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देशवासियों का लंबा इंतजार खत्म करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी। भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर निर्माण का ये मुद्दा इतना बड़ा था कि पिछले चार दशक में शायद ही अन्य किसी मुद्दे ने देश की राजनीति को इसके जितना प्रभावित किया हो।

आइए आपको मुगलों के जमाने में मस्जिद निर्माण से लेकर आज मंदिर की नींव रखे जाने तक इससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण घटना का सार बताते हैं।

अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?
अयोध्या: मस्जिद निर्माण से लेकर राम मंदिर की नींव रखे जाने तक, कब क्या-क्या हुआ?


इस खबर में
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।

इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।

विवाद की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।

दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।

हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।

जानकारी हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।

चबूतरा निर्माण 1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।

माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।

प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।

केस 1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।

29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17*21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।

पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

मुख्य इमारत पर दावा दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।

22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।

मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।

इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।

जानकारी कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
इस बीच ये मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को अयोध्या के सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लगा दिया गया।

राजनीति राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।

VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।

जानकारी आदेश के एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।

मस्जिद विध्वंस 6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस बीच जुलाई, 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली कोर्ट में चल रहे विवाद से जुड़े सभी मामले अपने पास बुला लिए और विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया।

कोर्ट में सुनवाई से इतर VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।

जानकारी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगों में लगभग 2,000 की मौत
मस्जिद विध्वंस के बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुई जिनमें लगभघ 2,000 लोग मारे गए। इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा की राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह 1996 में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।

हाई कोर्ट फैसला हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।

हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

ऐतिहासिक फैसला पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन मध्यस्थता असफल रहने पर पांच सदस्यीय बेंच ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद पिछले साल 9 नंवबर को अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के हक में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद निर्माण के लिए वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने को कहा।

जानकारी ट्रस्ट देख रही मंदिर निर्माण का कामकाज
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार ने 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' नामक ट्रस्ट भी बनाई है, जो मंदिर निर्माण का पूरा कामकाज देख रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर बनने में तीन साल तक का समय लग सकता है।

जैसा की हम सभी जानते हैं की त्रेता युग में भगवान विष्णु प्रभु श्री राम के रूप में जन्म लिए थे और इस जन्म में महाबली हनुमान उनके सेवक थे। ऐसा माना जाता है की राम भक्त श्री हनुमान चिरंजीवी हैं और पृथ्वी के अंत तक वह यहां मौजूद रहेंगे। परन्तु दर्शकों आज में आपको श्री राम और उनके भक्त हनुमान के कथा की जगह भगवान कृष्ण और महाबली हनुमान जी एक की एक ऐसी कथा के भारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।इस एपिसोड में मैं आपको बताऊंगा की आखिर हनुमान जी और श्री कृष्ण के अस्त्र सुदर्शन चक्र के बिच किस बात को लेकर युद्ध हुआ था और उसका परिणाम क्या हुआ।

कथा के अनुसार एक समय सुदर्शन चक्र को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा की तीनो लोकों में उससे बड़ा कोई कोई भी शक्तिशाली नहीं है। सुदर्शन चक्र  को यह अभिमान हो गया था की भगवान श्री कृष्ण भी अंत में दुष्टों का नाश करने के लिए मेरी ही सहायता लेते हैं। उधर इस बात का ज्ञान जब भगवान् श्री कृष्ण को हुआ तो उन्होंने ने निश्चय किया की किसी भी तरह सुदर्शन चक्र के अहंकार को तोड़ना ही होगा। फिर भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के अभिमान तोड़ने के लिए हनुमान जी की सहायता ली और उन्होंने हनुमान जी को याद किया। कहते हैं की दूर रहते हुए भी भक्त और भगवान दोनों एक दूसरे की बात समझ जाते हैं। इसलिए कृष्ण जी के याद्द करते ही हनुमान जी समझ गए की प्रभु उन्हें याद कर रहे हैं। चूँकि हनुमान जी यह जानते थे की उनके प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण एक ही हैं इसलिए वो बिना किसी  देरी के द्वारका के लिए निकल पड़े और द्वारका पहुंचकर वो श्री कृष्ण से मिलने दरबार में जाने की बजाय द्वारका के राज उपवन में चले गए।

आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध
आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध

उपवन पहुंचने पर उन्होंने देखा की वहां के वृक्षों पर बड़े ही मीठे और रसीले फल लगे हुए हैं। हनुमानजी को भूख भी लगी थी इसलिए उनहोंने वृक्षों से फल तोड़कर खाना शुरू कर दिया। और फिर जब उनका पेट भर गया तो वो वृक्षों और उस पर लगे फलों को तोड़कर फेकने लगे।

उधर जब इस बात का पता दरबार में बैठे श्री कृष्ण को पता चला तो वो मन ही मन मुस्कुराने लगे और फिर उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया की जाकर उस वानर को पकड़ लाये। श्री कृष्ण का आदेश पाते ही उनकी सेना हनुमानजी को पकड़ने के लिए राज उपवन के लिए निकल पड़े। वहां पहुंचकर सेना ने हनुमान जी को ललकारा और कहा हे मूर्ख वानर तुम बाग़ क्यों उजार रहे हो। और इस तरह इन फलों को क्यों तोड़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते की यहाँ का राजा कौन है ? अगर नहीं जानते तो मैं तुम्हे बता दूँ की यहाँ के राजा श्री कृष्ण हैं और वो तुम्हे दरबार में बुला रहे हैं।

