Ram Navmi 2020: बगैर शस्त्र उठाए ऐसे किया था हनुमानजी ने श्रीराम से युद्ध

Ram Navmi 2020: महाबली हनुमान मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के अनन्य भक्त थे। अपने प्रभु के लिए हनुमान अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे। भगवान श्रीराम भी अपने भक्त का उतना ही ख्याल रखते थे। माता सीता का पता लगाने से लेकर लंका विजय तक में बजरंगबली का अहम योगदान रहा है। इसलिए दोनों देवताओं की पूजा भी एक दूसरे के बगैर अधूरी मानी जाती है। महाबली हनुमान को चिरंजीवी माना जाता है।
Ram Navmi 2020: बगैर शस्त्र उठाए ऐसे किया था हनुमानजी ने श्रीराम से युद्ध
Ram Navmi 2020: बगैर शस्त्र उठाए ऐसे किया था हनुमानजी ने श्रीराम से युद्ध

राजा ययाति ने दिया था बेटे को श्राप

हनुमानजी श्रीराम के परम भक्त थे, लेकिन यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीराम और भक्त हनुमान के बीच युद्ध भी हुआ था। इस युद्ध की वजह उस वक्त के सम्राट ययाति थे। हरिवंश पुराण के अनुसार ययाति अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से नाराज हो गए थे और उसको श्राप दे दिया था कि उसको और उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य भी नहीं मिलेगा। राजगद्दी के लिए ययाति की पहली पसंद उनके छोटे बेटे पुरु थे, लेकिन राजसभा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के होते हुए छोटे बेटे के राजतिलक का विरोध किया।

श्रीराम को मिला था ययाति को मारने का आदेश

उधर महर्षि विश्वामित्र के आदेशानुसार भगवान श्री राम को राजा ययाति को मारना था। इस संकट की घड़ी में राजा ययाति चतुराई से काम लेते हुए हनुमान जी की शरण में चले गए। बजरंगबली ने माता अंजनी के आज्ञा से राजा ययाति को उनकी रक्षा करने का वचन दे दिया। हनुमानजी के सामने इससे बड़ी समस्या खड़ी हो गई, लेकिन वह महाज्ञानी और बुद्धिमान थे। केसरीनंदन ने यह निश्चय किया कि वह अपने स्वामी श्रीराम पर शस्त्र नहीं उठाएंगे। हनुमानजी ने रक्षा के लिए राम नाम का जाप शुरू कर दिया। इससे भगवान श्रीराम ने जितने भी बाण चलाए सभी बेअसर हो गए।

महर्षि विश्वामित्र ने रुकवाया श्रीराम-हनुमान युद्ध

महर्षि विश्वामित्र महाबली हनुमान की रामभक्ति और उनके ययाति की रक्षा के दिए गए वचन को देखर आश्चर्य में पड़ गए। सेवक और स्वामी के बीच चल रहे युद्ध और आदरभाव को देखकर महर्षि ने कोई रास्ता निकालने का मन बनाया और महाबली हनुमान और श्रीराम को इस धर्मसंकट से मुक्ति दिलाई। महर्षि विश्वामित्र ने राजा ययाति को जीवन दान देकर श्रीराम को युद्ध रोकने का आदेश दिया। इस तरह स्वामी श्रीराम और सेवक हनुमान दोनों के वचनों की रक्षा हो गई।

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