीराम से युद्ध

राजा ययाति ने दिया था बेटे को श्राप

हनुमानजी श्रीराम के परम भक्त थे, लेकिन यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीराम और भक्त हनुमान के बीच युद्ध भी हुआ था। इस युद्ध की वजह उस वक्त के सम्राट ययाति थे। हरिवंश पुराण के अनुसार ययाति अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से नाराज हो गए थे और उसको श्राप दे दिया था कि उसको और उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य भी नहीं मिलेगा। राजगद्दी के लिए ययाति की पहली पसंद उनके छोटे बेटे पुरु थे, लेकिन राजसभा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के होते हुए छोटे बेटे के राजतिलक का विरोध किया।

श्रीराम को मिला था ययाति को मारने का आदेश

उधर महर्षि विश्वामित्र के आदेशानुसार भगवान श्री राम को राजा ययाति को मारना था। इस संकट की घड़ी में राजा ययाति चतुराई से काम लेते हुए हनुमान जी की शरण में चले गए। बजरंगबली ने माता अंजनी के आज्ञा से राजा ययाति को उनकी रक्षा करने का वचन दे दिया। हनुमानजी के सामने इससे बड़ी समस्या खड़ी हो गई, लेकिन वह महाज्ञानी और बुद्धिमान थे। केसरीनंदन ने यह निश्चय किया कि वह अपने स्वामी श्रीराम पर शस्त्र नहीं उठाएंगे। हनुमानजी ने रक्षा के लिए राम नाम का जाप शुरू कर दिया। इससे भगवान श्रीराम ने जितने भी बाण चलाए सभी बेअसर हो गए।

महर्षि विश्वामित्र ने रुकवाया श्रीराम-हनुमान युद्ध

महर्षि विश्वामित्र महाबली हनुमान की रामभक्ति और उनके ययाति की रक्षा के दिए गए वचन को देखर आश्चर्य में पड़ गए। सेवक और स्वामी के बीच चल रहे युद्ध और आदरभाव को देखकर महर्षि ने कोई रास्ता निकालने का मन बनाया और महाबली हनुमान और श्रीराम को इस धर्मसंकट से मुक्ति दिलाई। महर्षि विश्वामित्र ने राजा ययाति को जीवन दान देकर श्रीराम को युद्ध रोकने का आदेश दिया। इस तरह स्वामी श्रीराम और सेवक हनुमान दोनों के वचनों की रक्षा हो गई।

🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता, उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता!

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हुँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं"।

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा। ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।

🙏🌹🙏 परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता। 🙏🌷🙏
🌷 *GuruSatsang*🌷

🙏गुरुसत्संग स्वामी जी🙏
एक संत रोज अपने शिष्यों को सतसंग करते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ बताते हैं, वह समझ में नहीं आता, मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। गुरु ने कहा- कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ।
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
शिष्य चकित हुआ, आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए उसने टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर गया। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं, कोई फायदा नहीं। गुरु जी बोले- फायदा है। टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सत्संग बार बार सुनने से ही गुरु कृपा शुरू हो जाती है । भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन तुम सत्संग का लाभ अपने जीवन मे जरुर महसूस करोगे और हमेशा गुरु की रहमत तुम पर बनी रहेगी 
🙏GuruSatsang🙏

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
बहुत पुरानी बात है कि किसी गाँव में एक साधु रहते थे। दुनिया की मोह माया से दूर होकर जंगल में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुबह शाम ईश्वर के गुण गाना और लोगों को अच्छे कर्मों का महत्त्व बताना यही उनका काम था।

एक दिन उनके मन में आया कि जीवन में एकबार माता वैष्णोदेवी के दर्शन जरूर करने चाहिये। बस यही सोचकर साधु महाराज ने अगले दिन ही वैष्णो देवी जाने का विचार बना लिया।

एक पोटली में कुछ खाने का सामान और कपडे बांधे और चल दिए माँ वैष्णोदेवी के दर्शन करने।