सेनानायक की बातें सुनकर महाबली हनुमान ने क्रोध होने का ढोंग करते हुए कहा की कौन कृष्ण, मैं किसी कृष्ण को नहीं जनता। मैं तो प्रभु श्री राम का सेवक हूँ। इसलिए जाओ और अपने राजा कृष्ण दो की मैं नहीं आऊंगा। यह सुन सेनानायक क्रोधित हो उठा और हनुमान जी से बोला अगर तुम अपने आप मेरे साथ नहीं चलोगे तो मैं तुम्हे जबरदस्ती पकड़ कर ले जाऊंगा। फिर जैसे ही श्री कृष्ण की सेना हनुमान जी पकड़ने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही हनुमान जी सारी सेना को पूँछ में लपेटकर राजमहल में फेंक दिया।यह देख सेनापति वहां से भाग गया और श्री कृष्ण को दरबार में आकर बताया की वह कोई साधारण वानर नहीं है।

फिर उसने श्री कृष्ण को सारि बातें बताई। उसके बाद श्री कृष्ण ने अपने सेनापति से कहा की आप उस वानर को जाकर कहिये की श्री राम आपको बुला रहे हैं। यह सुन सेनानायक वहां से हनुमान जी के पास चला गया। इधर श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया की तुम्हे द्वार की रखवाली करनी है और इस बात का भी ध्यान रखना है की कोई भी बिना अनुमति के अंदर ना आ पाए। अगर कोई बिना आज्ञा के अंदर आने का प्रयास करे तो उसका वध कर देना। यह सुन सुदर्शन चक्र द्वार की रखवाली करने लगा। चूँकि श्री कृष्ण ये समझते थे की श्री राम का सन्देश सुनकर हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते हैं।

उधर सेनानायक ने जब हनुमान जी से कहा की श्री राम तुम्हे बुला रहे हैं तो हनुमान जी बिना देर किये दरबार के लिए निकल पड़े और जब दरबार के द्वार पर पहुंचे तो सुदर्शन चक्र ने उन्हें रोकते हुए कहा की मेरी अनुमति के बगैर तुम अंदर नहीं  जा सकते। किन्तु सुदर्शन चक्र यह नहीं जनता था की जब श्री राम बुला रहे हों तब हनुमान जी को तीनो लोकों में कोई नहीं रोक सकता।सुदर्शन की बात सुनकर हनुमान जी ने सुदर्शन से अपना रास्ता छोड़ने के लिए कहा लेकिन सुदर्शन ने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा और फिर दोनों में महाभयंकर युद्ध होने लगा।किन्तु कुछ देर बाद जब हनुमान जी को यह ज्ञात हुआ की  सुदर्शन के साथ युद्ध मे उलझकर मेरा समय बर्बाद हो रहा है तो उन्होंने मन ही मन सोचा की किसी भी तरह इस युद्ध को जल्द ही समाप्त करन होगा।  उसके बाद उन्होंने सुदर्शन को पकड़ कर अपने मुंह में रख लिया।

और फिर वो अंदर दरबार में पहुँच गए। दरवार में पहुंचकर हनुमान जी सबसे पहले श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। यह देख श्री कृष्ण जी ने हनुमान को गले से लगा लिया और फिर उनसे पुछा हनुमान तुम अंदर कैसे आये क्या किसी ने तुम्हे रोका नहीं। तब हनुमान जी ने कहा भगवन सुदर्शन ने रोका था। परन्तु मैंने सोचा आपके दर्शनों में ज्यादा विलम्ब ना हो इसलिए मैं उनके साथ युद्ध में नहीं उलझा। और उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया। इतना कहकर हनुमान जी ने अपने मुँह से सुदर्शन चक्र को निकालकर श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया। यह देख सुदर्शन चक्र का सर शर्म से झुक गया और इस तरह अब उसका घमंड भी चूर हो चूका था।

हिन्दू धर्म में त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सभी देवताओं में सबसे पूजनीय माना गया है। धार्मिकग्रंथों के अनुसार परमपिता ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता माना गया है जबकि भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार और भगवान शिव को इस सृष्टि का विनाशक माना गया है।

लेकिन हिन्दू धर्म को मानने वालों के मन में एक प्रश्न हमेशा उठता है की त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पति कैसे हुई या फिर इनमे से सबसे श्रेष्ठ कौन हैं ?

शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव का जन्म नहीं हुआ वह तो स्वंयभू हैं अर्थात वे प्रकट नहीं हुए। वह निराकार परमात्मा हैं तब भी थे जिस समय पूरी सृष्टि अंधकारमय थी न जल था, न अग्नि और न वायु!

तब केवल तत्सदब्रह्म ही थे जिन्हे हिन्दू श्रुतियों में सत् कहा गया है। सत् अर्थात उस परब्रह्म काल ने कुछ समय के बाद द्वितीय होने की इच्छा प्रकट की और उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की जो मूर्ति रहित परम ब्रह्म है।

परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म और वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव कहलाये। फिर सदाशिव ने शक्तिस्वरूपा जननी को प्रकट किया जो अम्बिका कहलायी।

त्रिदेवों की उत्पति कैसे हुई

त्रिदेवों की उत्पति कैसे हुई


फिर इसी ब्रह्मरूपी सदा शिव और अम्बिका से ब्रह्मा,विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई। ऐसा माना जाता है की इन दोनों ने सबसे पहले भगवान शिव की उत्पति की जो सृष्टि के संहारक कहलाये।

फिर कुछ समय बाद रमण करते हुए सदा शिव के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए जिस पर सृष्टि निर्माण का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें। ऐसा निश्चय करके शक्ति सहित परमेश्वर रूपी सदा शिव ने अपने वामांग पर अमृत मला जिससे एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित करते हुए कहा वत्स व्यापक होने के कारण तुम विष्णु के नाम से जाने जाओगे। इसके बाद भगवान शिव ने अपने दाहिने अंग से एक दिव्य ज्योति उत्पन्न की और उसे विष्णु जी के नाभि कमल में डाल दिया,कुछ समय बाद विष्णु जी के नाभि कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। यानी ये माना जा सकता है की त्रिदेवों के माता पिता परब्रह्म सदाशिव और शक्तिस्वरूपा अम्बिका है।

तो दोस्तों ये थी त्रिदेवों के जन्म से जुडी कथा लेकिन अब आप के मन में ये सवाल उठ रहा होगा की त्रिदेव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश में सबसे शक्तिशाली कौन हैं ?

