गुरुसत्संग :: सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय : Sona Kaee Na Lage, Loha Ghun Nahin Khaay. Bura Bhala Guru Bhakt, Kabhoo Nark Nahin Jaay :: GuruSatsang

🌷 *गुरु सत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग :: सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय : Sona Kaee Na Lage, Loha Ghun Nahin Khaay. Bura Bhala Guru Bhakt, Kabhoo Nark Nahin Jaay :: GuruSatsang
सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय।।।। गुरु सत्संग स्वामी ।।
जीव को सन्त सतगुरु इसी प्रकार अपने जैसा बना लेता है जैसे भृंगी कीड़ा स्वयं अपने गर्भ से किसी भृंगी की उत्पत्ति नहीं करता बल्कि वह किसी भी दूसरी जाति के मृत कीट को उठा कर ले आता है। उसको वह अपने घरौंदे में रख लेता है और उसे वह अपनी शब्द ध्ुन सुना कर न केवल जीवित कर लेता है बल्कि वह उस कीट को भृंगी ही बना देता है अथवा वह अपना स्वरूप भी उसको दे देता है। अतः सन्त सतगुरु भी अपने शिष्य के जगत और अगत को उसी प्रकार से सुखी बना देता है जिस प्रकार से उसके अपने जगत-अगत सुखी होते हैं। परन्तु इस बात के लिए उनकी एक ही शर्त होती है कि जीव उनके वचनों के अनुसार बरते यानि व्यवहार करता रहे।
---परम सन्त हुजूर साहेब जी महाराज 

आज के कलिकाल में सन्तों ने जीव के उद्धार के लिए उसको सभी दुःखों से छुटवाकर उसे सदा के लिए मुक्ति प्राप्त करने का सरल व सहज मार्ग बताया। वह मार्ग है नाम का मार्ग। परन्तु यह मार्ग इतना सरल व सहज भी नहीं है। इस मार्ग पर चलने वाले जीव को तन, मन और धन की जगात अपने सतगुरु को देनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में जीव को अपना सब कुछ त्याग कर ही जगत और अगत के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
--- परम साहेब जी महाराज ॥

चार से विवाद मत करो 

1. मुर्ख से 
2. पाग़ल से 
3. गुरु से
4. माता पिता से 

चार से शर्म नही करना 

1 पुराने कपडे में
2. गरीब साथियों में
3. बूढ़े माता पिता में
4. सादे रहन सहन में
🌷 *Guru Satsang*🌷

गुरुसत्संग :: सोना काई न लगे, लोहा घुन नहीं खाय।बुरा भला गुरु भक्त, कभू नर्क नहीं जाय : Sona Kaee Na Lage, Loha Ghun Nahin Khaay. Bura Bhala Guru Bhakt, Kabhoo Nark Nahin Jaay :: GuruSatsang

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