ऊँचे पर्वत पर विराजमान माता वैष्णोदेवी के दर्शन के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।

वो साधु भी धीरे धीरे सर पे पोटली रखकर चढ़ाई चढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी, उस लड़की ने अपनी पीठ पर एक लड़के को बैठाया हुआ था। वो लड़का विकलांग था और वो लड़की उसे कमर पर बैठाकर चढ़ाई चढ़ रही थी।

साधु को ये सब देखकर उस लड़की पर बड़ी दया आयी और वो बोले – बेटी थोड़ी देर रूककर बैठ जा तू थक गयी होगी तूने इतना बोझ उठा रखा है..

वो लड़की बोली – बाबा जी बोझ तो आपने अपने सर पर उठा रखा है ये तो मेरा भाई है……

चलते चलते साधु के पाँव ठिठक गए…..

कितनी बड़ी बात कही थी उस लड़की ने,,,,

कितना गूढ़ मतलब था उस लड़की की बात का – बोझ तो आपने उठा रखा है ये तो मेरा भाई है….

कितनी जिम्मेदारी भरी थी उस मासूम सी लड़की में...

*उस दिन उन साधु को एक बात समझ में आ गयी कि अगर हर इंसान अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे तो शायद दुनिया में दुःख नाम की कोई चीज़ ही ना बचे…..*

*अपनी जिम्मेदारी से बचिए मत , जिम्मेदार बनिये , पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाइये।*

*आप जो भी हैं, चाहे डॉक्टर हैं, छात्र हैं, शिक्षक हैं…

अपने हर काम को जिम्मेदारी से कीजिये। अगर बोझ समझ कर करेंगे तो आप उस काम में कभी सफल नहीं हो पायेंगे। इसीलिए सफल होने के लिए आपका एक जिम्मेदार इंसान होना बेहद जरुरी है।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
*एक बार स्वामी विवेकानंद जी किसी स्थान पर प्रवचन दे रहे थे । श्रोताओ के बीच एक मंजा हुआ चित्रकार भी बैठा था । उसे व्याख्यान देते स्वामी जी अत्यंत ओजस्वी लगे । इतने कि वह अपनी डायरी के एक पृष्ठ पर उनका रेखाचित्र बनाने लगा।*

*प्रवचन समाप्त होते ही उसने वह चित्र स्वामी विवेकानंद जी को दिखाया । चित्र देखते ही, स्वामी जी हतप्रभ रह गए । पूछ बैठे - यह मंच पर ठीक मेरे सिर के पीछे तुमने जो चेहरा बनाया है , जानते हो यह किसका है ? चित्रकार बोला - नहीं तो .... पर पूरे व्याख्यान के दौरान मुझे यह चेहरा ठीक आपके पीछे झिलमिलाता दिखाई देता रहा।*

*यह सुनते ही विवेकानंद जी भावुक हो उठे । रुंधे कंठ से बोले - " धन्य है तुम्हारी आँखे ! तुमने आज साक्षात मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस जी के दर्शन किए ! यह चेहरा मेरे गुरुदेव का ही है, जो हमेशा दिव्य रूप में, हर प्रवचन में, मेरे अंग संग रहते है ।*

*मैं नहीं बोलता, ये ही बोलते है । मेरी क्या हस्ती, जो कुछ कह-सुना पाऊं ! वैसे भी देखो न, माइक आगे होता है और मुख पीछे। ठीक यही अलौकिक दृश्य इस चित्र में है। मैं आगे हूँ और वास्तविक वक्ता - मेरे गुरुदेव पीछे !"*

*"गुरु शिष्यों में युगों युगों से यही रहस्यमयी लीला होती आ रही है ।"*

*"अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखे क्योंकि वह सदैव हमारे साथ हैं.!!"*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।

राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?"

वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?"

ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"

ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः

"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"

ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?"

तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?"

"आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?"

"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥
'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"

"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" 
"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?"
ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"

"किस प्रकार?"

"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?"

आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"

कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।
🌷 *GuruSatsang*🌷
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