तो मित्रों में आपको बता दूँ की इससे जुडी एक कथा का वर्णन हमारे धर्मग्रंथों में मिलता है जिसके अनुसार जब एक दिन भगवान विष्णु और ब्रह्माजी के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि सबसे महान कौन है तब एक अग्नि रुपी खंबे के रूप में भगवान शिव उनके बीच आ गए थे। वो दोनों इस रहस्य को समझ ही नहीं पाए की तभी अचानक एक दिव्य आवाज आई। जो भी इस खंबे का छोर ढूंढ लेगा, वही सबसे महान कहलाएगा।यह सुनते ही ब्रह्माजी ने एक पक्षी का रूप धारण किया और खंबे का ऊपरी हिस्सा ढूंढने निकल गए। वहीं, विष्णु जी वराह का रूप धारण कर खंबे का अंत ढूंढने निकल गए। बहुत समय बिट गया। और जब बहुत खोजने के बाद भी दोनों में से किसी को खंबे का छोर नहीं मिला और दोनों ने ही अंततः हार मान ली।दोनों जहाँ से शुरू हुए थे वहीँ लौट आये। इसके बाद भगवान शिव अपने असली रूप में आ गए और भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने मान लिया कि वे दोनों नहीं बल्कि भगवान शिव ही सबसे महान और शक्तिशाली हैं। यह शक्तिस्तम्भ उनके जन्म लेने और मरने का प्रतीक है और इसी कारण यह कहा जाता है कि भगवान शिव स्वयंभू हैं यानी अमर हैं।

इस कथा के आलावा एक और कथा का वर्णन हमारे धार्मिकग्रंथों में किया गया है जो इस बात की परीक्षा है की त्रिदेवों में कौन सबसे शक्तिशाली है।

इस दूसरी कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव के मन में ये ख्याल आया की अगर मै विनाशक हूँ तो क्या मै हर चीज का विनाश कर सकता हूँ? क्या मै ब्रह्मा और विष्णु का विनाश भी कर सकता हूँ ? क्या उन पर मेरी शक्तियां कारगर होंगी ? उधर जब भगवान ब्रह्मा और विष्णु को शिव के मन में चल रहे विचार के बारे में पता चला तो वह दोनों मुस्कुराने लगे और फिर ब्रह्माजी ने कहा की हे भोलेनाथ हे शिव आप अपनी शक्तियां मुझ पर क्यों नहीं आजमाते ?

मै भी यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि हम तीनो में सर्वशक्तिमान कौन हैं। यह सुनकर विष्णुजी से भी रहा नहीं गया और वो भी शिवजी से हठ करने लगे तब भगवान शिव ने सकुचाते हुए ब्रह्माजी के ऊपर अपनी शक्तियों का प्रयोग कर दिया।

जिसके बाद देखते ही देखते ब्रह्माजी जलकर भष्म हो गए। और उनकी जगह एक राख का छोटा सा ढेर लग गया।यह देख शिवजी चिंतित हो गए और मन ही मन सोचने लगे की यह मैंने क्या कर दिया।अब इस सृष्टि का क्या होगा? और फिर उस राख को अपनी मुठ्टी में उठाने लगे तभी राख में से ब्रह्माजी प्रकट हुए और वे बोले हे शिव मै कहीं नहीं गया हूँ. मै यहीप रहूँ। मेरे विनाश के कारण इस राख की रचना हुई है और जहाँ भी रचना होती है वहां मैं होता हूँ।इसलिए मै आपकी शक्तियों से समाप्त नहीं हुआ।

यह सुन भगवान विष्णु मुस्कुराये और बोले हे महादेव, मै संसार का रक्षक हूँ. मै भी देखना चाहता हूँ कि क्या मै आपकी शक्तियों से स्वयं कि रक्षा कर सकता हूँ? कृपया मुझ पर अपनी शक्तियों का प्रयोग करें। यह सुन पहले तो भगवान शिव मना करते रहे परन्तु जब ब्रह्माजी ने भी हठ किया तो शिवजी ने विष्णुजी को भी अपनी शक्तियों से भष्म कर दिया। विष्णुजी के स्थान पर अब वहां राख का ढेर था परन्तु उनकी आवाज़ राख के ढेर से अब भी आ रही थी। विष्णुजी शिवजी से बोल रहे थे हे शिव मै अब भी यही हूँ। आप रुके नहीं। अपनी शक्तियों का प्रयोग इस राख पर भी कीजिये और तब तक करते रहे जब तक कि इस राख का आखिरी कण भी ख़त्म न हो जाये।

यह सुन शिवजी ने अपनी शक्तियों को और तेज कर दिया।राख कम होनी शुरू हो गयी।और अंत में उस राख का सिर्फ एक कण बचा। भगवान शिव ने सारी शक्तियां लगा दी लेकिन उस कण को समाप्त नहीं कर पाए। भगवान विष्णु उस कण से पुनः प्रकट हो गए और यह सिद्ध कर दिया कि उन्हें भगवान शिव भी समाप्त नहीं कर सकते।यह देख भगवान शिव ने मन ही मन सोचा कि मै ब्रह्मा और विष्णु को सीधे समाप्त नहीं कर सकता।  लेकिन अगर मै स्वयं का विनाश कर लूँ तो वे भी समाप्त हो जायेंगे क्योंकि अगर मै नहीं रहूँगा तो विनाश संभव नहीं होगा और बिना विनाश के रचना कैसी?

अतः ब्रह्मा और विष्णुजी भी नहीं रहेंगे। उसके बाद शिवजी ने स्वयं का विनाश कर लिया और जैसा वे सोच रहे थे वैसा ही हुआ। जैसे ही वे जलकर राख में तब्दील हुए, ब्रह्मा और विष्णु भी राख में बदल गए। कुछ समय के लिए पूरी सृष्टि अंधकारमय हो गया। वहां उन तीनो देवो की राख के सिवाय कुछ नहीं था। उसी राख के ढेर से एक आवाज़ आई- “मै ब्रह्मा हूँ। मै देख सकता हूँ कि यहाँ राख की रचना हुई है और जहाँ रचना होती है, वहां मै होता हूँ। इस तरह उस राख से पहले ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और उसके बाद विष्णु और शिवजी क्योंकि जहाँ रचना होती है वहां पहले जीवन आता है और फिर विनाश।

इस तरह शिवजी को बोध हुआ कि त्रिदेव का विनाश असंभव है और कोई भी एक दूसरे से शक्तिशाली या कम आवश्यक नहीं है।

मित्रों यूँ तो आपने महाभारत से जुडी कई कथाएं सुनी होगी परन्तु महाभारत से जुडी कई ऐसी कथाएं हैं जिससे आज भी हिन्दू जनमानस अनजान हैं। इस लेख में हम आपको महाभारत काल में दिए गए कुछ ऐसे श्राप के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में ये माना जाता है की उन श्रापों को आज भी जनमानस भुगत रहे हैं।

पहला श्राप – युधिष्ठिर द्वारा स्त्री जाति को दिया गया श्राप
महाभारत में दिए गए श्रापों में युधिष्ठिर का स्त्री जाति को दिया गया श्राप सर्वविदित है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार जब कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान अर्जुन ने महारथी कर्ण का वध कर दिया तब पांडवों की माता कुंती उसके शव के पास बैठकर विलाप करने लगी। यह देखकर पांडवों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की आखिर ऐसी क्या बात है जो हमारी माता हमारे शत्रु के शव पर अपना आंसू बहा रही है। तब ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर अपनी माता कुंती के पास गए और उन्होंने देवी कुंती से पूछा माता क्या बात है  जो आप हमारे सबसे बड़े शत्रु कर्ण के शव पर विलाप कर रही है। तब देवी कुंती ने बताया की पुत्रों जिससे तुम अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते रहे वास्तव में वो तुम सभी का बड़ा भाई था। कर्ण राधेय नहीं बल्कि कौन्तेय था। अपनी माता के मुख से ऐसी बातें सुनकर पांचों पांडव दुखी हो गए। फिर कुछ क्षण रुककर युधिष्ठिर अपनी माता कुंती से बोले हे माते ये बात तो आप सदा से जानती रही होगी की अंगराज कर्ण मेरे बड़े भाई थे तब आप ने हमलोगों को यह बात बताई क्यों नहीं। इतने दिनों तक ये बात आप छुपा कर क्यों रखी,आपके एक मौन ने हम सभी को अपने ही भाई का हत्यारा बना दिया। इसलिए मैं आज इस धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में सभी दिशाओं,आकाश और धरती को साक्षी मानकर सभी स्त्रीजाति को ये श्राप देता हूँ की आज के बाद कोई भी स्त्री अपने अंदर कोई भी रहस्य नहीं छुपा पाएगी।

महाभारत काल के पांच श्राप जिन्हें आज भी भुगत रहे हैं लोग
महाभारत काल के पांच श्राप जिन्हें आज भी भुगत रहे हैं लोग

दूसरा श्राप – श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप
कथा के अनुसार छतीस साल हस्तिनापुर पर राज करने के पश्चात् जब पांचों पांडव द्रौपदी सहित स्वर्गलोक की और प्रस्थान करने हुए तो उन्होंने अपना सारा राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के हाथो में सौंप दिया। ऐसा माना जाता है की राजा परीक्षित के शासन काल में भी हस्तिनापुर की सारी प्रजा युधिष्ठिर के शासनकाल की तरह ही सुखी थी। परन्तु कहते हैं ना की होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन राजा परीक्षित रोज की तरह ही वन में आखेट खेलने को गए तभी उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए। वे अपनी तपस्या में लीन थे तथा उन्होंने मौन व्रत धारण क़र रखा था। परन्तु ये बात राजा परिलक्षित को मालोमं नहीं था। इसलिए राजा परीक्षित ने कई बार ऋषि शमीक को आवाज लगाई लेकिन उन्होंने अपना मौन धारण रखा। यह देखकर राजा परीक्षित को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में आकर ऋषि के गले में एक मारा हुआ सांप डाल दिया।उधर जब यह बात ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया की आज से सात दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो जायेगी।और अंत में ऋषि श्रृंगी के श्राप के कारण राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने के कारण ही हुई। और ऐसा माना जाता है की उसी के बाद कलयुग की शुरुआत हुई क्यूंकि  राजा परीक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था की वह इंसानो पर हावी हो सके। और आज हम सभी इस कलयुग को उसी श्राप के कारण भोग रहे हैं।

तीसरा श्राप – श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप
महाभारत युद्ध के अंतिम दिन जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया और बात का पता जब पांडवों को चला तो तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंचे। पांडवों को अपने सामने देख अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र से वार किया। यह देख श्री कृष्ण ने अर्जुन को ब्रह्मास्त्र चलने को कहा जिसके बाद अर्जुन ने भी अश्व्थामा पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। परन्तु महर्षि व्यास ने बिच में ही दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा एवं अर्जुन से कहा क्या तुम लोग ये नहीं जानते की ब्रह्मास्त्र के आपसे में टकराने से समस्त सृष्टि का नाश हो जायेगा। इसलिए तुम दोनों  अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस ले लो। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने महर्षि से कहा महर्षि मेरे पिताजी ने इसे वापस लेने की विद्या नहीं सिखाई है इसलिए मैं इसे वापस नहीं ले सकता और इसके बाद उसने ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी. तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे।दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे।और इसी कारण आज भी ये माना जाता है की अश्व्थामा अभी भी जीवित है।

चौथा श्राप – माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप
महाभारत में मांडव्य ऋषि का वर्णन आता है। एक बार राजा ने भूलवश न्याय में चूक क़र दी और अपने सैनिकों को ऋषि मांडव्य को शूली में चढ़ाने का आदेश दे दिया।परन्तु जब बहुत लम्बे समय तक भी शूली में लटकने पर ऋषि के प्राण नहीं गए तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ तथा उन्होंने ऋषि मांडव्य को शूली से उतरवाया तथा अपनी गलती के लिए मांगी। इसके बाद ऋषि माण्डव्य यमराज से मिलने गए तथा उनसे पूछा की किस कारण मुझे झूठे आरोप में सजा मिली। तब यमराज ऋषि से बोले जब आप 12 वर्ष के थे तो आपने एक छोटे से कीड़े के पूछ में सीक चुभाई थी जिस कारण आपको यह सजा भुगतनी पड़ी।यह सुन ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने यमराज से कहा की  किसी को भी 12 वर्ष के उम्र में इस बात का ज्ञान नहीं रहता की धर्म और अधर्म क्या है। क्योकि की तुमने एक छोटे अपराध के लिए मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। अतः मैं तुम्हे श्राप देता हूँ की तुम शुद्र योनि में दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे। माण्डव्य ऋषि के इस श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पडा।

पांचवां श्राप – अप्सरा उर्वशी का अर्जुन को श्राप
ये कथा उस समय की है जब तरह साल के वनवास के दौरान एक बार अर्जुन दिव्यास्त्र की खोज में स्वर्ग लोक गया। वहां उर्वशी नाम की एक अप्सरा उनके रूप एवं सौंदर्य को देखकर उन पर मोहित हो गई। फिर एक दिन उर्वशी ने अर्जुन को विवाह करने को कहा तब अर्जुन ने उससे कहा की मैं आपको माता के समान मनाता हूँ इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकत। इस बात पर उर्वशी क्रोधित हो गई तथा उसने अर्जुन से कहा की तुम एक नपुंसक की तरह बात क़र रहे हो, इसलिए मैं तुम्हे श्राप देती हूँ की तुम आजीवन नपुंसक हो जाओ तथा स्त्रियों के बीच तुम्हे नर्तक बन क़र रहना पड़े। यह बात सुनकर अर्जुन विचलित हो गए और फिर वो देवराज इंद्र के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। उसके बाद देवराज इंद्र के कहने पर उर्वशी ने अपने श्राप की अवधि एक साल के लिए सिमित कर दी। तब इंद्र ने अर्जुन को संतावना देते हुए कहा की तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है यह श्राप तुम्हारे वनवास के समय वरदान के रूप में काम करेगा और अज्ञातवास के समय तुम नर्तिका के वेश में कौरवों के नजरो से बचे रहोगे।

मित्रों ये तो हम सभी जानते हैं की हिन्दू पुराणों के अनुसार कालखंड यानि समय को चार युगों में बांटा गया है और इसी  कालखंड को सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग  के नाम से जाना जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ऐसा माना जाता है की जब भी किसी कालखंड में उस समय के परिस्थिति मानकों के अनुसार धर्म का लोप होने लगता है तो भगवान श्री हरि अवतरित होकर अधर्मियों का नाश करते हैं और फिर तीनो लोक में धर्म की स्थापना करते हैं जिसके बाद एक नए कालखंड यानी नए युग का आरम्भ होता है। तो दोस्तों आइये मिलकर जानते हैं की  पुराणों के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग का आरम्भ और अंत कैसे हुआ ?

वैसे तो हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार इन चारों युगों का कई बार परिवर्तन हो चूका है परन्तु ऐसा माना जाता है की सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहला कालखंड यानि युग सतयुग था। सतयुग की काल अवधि 4,800 दिव्य वर्ष अर्थात 1728000 मानव वर्ष मानी जाती है। ऐसा माना जाता है की इस युग में मनुष्यों की आयु एक लाख वर्ष के करीब होती थी  साथ ही सतयुग में मनुष्यों  की लम्बाई भी आज की तुलना में काफी अधिक होती थी। इस युग में पाप की मात्र 0 विश्वा अर्थात् 0% थी जबकि इस युग में पुण्य की मात्रा 20 विश्वा यानि 100% होती है । फिर भी इस युग में श्री हरी ने  मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह  रूप में अवतरित  हुए थे। अब यहाँ ये सवाल उठता  है की जब सतयुग में पाप नहीं था तो फिर श्री हरी ने इन रूपों में क्यों अवतार लिया तो दर्शकों आपको बता दूँ की जब परमपिता ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तो उस समय देवों ,मनुष्यों,नागों,गंधर्वों आदि के साथ साथ दैत्यों की भी उत्पति की ताकि सृष्टि  का संतुलन बना रहे। और इसी संतुलन को बनाये रखने के लिए सतयुग में श्री हरी शंखासुर ,हरिण्याक्ष दैत्य और हिरण्यकश्यपु का वध करने के लिए विभिन्न रूप में अवतरित हुए। हिन्दू धर्मग्रंथों की माने तो चुकी उस समय मनुष्य अपने विकास की और अग्रसर हो रहा था अर्थात मनुष्य जानवरों से धीरे धीरे धीरे अपने वास्तविक रूप मं  आ रहा था। इसके आलावा हरी का ये सारे अवतार मानव के विकास का भी प्रतिक माना जाता है।

कैसे हुआ चारों युगों का आरम्भ
कैसे हुआ चारों युगों का आरम्भ

सतयुग की समाप्ति के बाद त्रेता युग आया। इस युग की बात करें तो इस युग में श्री हरी ने वामन और श्री राम के रूप में पूर्ण अवतार लिया था जबकि परशुराम के रूप में उन्होंने अंशावतार लिया था। इस युग की काल अवधि 3,600 दिव्य वर्ष अर्थात 1296000 मानव वर्ष माना जाता है। इस युग में मनुष्यों की उम्र दस हजार वर्ष हुआ करती थी जबकि लम्बी सौ से डेढ़ सौ फिट हुआ करती थी। इस युग में पाप की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् 25% थी जबकि पुण्य की मात्रा15 विश्वा यानि 75% थी। इसी युग में रावण, कुम्भकरण, बाली, अहिरावण जैसे अत्याचारी राजा भी हुआ करते थे जो अपने बल और अहंकार में आकर  तीनोलोक के प्राणियों पर अत्याचार किया करते थे जिस कारण वश श्री हरी प्रभु श्री राम बल और अहंकार में आकर रूप में अवतरित हुए और  इन अत्याचारियों नाश किया। फिर जब वह अयोध्या वापस आये तो उन्होंने कई वर्षों तक वहां शासन किया फिर देवी सीता के पृथ्वी में समां जाने के कुछ वर्षों बाद उन्होंने भी अपना देह त्याग कर दिया और ऐसा माना जाता है की प्रभु श्री राम के देह त्यागने के बाद एक बार फिर एक नए युग का सृजन हुआ जिसे द्वापरयुग के  नाम से जाना जाता है।

द्वापर युग में श्री हरी ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया था। इस युग की काल अवधि 2,400 दिव्य वर्ष अर्थात 864000 मानव वर्ष माना जाता है।इस युग में मनुष्यों की आयु हजार वर्ष हुआ करती थी। इस युग पाप की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् 50% हुआ करती थी।  द्वापर युग को युद्धों का युग भी कहा जाता है इस युग में धर्म का तेजी से क्षय होने लगा था। चारों ओर अधर्म अपना पांव तेजी से पसारने लगा था तब भगवान श्री कृष्ण ने पापियों का एक-एक कर नाश करना  शुरू किया। और जब महाभारत युद्ध के पश्चात् सारे अधर्मियों का नाश हो गया तब युधिष्ठिर को हस्तिनापुर को हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया। जिस समय युधिष्ठिर का राजतिलक हो रहा था उसी समय गांधारी अपने सभी पुत्रों की मृत्यु का जिम्मेदार मानते हुए भगवान श्री कृष्ण को श्राप दे दिया।  गांधारी ने भगवान कृष्ण को श्राप देते हुए कहा कि  कृष्ण जिस तरह तुमने मेरे कुल का नाश किया, उसी तरह तुम्हारे भी कुल का नाश होगा।

उसके बाद पांडवों ने 36 साल तक हस्तिनापुर पर राज किया। फिर  गांधारी के दिए श्राप के कारण भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ने लगी। द्वारकावासी मदिरापीकर आपस में ही लड़ने लगे और एक दूसरे को मारने लगे। यह देखकर एक दिन भगवान श्रीकृष्ण पूरे यादव वंश को प्रभास ले आए। परन्तु वहां भी श्राप के कारण संपूर्ण यादव वंश एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। और अंत में हालात इतने बिगड़ गए की पूरा यादव वंश ही खत्म हो गया। उसके बाद एक दिन भगवान श्री कृष्ण एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे उसी समय किसी शिकारी ने भगवान कृष्ण पर ही निशाना साध दिया। क्योंकि भगवान ने मृत्युलोक में जन्म लिया था इसलिए इस मनुष्य रूपी शरीर से एक दिन उन्हें दूर होना ही था। अतः भगवान श्री कृष्ण ने अपना देह त्याग दिया और बैकुंठ धाम चले गए।

उधर जब इस बात की सूचना युधिष्ठिर को मिला तो उनको भी समझ में आ गया की अब उनके जीवन का उद्देश्य खत्म हो चुका है। द्वापर युग इस समय अपनी समाप्ति की ओर था और कलयुग का प्रारंभ होने वाला था।  इसी बात को ध्यान में रखते हुए युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राज-पाठ परीक्षित को सौंप  दिया तथा खुद चारों भाइयों और द्रौपदी सहित हिमालय की ओर अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़े। फिर पांडवों के हस्तिनापुर से निकलते ही कलयुग का आरम्भ हो गया और आज हम इसी कलयुग में जी रहे हैं। इस युग में पाप की मात्रा 15 विश्वा अर्थात 75 % मनाई जाती है जबकि पुण्य की मात्रा मात्र 5 विश्वा यानि 25 % मानी जाती है।

मित्रों आपको बता दूँ की अभी कलयुग का प्रथम चरण ही चल रहा है और ऐसा माना जाता है की कलयुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व से हुआ था ।यानि अभी तक कलयुग ने अपना 5120 वर्ष ही पूरा किया है जबकि इसके अंत होने में अभी 426880 वर्ष बाकी है। परन्तु कलियुग का अंत कैसा होगा इसका वर्णन पहले ही ब्रह्मपुराण में किया जा चूका है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कलियुग के अंत में मनुष्य की आयु महज 12 वर्ष रह जाएगी। इस दौरान लोगों में द्धेष और दुर्भावना बढ़ेगी। कलयुग की उम्र जैसे जैसे बढती जाएगी वैसे वैसे नदियां सूखती जाएगी।बेमानीऔर अन्याय से धन कमानेवाले लोग बढ़ने लगेंगे।

धन के लोभ में मनुष्य किसी की भी हत्या करने लगेगा। इंसान सभी धार्मिक काम करना बंद कर देगा। गाय दूध देना बंद कर देगी। मानवता नष्ट हो जाएगी। लडकिया बिलकुल भी सुरक्षित नहीं रहेंगी उनका अपने ही घर में शोषण होने लगेगा। अपने ही घर के लोग उनके साथ वैभिचार करने लगेंगे ,सभी रिश्ते नष्ट होने लगेंगे और जब आतंक अपनी चरम सीमा में होगा तब श्री हरी कल्कि अवतार लेंगे और पृथ्वी से समस्त अधर्मियों का नाश कर देंगे। और उसके बाद एक बार फिर से नए युग सतयुग का आरम्भ होगा। दोस्तों आपको बता दूँ की अभी तक युग परिवर्तन का यह बाईसवां चक्र चल रहा है और वर्तमान युग के समाप्त होने के बाद यह अपने तेइसवें चक्र में प्रवेश करेगा।

बचपन से हीं हम सब प्रभु श्री राम और माता सीता की कथाएं सुनते आ रहे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम और देवी सीता की कथा पर आधारित रामायण के कई संस्करण उपलब्ध हैं। लेकिन रामायण काल की सही जानकारी हमें महर्षि बाल्मिकी द्वारा रचित रामायण से ही मिलती है। वैसे तो सभी रामायण में प्रभु राम और माता सीता के मिलन से लेकर वनवास जाने की कहानी, सीता का रावण के द्वारा हरण और राम के द्वारा रावण के अंत तक की कथाएं बताई गई है। लेकिन कई ऐसी कथाएं भी बताई गई है जिनका कोई प्रमाण कहीं नहीं मिलता। इस लेख में हम आपको माता सीता और भगवान राम के दो पुत्र लव और कुश के जन्म के विषय बताने जा रहे हैं।

दो नही एक पुत्र को जन्म दिया था सीता ने, कुश नही था माता सीता का पुत्र
दो नही एक पुत्र को जन्म दिया था सीता ने, कुश नही था माता सीता का पुत्र

सीता द्वारा संतान को जन्म देने की बात को लेकर कई कहानियां प्रचलित है। लोक कथाओं की माने तो सीता जी ने एक नहीं बल्कि दो बालकों को जन्म दिया था, लेकिन महर्षि बाल्मिकी द्वारा रचित रामायण में इसका उल्लेख नहीं मिलता। ये तो हम सभी जानते हैं की 14 वर्ष के वनवास के बाद सीता,राम और लक्ष्मण अयोध्या लौटे तो पूरी अयोध्या खुशियों से झूम उठी थी। ये तब और बढ़ गई जब अयोध्या वासियो को पता चला की उनके राजा राम और रानी सीता माता-पिता बनने वाले हैं। सीता जी के गर्भवती होने की खुशी में पूरी अयोध्या जश्न में डूब गया। लेकिन इनकी यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही।

पूरी अयोध्या में यह चर्चा होने लगी की सीता लंबे समय तक रावण के लंका में रह कर आई हैं। ऐस मे राजा राम माता सीता को महल में कैसे रख सकते हैं? इन बातों से दुखी भगवान राम ने राजधर्म का पालन करते हुए माता सीता का परित्याग कर दिया। गर्भवती माता सीता को लक्ष्मण वन में छोड़ आए। यहाँ से महर्षि बाल्मिकी माता सीता को अपने आश्रम में ले गए। महर्षि बाल्मिकी के आश्रम में माता सीता आम लोगों की तरह जीवन निर्वाह करने लगीं। कुछ समय पश्चात माता सीता ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिस पुत्र को सीता जी ने जन्म दिया उसका नाम लव रखा गया।  

अब माता सीता का ज्यादातर समय पुत्र के लालन-पालन में लगा रहता। कहते हैं की एक दिन माता सीता लकड़ियां लेने जंगल जा रही थीं। तो उन्होंने महर्षि बाल्मिकी से लव का ध्यान रखने के लिए कहा। उस वक्त महर्षि बाल्मिकी किसी काम में व्यस्त थे,इसलिए उन्होंने सर हिलाकर लव को वहां रखने की बात कही। लेकिन सीता जी जब जाने लगीं तो उन्होंने देखा कि महर्षि अपने कार्य में व्यस्त हैं। इसलिए वह लव को साथ लेकर लकड़ियां लाने जंगल चली गई। महर्षि बाल्मिकी ने सीता को जाते नहीं देखा।

कुछ समय बाद जब महर्षि बाल्मिकी को ध्यान आया तो लव को आश्रम न देखकर वह परेशान हो गए। उन्हें भय सताने लगा की लव’ को कहीं किसी जानवर ने तो नहीं उठा लिया। अब सीता अगर वन से वापस लौटेगी तो उसे क्या जवाब दूंगा। इसी डर से महर्षि बाल्मिकी ने पास ही पड़े एक कुशा को उठा लिया और कुछ मंत्र पढ़कर एक बालक को अवतरित किया। जो दिखने में बिल्कुल लव जैसा ही था। महर्षि ने सोचा कि जब सीता वन से वापस लौटेगी तो मैं उन्हें ये लव सौंप दूंगा। लेकिन कुछ देर बाद जब माता-पिता जंगल से वापस लौटी तो महर्षि ने देखा माता सीता के साथ लव भी थे।

यह देख महर्षि चकित रह गए,लेकिन माता सीता दूसरे लव को देख बेहद खुश हो गई। और उसे अपने दूसरे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया। चूँकि इस बालक का जन्म कुश के द्वारा हुआ था इसलिए उस बालक का नाम कुश रखा गया। और ये दोनों बालक लव और कुश भगवान राम और माता सीता के पुत्र के रुप में जाने गए।

जैसा की हम सभी जानते हैं की अधिकतर धर्मो में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपवित्र और अशुभ माना जाता है। आपने देखा होगा की मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने या फिर घर के पूजा घर में भी जाने की इजाजत नहीं होती। लेकिन अब ये सवाल उठता है की जब धार्मिक रूप से महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अशुभ और अपवित्र माना जाता है तो फिर वो इस दौरान कोई व्रत क्यों रखती है या फिर इस दौरान उन्हें व्रत करने का कोई फल मिलता भी है या नहीं। क्या ये शास्त्रोन्मत है अगर हाँ तो इसके पीछे क्या कारण है ?

मित्रों इन सवालों का जबाव देने से पहले आपको ये बता दूँ की भागवत पुराण के अनुसार मासिक धर्म के दौरान महिलाएं ब्रह्महत्या जैसी पाप को झेल रही होती है जी हाँ भागवत पुराण वर्णित कथा के अनुसार एक बार इंद्रदेव किसी अपमानजनक बात से गुरु बृहस्पति उनसे नाराज हो गए और वो स्वर्गलोक छोड़कर कहीं चले गए। उधर जब इस बात की सूचना असुरों को मिली तो असुरों ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। जिसमे देवराज राज को पराजय का सामना करना पड़ा और उन्हें अपनी गद्दी छोड़कर भागना पड़ा। उसके बाद इंद्रदेव ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे मदद करने को कहा। तब ब्रह्मा जी इंद्र से बोले इस समस्या से निजात पाने के लिए तुम्हे एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करनी होगी। यदि वह तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हो गए तो तुम्हे स्वर्गलोक वापस मिल जाएगी।

उसके बाद ब्रह्माजी के कहे अनुसार इंद्रदेव एक ब्रह्म ज्ञानी की सेवा करने लगे। लेकिन इंद्रदेव इस बात से अनजान थे कि जिनकी वो सेवा कर रहे है उस ज्ञानी की माता असुर है। जिसकी वजह से उस ज्ञानी को असुरों से अधिक लगाव था। असुरों से लगाव की वजह से वो ब्रह्मज्ञानी इंद्रदेव की सारी हवन सामग्री देवताओं की बजाय असुरों को अर्पित कर देते थे।उधर कुछ दिनों बाद जब इस बात का पता इंद्रदेव को चला तो उन्होंने क्रोध में आकर उस ज्ञानी की हत्या कर दी। फिर उन्हें जब यह ज्ञात हुआ की उन्होंने ब्रह्महत्या कर बहुत बड़ा अधर्म कर दिया है तो वो एक फूल में छिपकर भगवान विष्णु की पूजा करने लगे।

क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?
क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को व्रत करना चाहिए ?

कुछ दिनों बाद विष्णु जी इंद्रदेव की पूजा से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें बोले हे देवराज ब्रह्महत्या जैसे पाप से मुक्ति के लिए तुम्हे इसे पेड़, भूमि, जल और स्त्री में अपना थोड़ा-थोड़ा पाप बाँटना होगा। साथ मे सभी को एक एक वरदान भी देना होगा। उसके बाद इंद्रदेव सबसे पहले पेड़ से अपने पाप का अंश लेने का अनुरोध किया। तो पेड़ ने पाप का एक चौथाई हिस्सा ले लिया। जिसके बाद इंद्रदेव ने पेड़ को वरदान दिया की मरने के बाद तुम चाहो तो स्वयं ही अपने आप को जीवित कर सकते हो। उसके बाद इंद्रदेव के विनती करने पर जल ने पाप का कुछ हिस्सा अपने सर ले लिया। बदले में इंद्रदेव ने उसे अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति प्रदान की। इसी तरह भूमि ने भी इंद्र देव के पाप का कुछ अंश स्वीकार कर लिया।जिसके बदले इंद्रदेव ने भूमि को वरदान दिया की उस पर आई चोटें अपने आप भर जाएगी।

अंत में इंद्रदेव स्त्री के पास पहुंचे तो स्त्री ने बांकी बचा पाप का सारा अंश अपने ऊपर ले लिया। इसके बदले इंद्रदेव ने स्त्रियों को वरदान दिया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ काम का आनंद ज्यादा ले पाएँगी और ऐसा माना जाता है की तभी से महिलाएं मासिक धर्म के रूप में ब्रह्म हत्या का पाप झेल रही है।

तो मित्रों जैसा की आपने कथा में देखा की जब इंद्रदेव ब्रह्महत्या के पाप को झेल रहे तो उन्होंने फूल में छिपकर विष्णु जी आरधना की थी परन्तु उस समय ना तो उनके सामने कोई भी श्री विष्णु की प्रतिमा थी और नाही वो किसी मंदिर में थे। ठीक इसी तरह महिलाएं भी मासिक धर्म के दौरान व्रत तो कर सकती है लेकिन मंदिर नहीं जा सकती है और ना ही किसी मूर्ति की पूजा कर सकती है। परन्तु अगर इस दौरान ऐसा करती है तो भागवत पुराण के अनुसार उसे पाप माना गया है यानी मासिक धर्म के दौरान अगर कोई स्त्री मंदिर चली जाती है या फिर किसी देव की प्रतिमा को पूजती है तो वो पाप की भागिदार मानी जाती है जिसकी सजा उसे इसी जन्म में भुगतनी पड़ती है। लेकिन आपको ये भी बता दूँ की इस दौरान महिलाएं मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है इसलिए उनका तिरस्कार करने के बजाय उनके मनोबल बढ़ाने का कार्य करें। क्यूंकि कई जगह ऐसा देखा जाता है की जानकारी के आभाव में लोग मासिक धर्म के दौरान महिलाओं से बुरा बर्ताव करने से भी नहीं चूकते। 
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